अशआर

अपना कशकोल छिपा लो तो सभी हातिम हैं
वरना हर शख्स भिखारी है, जिधर जाओगे.


मैदां की हार-जीत तो किस्मत की बात है
टूटी है किसके हाथ में तलवार देखना.
हरेक आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी
जिसको भी देखना, कई बार देखना.


Comments

  1. दरअसल इस देश के लोकतंत्र में व्यवस्था ऐसी बन गई है कि सरकार का मुख्य काम कॉरपोरेट सेक्टर का हित देखना बन गया है, लेकिन कुछ इस तरह से कि आम लोगों को लगे कि सरकार उनके भले के लिए काम कर रही है। जो सरकारें ये संतुलन बना लेती हैं उन्हें सफल सरकार कहा जाता है। इस मामले में यूपीए सरकार संतुलन खो रही है। कॉरपोरेट सेक्टर तो खुश है कि सरकार उसके मन की हर मुराद पूरी कर रही है। लेकिन आम लोगों में छले जाने का एहसास बढ़ रहा है। ये असंतुलन देश भर में अलग अलग शक्लों में असंतोष का कारण बन रहा है। ईष्टदेव जी ने अच्छा विषय छेड़ा है। इसपर और काम होना चाहिए। और भरपूर मात्रा में लिखा जाना चाहिए। आखिर ये देश हम सबका है और इस पर राज करने के लिए जब हम कोई सरकार चुनते हैं तो उसके सामने ये मजबूरी होनी चाहिए कि वो अधिकतम लोगों के अधिकतम हित का ध्यान रखे। -दिलीप मंडल

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  2. बढ़िया विषय पर अच्छा लेख है।

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  3. बहुत खुब। कवितायों में भाव और भंगिमा दोनो हैं।
    कीट्स ने कह था कि Poetry should come like a leaf falling from a tree. Or not come at all.

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