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ज्योति और सचिन: खलनायक नहीं, नायक हैं ये

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इष्ट देव सांकृत्यायन सचिन पायलट का प्रयास एक बार उलटा क्या पड़ा पूरे परिदृश्य पर वे खलनायक नजर आने लगे। गहलोत और दूसरे कांग्रेसियों से लेकर न्यूज चैनलों-अखबारों के छापदार विशेषज्ञों और सोशल मीडिया के छापेमार विशेषज्ञों तक ने उन्हें विभीषण से लेकर रावण और दुर्योधन से लेकर शकुनि तक साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ा। ठीक यही बात उस वक्त भी हुई थी जब पायलट के दहिनवार सिंधिया ने मध्य प्रदेश में तख्ता पलट किया था। सिंधिया अपने प्रयास में सफल हो गए तो अब उनके खिलाफ सारी आवाजें आनी बंद हो गईं। उस वक्त अमावस के नीरव अंधकार में दहाड़ते कांग्रेसी शेरों की हैसियत अब ज्योतिरादित्य के मामले में कीं कीं करते निरीह झींगुरों से अधिक नहीं रह गई है। अगर कहीं सिंधिया अगले चुनाव में जीत गए और भाजपा में अपने समर्थकों की संख्या बढ़ा सके तो इन झींगुरों में से आधों से ज्यादा का पिल्लों के रूप में पुनर्जन्म तो हम-आप दो साल बाद ही देख लेंगे। इसके लिए महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया को कोई बहुत ज्यादा कुछ करना नहीं है। उन्हें कुल जो करना है , वह बस इतना ही है कि महाराज के अपने साँचे से बाहर निकल आना है। ज्योतिरादित्...

उदयपुर दर्शन

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हरिशंकर राढ़ी  फतेहसागर झील                                          छाया : हरिशंकर राढ़ी   रात्रि विश्राम के बाद अगले दिन हमें उदयपुर के दर्शनीय स्थलों की सैर करनी थी। वैसे तो ऐसे पर्यटक बिंदुओं पर टैक्सीवाले तथा टुअर ऑपरेटर न जाने कितने स्थान पैदा कर लेते हैं, लेकिन हमें कुछ खास स्थल ही घूमने थे। उनमें फतेह सागर झील, सहेलियों की बाड़ी और सिटी पैलेस ही मुख्य थे। थोड़ा सा समय कुछ खरीदारी के लिए भी चाहिए था। लिहाज़ा हमने दस बजे होटल से चेक आउट कर लिया और गाड़ी में सवार हो लिए। हमारा पहला पड़ाव फतेह सागर झील थी। रास्ते में हमने आधा घंटा एक उद्यान में बिताया जो कि अच्छा तो था किंतु अद्वितीय किसी कीमत पर नहीं। फतेह सागर झीलः  फतेहसागर झील  के सामने                                        यह झील निश्चित  रूप से उदयपुर के प्रमुख आकर्षणों मे...

गढ़ तो चित्तौडग़ढ़...

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इष्ट देव सांकृत्यायन  गढ़ तो चित्तौडग़ढ़ , बाक़ी सब गढ़ैया... यह कहावत और इसके साथ-साथ मेवाड़ के महाराणाओं की शौर्यगाथाएं बचपन से सुनता आया था। इसलिए चित्तौड़ का गढ़ यानी क़ि ला देखने की इच्छा कब से मन में पलती आ रही थी , कह नहीं सकता। हां , मौ क़ा अब जाकर मिला , अगस्त में। जिस दिन कार्यक्रम सुनिश्चित हो पाया , तब तक रेलवे रिज़र्वेशन की साइट दिल्ली से चित्तौडग़ढ़ के लिए सभी ट्रेनों में सभी बर्थ फुल बता रही थी। जैसे-तैसे देहरादून एक्सप्रेस में आरएसी मिली। उम्मीद थी कि कन्फर्म हो जाएगा , पर हुआ नहीं। आख़िर ऐसे ही जाना पड़ा , एक बर्थ पर दो लोग। चित्तौडग़ढ़ पहुंचे तो साढ़े 11 बज रहे थे। ट्रेन सही समय पर पहुंची थी। स्टेशन के प्लैटफॉर्म से बाहर आते ही ऑटो वालों ने घेर लिया। मेरा मन तो था कि तय ही कर लिया जाए, पर राढ़ी जी ने इनके प्रकोप से बचाया। उनका कहना था कि पहले कहीं ठहरने का इंतज़ाम करते हैं। फ्रेश हो लें और कुछ खा-पी लें, फिर सोचा जाएगा। इनसे बचते हुए सड़क पर पहुंचे तो सामने ही एक जैन धर्मशाला दिखी। यहां बिना किसी झंझट के कम किराये पर अच्छा कमरा मिल गया। रेलवे स्टेशन के पास इतनी अच्छ...

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