हिंदी वालों का दंभ और समाज में उनकी भूमिका
इष्ट देव सांकृत्यायन 60 के बाद की जो हिंदी है , दंभ से उसका चोली-दामन का साथ है। क्योंकि 47 में जो संविधान सभा के बहुमत के बावजूद हिंदी के राष्ट्रभाषा बनाए जाने का विरोध कर रहे थे और आखिरकार उसे अपने षड्यनत्रकारी दुष्चक्र में फँसाकर राजभाषा के दायरे में सीमित कर ही डाला , उन्होंने ही अपने उसी षड्यंत्र चातुर्य का उपयोग कर हिंदी की छाती पर अपने वर्चस्व का खूँटा गाड़ लिया। यह किस एक महापुरुष की कृपा का फल है , इस पर बार-बार बोलने का कोई लाभ नहीं। लेकिन जब बात समाज को बचाने में साहित्य की भूमिका की आएगी तो उन्हीं दंभियों में से कई अपनी वे कीलें ले-लेकर निकल आएंगे जो उन्होंने कभी हिंदी सेवा के नाम पर हिंदी भाषा , साहित्य और समाज के चक्के में ठोंकी थीं। उन्होंने वे कीलें ठोंकी तो थीं हिंदी के चक्के की हवा निकालने के लिए , लेकिन सहस्राब्दियों से वंचित समाज की अंतर्निहित चेतना ने उसका भी उपयोग कर लिया। वह उपयोग उसने अपनी मजबूती बढ़ाने में किया। आखिरकार गाड़ी और ज्यादा मजबूती से समय की सड़क पर जम गई और बेहवा ही चलने लगी । लढ़िये की तरह। लढ़िये की ये खासियत है कि वह ज़रा धीमे चलती है , लेकिन जब...