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हिंदी वालों का दंभ और समाज में उनकी भूमिका

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इष्ट देव सांकृत्यायन 60 के बाद की जो हिंदी है , दंभ से उसका चोली-दामन का साथ है। क्योंकि 47 में जो संविधान सभा के बहुमत के बावजूद हिंदी के राष्ट्रभाषा बनाए जाने का विरोध कर रहे थे और आखिरकार उसे अपने षड्यनत्रकारी दुष्चक्र में फँसाकर राजभाषा के दायरे में सीमित कर ही डाला , उन्होंने ही अपने उसी षड्यंत्र चातुर्य का उपयोग कर हिंदी की छाती पर अपने वर्चस्व का खूँटा गाड़ लिया। यह किस एक महापुरुष की कृपा का फल है , इस पर बार-बार बोलने का कोई लाभ नहीं। लेकिन जब बात समाज को बचाने में साहित्य की भूमिका की आएगी तो उन्हीं दंभियों में से कई अपनी वे कीलें ले-लेकर निकल आएंगे जो उन्होंने कभी हिंदी सेवा के नाम पर हिंदी भाषा , साहित्य और समाज के चक्के में ठोंकी थीं। उन्होंने वे कीलें ठोंकी तो थीं हिंदी के चक्के की हवा निकालने के लिए , लेकिन सहस्राब्दियों से वंचित समाज की अंतर्निहित चेतना ने उसका भी उपयोग कर लिया। वह उपयोग उसने अपनी मजबूती बढ़ाने में किया। आखिरकार गाड़ी और ज्यादा मजबूती से समय की सड़क पर जम गई और बेहवा ही चलने लगी । लढ़िये की तरह। लढ़िये की ये खासियत है कि वह ज़रा धीमे चलती है , लेकिन जब...

स्वतंत्र भारत : एक टाइमलाइन

इष्ट देव सांकृत्यायन    Ø   बच्चों के लिए कुछ बिंदु ·          बिंदुओं के बीच-बीच में टिप्पणियां अर्धशतकीय  युवाओं द्वारा युवाओं के लिए युवाओं की हैं.  v   अगस्त 14, 1947 धार्मिक आधार पर भारत का विभाजन. v   मार्च 1971 पांचवीं लोकसभा का गठन... गरीबी हटाओ का नारा भी श्रीमती इंदिरा गांधी ने इसी चुनाव में दिया था. आप देख ही रहे थे , उसके बाद देश में गरीबी कहीं बची थी. वो तो उस ‘ गरीबी हटाओ ’ की लोकप्रियता से घबरा कर दुबारा से थोड़ी-बहुत गरीबी तलाशने के लिए मोदी जी को नोटबंदी करनी पड़ी और तबसे देश में चारों तरफ गरीबी फैली दिखने लगी. ख़ैर , इसी परम लोकप्रिय और महान नारे को लेकर सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने एक नाटक लिखा था – अब गरीबी हटाओ. [ विधि के अनुसार यह लोकसभा चलती तो इसका अधिकतम कार्यकाल होता फरवरी 1976 तक] लेकिन इसके पहले ही v   जून 12, 1975 इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने चुनावी भ्रष्टाचार के आधार पर श्रीमती इंदिरा गांधी के निर्वाचन को ही अवैध ठहरा दिया.   [...

इमरजेंसी बनाम ट्वीट

इष्ट देव सांकृत्यायन  बेशक इतने जहर की खेती कुछ दिनों में ही नहीं हुई है। लेकिन भारत की जनता ने आपको सत्ता सौंपी है पात्रा जी! किसलिए ? केवल बैठकर ट्वीट करने के लिए ? कल्पना करिए , केरल सरकार ने जो संसद के दोनों सदनों से पारित जिस विधि के विरुद्ध प्रस्ताव पारित किया , वह अगर उसने श्रीमती इंदिरा गांधी के समय में किया होता! तो ? " अफजल हम शर्मिंदा हैं" के नारे अगर उस समय लगे होते , तो ? शरजील ने या इन मोहतरमा ने जो बकवास की , वह श्रीमती इंदिरा गांधी के समय में हुई होती तो ? सोचिए , अपना कार्यकाल पूरा कर चुकी एक लोकसभा , जिसके होने का कोई अर्थ नहीं रह गया था , द्वारा संविधान के मूलभूत ढांचे में किया गया परिवर्तन आज मूलभूत ढांचे का अंग माना जा रहा है. न तब उस पर किसी को उंगली उठाने की हिम्मत हुई और न अब है.... तानाशाह तो आप बिना हुए ही कहे जा रहे हैं. जब आरोप लगना ही हो तो पहले जिस नाते लगा हो उसे सच करके दिखाना चाहिए.... फिर आगे किसी को झूठा आरोप लगाने की भी हिम्मत नहीं होगी. वरना ऐसे ही शाहीन बाग , बेनिया बाग और फलाना-ढिमका होते रहे...

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