Beyond popular outrage
मैं मानता हूं कि टीम अन्ना ने भ्रष्टाचार रोकने के लिए एक सार्थक शुरुआत की है. मैं अन्ना के मुद्दे और आंदोलन दोनों के पक्ष में रहा हूं और आगे भी रहूंगा. मेरे कुछ मित्र इस विषय पर ज़रा हटकर सोचते हैं. एक आदर्श लोकतंत्र की यह शर्त है कि वहां जितना महत्व समर्थन के लिए है, विरोध के प्रति उतना ही सम्मान होना चाहिए. हमारे विरुद्ध सोचने वालों के भी अपने तर्क हैं और अपनी चिंताएं हैं. वरिष्ठ पत्रकार विशाल दुग्गल इस मुद्दे और आंदोलन के विरुद्ध तो नहीं हैं, लेकिन अलग ढंग से सोचते हैं. अब जब इस पर हल्ले का माहौल बीत चुका है, मेरा मानना है कि अगर हम वाक़ई भ्रष्टाचार मिटाना चाहते हैं तो इन मुद्दों पर भी सोचा जाना चाहिए. श्री दुग्गल का पूरा लेख आपके विचार के लिए: इष्ट देव सांकृत्यायन Corruption today has seeped into the vitals of India’s body politic, acquiring frighteningly menacing proportions to the extent that any fresh disclosure of a scam has ceased to shock the people any more. What has accentuated the citizens’ growing disenchantment with the system is the connivance o...