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Showing posts from May, 2010

यात्रा क्षेपक

--हरिशंकर राढ़ी मैं अपनी यात्रा जारी रखता किन्तु न जाने इस बार मेरा सोचा ठीक से चल नहीं रहा है। व्यवधान हैं कि चिपक कर बैठ गए हैं। खैर, मैं कोडाईकैनाल से मदुराई पहुँचूँ और आगे की यात्रा का अनुभव आपसे बांटूं , इस बीच में एक क्षेपक और जुड़ जाता है। इस क्षेपक का अनुभव और अनुभूतियां मुझे उस लम्बी यात्रा को रोककर बीच में ही एक और प्रसंग डालने पर बाध्य कर रही हैं। ऐसा कुछ खास भी नहीं हुआ है। बात इतनी सी है कि इस बार भी गर्मियों में गाँव जाना ही था। दिल्ली से पूर्वी उत्तर प्रदेश की यात्रा , ट्रेन की भीड -भाड , मारा-मारी , भागमभाग और उबालती गर्मी भी इस वार्षिक यात्रा को रोक नहीं पाते। आरक्षण लेने में थोड़ी सी देर हो गर्ई।हालांकि इसे देर मानना ठीक नहीं होगा। अभी भी निश्चित यात्रा तिथि में ढाई माह से ज्यादा का समय था। पता नहीं रेल मंत्रालय को ऐसा क्यों लगता है कि लोग अपने जीवन की सारी यात्राओं की समय सारणी बनाकर बैठे हैं और अग्रिम आरक्षण की समय सीमा तीन माह कर देना लोगों के हित में रहेगा! शायद पूर्व रेलमंत्री श्री लालू प्रसाद यादव का तथाकथित कुशल प्रबंधन यही हो। तीन माह पहले ही ही जनता के

कोडाईकैनाल में

--हरिशंकर राढ़ी हमारी बस अपनी तीव्र गति से प्रकृति का स्पर्श करती हुई कोडाईकैनाल की तरफ बढ़ी जा रही थी।पर्वतमाला हमारे साथ-साथ चल रही थी और हम उत्सुक थे कि हम इनके अन्दर प्रवेश करें। इसी पर्वतपाद प्रदेश में बस चालक ने एक रेस्तरां पर बस रोकी और उस खुले से रेस्तरां में हम भूख या स्वाद से ज्यादा उस उन्मुक्त से वातावरण का स्वाद लेने के लिए कुछ खाया पीया। यहाँ से हम पहाडियों की गोद में समाने लगे। बलखाती सर्पाकार सडक पर बस हिचकोले लेने लगी और फिर पूरी बस बच्चों की मौजमस्ती से गूँजने लगी। उनके लिए यह प्रायः नया अनुभव था, ऊपर से वे एक समूह में थे । सडक का रोमांच मेरे लिए तो कुछ खास नहीं था क्योंकि मैं जम्मू , समूचे गढवाल क्षेत्र से लेकर काठमांडू तक हिमालय की यात्रा कर चुका हूँ। हिमालय की उच्चता के सम्मुख यह यात्रा कुछ भी नहीं थी परन्तु आकर्द्गाण यहां भी कम नहीं था । सितम्बर का अन्त था, दक्षिण भारत में गर्मी यूँही कम नहीं थी पर यहां की बात ही कुछ और थी । ठण्डी-ठण्डी हवा ने जैसे द्रारीर के साथ मन आत्मा को भी शीतल कर दिया हो! यह पर्वतीय यात्रा लगभग दो घण्टे की होती है। बस टूअरिस्ट थी, अतः तेज

हैप्पी मदर्स दे के अवसर पर !

आज के आधुनिक परिवेश में माँ की स्थिति को उकेरती मेरी पसंद की स्वरचित कविता मैं और वो ? मुझे एसी में नींद आती है , उसके पास टेबल फेन है जो आवाज़ करता है । मैं ऊंचे दाम के जूते पहनता हूँ , उसके पास बरसाती चप्पल है । मैं हँसता हूँ वो रो देती है, मैं रोता हूँ वो फूट पड़ती है ! मैं, मैं हूँ वो मेरी माँ है । [] राकेश ' सोहम '

कार्टूनिस्ट त्रयम्बक शर्मा : एक मुलाक़ात

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वर्ष २००८ में नेशनल लेवल पर पांडिचेरी में ' टेन आउटस्टेंडिंग यंग इंडियन अवार्ड' से अम्मानित प्रसिद्द कार्टूनिस्ट त्रयम्बक शर्मा विगत दिनों जबलपुर आये । वे शहर में भारतीय सुरक्षा संस्थान कि उत्पादन इकाई द्वारा आयोजित कार्टून प्रदर्शनी में हिस्सा लेने आये थे । मैं उनसे दोपहर 1.30 मिला । वे स्थानीय पत्रकारों से घिरे बैठे थे । मुझे देखकर ख़ुशी से चहक उठे - 'राकेश जी !' मित्रवत लगभग गले मिलने की मुद्रा में हाथ मिलाया और धीरे से कान में फुफुसाए - मित्र ! सुबह से इन्होने घेर रखा है । ' मैंने अपनी विधा में कहा - आप चीज़ ही ऐसी हैं । वे ज़ोर से हंस पड़े - लो एक और आ गए आपके शहर के व्यंग्यकार । और वे फिर कुछ ठन्डे वगैरह का आर्डर देकर इंटरव्यू देने में व्यस्त हो गए । इसी साक्षात्कार से लिए गए कुछ अंश दे रहा हूँ ताकि हमारा इयत्ता परिवार सीसे कार्टूनिस्ट से परिचित हो सके । समस्त चित्र स्थानीय अखबारों से साभार हैं । श्री त्रियंबक शर्मा जी एक अखबार में मार्केटिंग executive थे । लेकिन चीजों, ख़बरों और परिस्थितियों पर कटाक्ष करने की आदत ने उन्हें कार्टून बनाने के लिए प्रेरित

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