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मेरा गाँव मेरा देश !

[] राकेश 'सोहम' पिछले दिनों बारिश शुरू हुई । बारिश का मौसम है । लेकिन मेंढकों की टर्र टर्र सुनाई नहीं दी ? सिक्सटीज़ - सेवटीज़ में एक फिल्म रिलीज़ हुई - मेरा गाँव मेरा देश । यह एक डाकू की पृष्ठभूमि पर आधारित खूबसूरत फिल्म है । धर्मेन्द्र ने गाँव के नौजवान और विनोद्खन्ना ने डाकू जब्बर सिंह का किरदार निभाया है । इस फिल्म का वह दृश्य याद करें जब रात को डाकू जब्बर सिंह ने धर्मेन्द्र को अपने अड्डे पर रस्सी से बांधकर कैद कर रखा है । बैकग्राउंड में झींगुर और मेंढकों के टर टराने की आवाज़ दृश्य को भयानक बना रही है । जब्बर सिंह धर्मेन्द्र को मारना चाहता है लेकिन तभी उसकी सहायक खलनायिका बिजली सामने आती है और अपने तरीके से मारने की बात रखती है । डाकू जब्बर सिंह मान जाता है और खुश होकर अट्टहास लगाता है । बिजली हाथ में चाक़ू थामे धर्मेन्द्र पर हमला करने आती है लेकिन गबरू नौज़वान पर रीझ जाती है और मदहोश होकर थिरकने लगती है । उसके होंठों से लताजी का मखमली गीत फूट पड़ता है - 'मार दिया जाए कि छोड़ दिया जाए बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाए ?' जंगल की प्राकृतिक खामोशी में यह गाना क्या मस्त कर...

क्यों न रोएँ ?

शीर्षक पढ़ते ही आपने मुझे निराशावादी मान लिया होगा। किसी तरह कलेजा मजबूत करके मैं कह सकता हूँ कि मैं निराशावादी नहीं ,आशावादी हूँ। पर मेरे या आपके ऐसा कह देने से इस प्रश्न का अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता। सच तो यह है कि आशावाद के झूठे सहारे हम अपने जीवन का एक बडा हिस्सा निकाल लेते हैं। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। पर आंसू भी कम बलवान नहीं होते और कई बार हम अपने आंसुओं को दबाने के असफल प्रयास में भी रो पड़ते हैं। चलिए, माना हमें रोना नहीं चाहिए, लेकिन क्या इतना कह देने से रोने की स्थितियां उलट जाएंगी ?क्या हर भोले-भाले और निर्दोष चेहरे पर असली हँसी आ जाएगी ? कहाँ से शुरू करें ?अभी कल की बात है, बाजार गया था। किराने की एक बड़ी सी दूकान पर एक मजदूर ने दाल का भाव पूछा। चैरासी रुपये किलो! बेचारे का चेहरा उतर गया। “पाव कितने की हुई ?”इक्कीस रुपये। डरता हुआ सा वह धीरे से वापस चला गया। मैं सोचने को विवश हो गया कि आज वह परिवार क्या खाएगा? कई दिनों बाद सौ रुपये की दिहाड़ी लगाने वाला मजदूरकिस कलेजे से अपनी ”आय” का एक चैथाई एक वक्त की दाल पर खर्च कर देगा ? अब दाल रोटी से नीचे क्या है! शायद न...

एक श्रद्धांजलि उन्हें भी

कल उनका अन्तिम संस्कार हो गया। माफी चाहूंगा ,वहां इसे संस्कार नहीं बोलते। संस्कार वहां होते ही नहीं। यूँ समझिए कि क्रिया-कर्म हो गए। दफना दिए गए।लगभग दो सप्ताह तक यूँ ही पड़े रहे। मृत शरीर को देखकर कोई पुत्र, कोई पत्नी तो कोई वास्तविक उत्तराधिकारी होने का दावा कर रहा था।गनीमत थी कि क्रिया कर्म हो गया। ऐसा विवाद अपने देश में होता और कोर्टकेस हो जाता तो मिट्टी भी नहीं मिलती बेचारी काया को! खैर, क्रिया कर्म बड़ा शानदार हुआ।उनका जीवन भी तो बड़ा शानदार था।कई लोग उन्हें जिन्दा देखकर मरे, कई मरने के बाद मर गए।मुझे समझ नहीं आया।मानसिक मृत्यु के बाद ऐसे 12 लोगों को शारीरिक आत्महत्या की क्या आवश्यकता थी?परन्तु वे उनके फैन थे और फैन को कुछ भी करने का अधिकार होता है ।बहरहाल , उनके क्रियाकर्म पर विशाल जलसा हुआ- रंगारंग कार्यक्रम पेश किए गए।गाने गाए गए, डांस हुआ। शमशान भी गूंज उठा।उस मस्ती में कहां की वसीयत और कहां की आत्महत्या! सारे विवाद संगीत में डूब गए। जिस ताबूत में वे दफनाए गए,सुना कि बेशकीमती था। कीमती चीजों से उन्हें गहरा लगाव था।उसी के लिए जिए वे!जो भी किया ,बहुत बड़ा किय...

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