वास्तव में यह माओवादियों की युद्ध रणनीति को न समझने का मामला
तथाकथित सभ्य समाज में माओवादियों द्वारा 75 जवानों को मौत के घाट उतारना उतना ही निंदनीय है, जितना स्टेट पावर द्वारा नक्सलियों के दमन के लिए चलाया जा रहा आपरेशन ग्रीन हंट। भावुकता से इतर हटकर यदि हम निरपेक्ष रूप से नक्सलियों और केंद्र सरकार के बीच जारी घमासान का आकलन करने की पहलकदमी करें तो शायद परत दर परत कुछ ऐसे पहलू सामने आएंगे, जिससे दोनों पक्षों को समझने में सहूलियत होगी। वैसे वर्तमान बुद्धिवादी समाज नक्सलवाद को लेकर स्पष्टरूप से दो भागों में बंटा हुआ है। एक वर्ग नक्सलवाद का धूर विरोधी है तो दूसरा वर्ग नक्सलवाद के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैये की वकालत करते हुये नजर आ रहा है। दोनों वर्ग के अपने-अपने तर्क है जबकि आम जनमानस हतप्रभ स्थिति में सारे प्रकरण को देख और सुन रहा है। सैद्धांतिक रूप से भारत में माओवादियों का फंडा पूरी तरह से स्पष्ट है। माओ में थोड़ी बहुत दिलचस्पी रखने वाले लोगों को भी पता है कि माओ सत्ता को बंदूक से हथियाने पर जोर देता है। माओ का यह कथन- शक्ति बंदूक की नली से निकलती है- कितना प्रासांगिक है, इसे लेकर भले ही बहस हो सकती है, लेकिन इस कथन में यकीन करने वाले लोग जमीनी...