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व्यवस्था में कालनेमि

इष्ट देव सांकृत्यायन  ¶ निर्भया के दोषियों को फांसी होने से क्या बलात्कार रुक जाएंगे ?¶ ¶ यह प्रश्न आज वही उठा रहे हैं जो खुद को गलती से किसी की कुहनी लग जाने पर उसकी जान ले लेना चाहते हैं. ¶ तब कहां चली जाती है सारी सहिष्णुता तुम्हारी ? क्यों नहीं सुझती तुम्हें तब अहिंसा ? ¶ ये वही लोग हैं जो अपना पर्स चोरी हो जाने पर पूरे सिस्टम , पूरे देश और देश की सारी जनता को कोसने लगते हैं. गोया सब केवल इनका पर्स चुराने में जुटे पड़े थे. ¶ लेकिन सवाल यह है कि जब दोषी को सजा देनी ही नहीं , बलात्कार जैसा जघन्य अपराध करने वाले को एक मदरसे के फर्जी दस्तावेज के आधार पर नाबालिग मान लिया जाना है और उसे इस महान कृत्य के लिए पुरस्कार दिया जाना है , तो फिर जरूरत क्या है दुनिया में किसी सिस्टम की ? क्यों न चलने दिया जाए जंगल राज ? ¶ और बताएं आपको , दुनिया में कोई सिस्टम नहीं होना चाहिए , यह भी एक सिद्धांत है और इस सिद्धांत के आज के दुनिया में सबसे बड़े प्रतिपादकों वही हैं , जिनके अपने सिस्टम ने थ्येना आन मन चौक पर एक ही झटके में लाखों युवाओं को टैंक लगाकर उड़ा दिया था. उनका अप...

भीड़ का न्याय, न्याय का तंत्र

मीलॉर्ड , योर ऑनर , हुजूर , माई-बाप , श्रीमान महोदय कहाँ आप और कहाँ मैं. मेरी क्या औकात कि मैं आपके सामने कुछ कहूँ. कहना तो छोड़िए , आपसे कुछ पूछना भी मेरे बस की बात नहीं. आपसे तो वो भी नहीं पूछ सकते जो सबसे पूछते हैं. सुनते हैं कि वो जनता के प्रतिनिधि हैं और वो जनता के प्रति जवाबदेह हैं. लेकिन जनता को उन्हें कोई जवाब देते मैंने कभी देखा नहीं. बेचारी जनता , उसके पास सवाल ही उठाने की औकात नहीं है , जवाब वो दें भी तो कहाँ से! वो तो बस उनके वादे सुन लेती है और फिर पाँच साल बाद उनमें से जिन किन्हीं के भी जैसे भी पूरे होने का वो जो भी जवाब अपने-आप ही दे दें वही उसे मान लेना होता है. अब यह जवाब चाहे उसकी जान-माल के सुरक्षा के वादे का हो , चाहे सम्मान का , या फिर रोज़गार या आर्थिक विकास का , महँगाई या भ्रष्टाचार का.. उस बेचारी के पास सुनने के अलावा कोई चारा नहीं होता. सत्तर साल पहले जब लोकतंत्र का पहले-पहल हल्ला मचा था तब ज़रूर लोगों को यह भ्रम रहा होगा कि वो सरकार बनाएंगे , पर अब वो समझ गए हैं कि वो सरकार नहीं बनाते , सरकार उन्हें बनाती है. चूँकि हर पाँच साल बाद सरकारजी को यह लीला दि...

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