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चित्रकूट के रामघाट पर

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हरिशंकर राढ़ी  रामघाट पर हमारा पहला मुकाबला बोटिंग वालों से हुआ। घाट की ओर रुख करते ही बोटिंग वाले कुछ इस तरह हम पर टूटे जैसे मधुमक्खियों, ततैया या बर्र का झुण्ड  टूटता है। केवल उनकी खींचतान और शोर -शराबा । मुझे ऐसे मुकाबलों से सख्त नफरत है। एक-दो बार मना करने के बावजूद जब उनकी दुकानदारी बंद नहीं हुई तोे गुस्सा फूट पड़ा। यार चैन से जीने दोगे या नहीं ? कोई यात्री तुम्हें ग्राहक के अलावा भी कुछ नजर आता है कि नहीं ? कौन किस मूड और किस परिस्थिति में आया है, तुम्हें इससे फर्क पड़ता है या नहीं ? और न जाने क्या - क्या ! थोड़ी सी भीड़ जमा हुई और फिर कोई खास मनोरंजन न पाकर धीरे-धीरे छंट गई। अपने देश  का भीड़तंत्र तो है ही ऐसा। रामघाट की एक नौका        छाया : हरिशंकर राढ़ी  अकेला पाकर रामघाट की सीढि़यों पर बैठ गया। शांत  होने का प्रयास करने लगा और सोचने भी लगा। आखिर ऐसा हुआ क्यों जा रहा है। लोग तीर्थों पर इसलिए जाते रहे होंगे कि कुछ शांति  मिल सके; थोड़ा सा स्वयं को भी देखने का अवसर मिल सके। भौतिकवाद और मौज-मस्ती स...

PANCHVATI AND NASIK

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यात्रा वृत्तांत                                       पंचवटी में                                                                     -हरिशंकर राढ़ी  ब्रह्मगिरि से वापसी अंजनेरी पर्वत का एक दृश्य  गोदावरी उद्गम के दर्शन  से संतुष्टि  लेकिन उसके जन्मस्थल पर ही प्रदूषण  से असंतुष्टि का  भाव लेकर हम वापस चले। वापसी की यात्रा सुगम थी और सूर्य का ताप कम हो जाने से सुहावनी लग गई रही थी। इस क्षेत्र में लाल बंदरों की बहुतायत है। उतरते समय वे सीढि़यों पर उछल-कूद करते हुए अपने कौतुकों से सबका मनोरंजन कर रहे थे। एक बच्चे को धमकाकर एक कपि जी ने पानी की बोतल छीनी और महोदय उसका ढक्कन किसी समझदार आदमी की तरह खोलकर पानी पीने लगे। इसके बाद एक आम देशी  नागरिक की...

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