महाराज का तो जो भी कुछ होना-जाना था, सो सब बीत-बिता गया. वह ज़माना और था. अब की तरह तब न तो नमकहराम जनता थी और न यह लोकतंत्र का टोटका ही आया था. अरे बाप राजगद्दी पर बैठा था, मां राजगद्दी पर बैठी थी, पुश्त दर पुश्त लोग राजगद्दी पर ही बैठते चले आए थे, तो वह कहां बैठते! यह भी कोई सोचने-समझने या करने लायक बात हुई? जिसका पूरा ख़ानदान राजगद्दी पर ही बैठता चला आया हो तो वह अब चटाई पर थोड़े बैठेगा! ज़ाहिर है, उसको भी बैठने के लिए राजगद्दी ही चाहिए. दूसरी किसी जगह उसकी तशरीफ़ भला टिकेगी भी कैसे? लेकिन इस नसूढ़े लोकतंत्र का क्या करें? और उससे भी ज़्यादा बड़ी मुसीबत तो है जनता. आख़िर उस जनता का क्या करें? कई बार तो महारानी का मन ये हुआ कि इस पूरी जनता को सड़क पर बिछवा के उसके सीने पर बुल्डोजर चलवा दें. जबसे लोकतंत्र नाम की चिड़िया ने इस इलाके में अपने पंख फड़फड़ाए हैं, जीना हराम हो गया. और तो और, जनता नाम की जो ये नामुराद शै है, इसका कोई ईमान-धरम भी नहीं है. आज इसके साथ तो कल उसके साथ. ज़रा सा शासन में किसी तरह की कोताही क्या हुई, इनकी भृकुटी तन जाती है. इसकी नज़र भी इतनी कोताह है कि क्या कहें! जो कुछ भी हो रह...