Posts

Showing posts with the label मजाक

विनम्र अनुरोध

मेरा मानना है कि राष्ट्र के प्रथम नागरिक द्वारा की गई हर बचत को राष्ट्रीय बचत माना जाना चाहिए और उसे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में महामहिम का महत्वपूर्ण योगदान माना जाना चाहिए. चाहे वह सरकारी धन बर्बाद कर की गई निजी बचत ही क्यों न हो. आपका क्या ख़याल है?

सस्ते से सस्ती दिल्ली

लीजिए जनाब! ख़ुश हो जाइए. क्या कहा? क्यों ख़ुश हों? अरे भाई ख़ुश होने के लिए भी आपको कोई कारण चाहिए? असली आदमी हमेशा ख़ुश होना चाहता है, बस इसलिए आप भी ख़ुश हो जाइए. और कोई ख़ास कारण चाहिए तो आपको बता दूं कि दिल्ली और मुंबई नाम के जो शहर इस धरती पर हैं, वे दुनिया के सबसे सस्ते शहर हैं. यह कोई भारत सरकार नहीं कह रही है, जिसकी हर बात को आप सिर्फ़ आंकड़ों की रस्साकशी मानते हैं. और न किसी भारतीय एजेंसी ने ही जिनके बारे में आप यह मानकर ही चलते हैं कि उसे सर्वे का ठेका ही मिल जाना बहुत है. एक बार उसे ठेका दें और बेहतर होगा कि सर्वे से आप जो निष्कर्ष चाहते हैं वह उसे पहले ही बता दें. फिर आप जिसे जैसा देखना या दिखाना चाहते हैं, उसे वैसा ही देखने और दिखाने का पूरा इंतज़ाम सर्वे एजेंसियां कर देंगी. अब तो लोकतंत्र के मामले में भी वे इसे सच साबित कर देने में भी सक्षम हो गई हैं, इसमें भी कोई दो राय नहीं रह गई है. लेकिन नहीं साह्ब यह बात उन भारतीय एजेंसियों ने भी नहीं कही है. यह कहा है एक अतयंत प्रतिष्ठित स्विस बैंक ने. और आप तो जानते ही हैं ईमानदारी के मामले में हमारे देश ही क्या, दुनिया भर के बड़े-बड़े लोग स...

पुरुख के भाग

‘हे दू नम्मर! अब का ताकते हो? जाओ. तुमको तो मालुमे है कि तुम्हरा नाम किलियर नईं हुआ. भेटिंगे में रह गया है.’ दो नंबर ने कहा कुछ नहीं. बस उस दफ्तर के चपरासी को पूरे ग़ुस्से से भरकर ताका. इस बात का पूरा प्रयास करते हुए कि कहीं उसे ऐसा न लग जाए कि वो उसे हड़काने की कोशिश कर रहे हैं, पर साथ ही इस बात का पूरा ख़याल भी रखा कि वह हड़क भी जाए. आंखों ही आंखों के इशारे से उन्होंने समझाना चाहा कि अबे घोंचू, बड़ा स्मार्ट बन रहा है अब. इसी दफ्तर में एक दिन मुझे देख कर तेरी घिग्घी बंध जाती थी. अब तू मुझे वेटिंग लिस्ट समझा रहा है और अगर कहीं उसमें मेरा नाम क्लियर हो गया होता तो आज तू दो हज़ार बार मेरे कमरे के कोने-अंतरे में पोंछा मारने आता कि कहीं से मेरी नज़र तेरे ऊपर पड़ जाए. ऐसा उन्होंने सोचा, लेकिन कहा नहीं. वैसे सच तो ये है कि यही उनकी ख़ासियत भी है. वो जो सोचते हैं कभी कहते नहीं और जो कहते हैं वो तो क्या उसके आसपास की बातें भी कभी सोचते नहीं हैं. वो वही दिखने की कोशिश करते हैं जो हैं नहीं और जो हैं उसे छिपाने में ही पूरी ऊर्जा गंवा देते हैं. ये बात बहुत दिनों तक उस दफ्तर में रहे होने के नाते उस चपरासी क...

युवराज का संस्कार

महाराज का तो जो भी कुछ होना-जाना था, सो सब बीत-बिता गया. वह ज़माना और था. अब की तरह तब न तो नमकहराम जनता थी और न यह लोकतंत्र का टोटका ही आया था. अरे बाप राजगद्दी पर बैठा था, मां राजगद्दी पर बैठी थी, पुश्त दर पुश्त लोग राजगद्दी पर ही बैठते चले आए थे, तो वह कहां बैठते! यह भी कोई सोचने-समझने या करने लायक बात हुई? जिसका पूरा ख़ानदान राजगद्दी पर ही बैठता चला आया हो तो वह अब चटाई पर थोड़े बैठेगा! ज़ाहिर है, उसको भी बैठने के लिए राजगद्दी ही चाहिए. दूसरी किसी जगह उसकी तशरीफ़ भला टिकेगी भी कैसे? लेकिन इस नसूढ़े लोकतंत्र का क्या करें? और उससे भी ज़्यादा बड़ी मुसीबत तो है जनता. आख़िर उस जनता का क्या करें? कई बार तो महारानी का मन ये हुआ कि इस पूरी जनता को सड़क पर बिछवा के उसके सीने पर बुल्डोजर चलवा दें. जबसे लोकतंत्र नाम की चिड़िया ने इस इलाके में अपने पंख फड़फड़ाए हैं, जीना हराम हो गया. और तो और, जनता नाम की जो ये नामुराद शै है, इसका कोई ईमान-धरम भी नहीं है. आज इसके साथ तो कल उसके साथ. ज़रा सा शासन में किसी तरह की कोताही क्या हुई, इनकी भृकुटी तन जाती है. इसकी नज़र भी इतनी कोताह है कि क्या कहें! जो कुछ भी हो रह...

Most Read Posts

रामेश्वरम में

Bhairo Baba :Azamgarh ke

इति सिद्धम

Azamgarh : History, Culture and People

Maihar Yatra

विदेशी विद्वानों के संस्कृत प्रेम की गहन पड़ताल

...ये भी कोई तरीका है!

निज़ामाबाद और शीतला माता

पेड न्यूज क्या है?