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चर्चा में ‘समाज का आज’

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नरेश दाधीच जयपुर  पीस फाउण्डेशन के तत्वावधान में आज मानसरोवर स्थित उनके संगोष्ठी कक्ष में डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल की नव प्रकाशित पुस्तक समाज का आज पर चर्चा गोष्ठी आयोजित की गई. प्रारम्भ में फाउण्डेशन के अध्यक्ष प्रो. नरेश दाधीच ने पुष्प गुच्छ देकर लेखक का स्वागत किया  और फिर कृतिकार डॉ अग्रवाल ने अपनी पुस्तक के बारे में जानकारी दी. उन्होंने बताया कि मूलत: एक अपराह्न दैनिक के स्तम्भ के रूप में लिखे गए ये आलेख समकालीन देशी-विदेशी समाज की एक छवि प्रस्तुत करते हैं. डॉ अग्रवाल ने कहा कि ये लेख विधाओं की सीमाओं के परे जाते हैं और बहुत सहज अंदाज़ में हमारे समय के महत्वपूर्ण सवालों से रू-ब-रू कराने  का प्रयास करते हैं. कृति चर्चा की शुरुआत की जाने-माने पत्रकार श्री राजेंद्र बोड़ा ने. उनका कहना था कि यह किताब बेहद रोचक है और हल्के फुल्के अंदाज़ में बहुत सारी बातें कह जाती हैं. क्योंकि ये लेख एक अखबार  के लिए लिखे गए हैं इसलिए इनमें अखबार की ही तर्ज़ पर इंफोटेनमेण्ट है‌ यानि सूचनाएं भी हैं और मनोरंजन भी.  बोड़ा ने किताब की भाषा की रवानी की विशेष रूप से सराहना की और यह...

ब्लॉग बनाम माइक्रोब्लॉग

इष्ट देव सांकृत्यायन   इससे पहले :   वर्चुअल दुनिया के रीअल दोस्त और आयाम से विधा की ओर इस सत्र के बाद मेरे पुराने साथी अशोक मिश्र से मुलाक़ात हुई. मालूम हुआ कि अब वे वहीं विश्वविद्यालय की ही एक साहित्यक पत्रिका का संपादन कर रहे हैं. ज़ाहिर है, पुराने दोस्तों से  मिलकर सबको जैसी ख़ुशी होती है, मुझे भी हुई. हम लोग जितनी देर संभव हुआ, साथ रहे. प्रेक्षागृह के बाहर निकले तो मालूम हुआ कि अभी आसपास अभी कई निर्माण चल रहे हैं. ये निर्माण विश्वविद्यालय के ही विभिन्न विभागों, संकायों, संस्थानों और छात्रावासों आदि के लिए हो रहे थे. विश्वविद्यालय से ही जुड़े एक सज्जन ने बताया कि तीन साल पहले तक यहां कुछ भी नहीं था. जैसे-तैसे एक छोटी सी बिल्डिंग में सारा काम चल रहा था. राय साहब के आने के बाद यह सारा काम गति पकड़ सका और विश्वविद्यालय ने केवल पढ़ाई, बल्कि साहित्य-संस्कृति की दुनिया में भी अपनी धाक जमाने लायक हो पाया. अब तो टीचरों से लेकर स्टूडेंटों तक में (माफ़ करें, ये उन्हीं के शब्द हैं) काफ़ी उत्साह है. लोग इसे आपकी दिल्ली के जेएनयू से कम नहीं समझते. अच्छा लगा जानकर कि विश्वव...

आयाम से विधा की ओर

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इष्ट देव सांकृत्यायन  यह भी पढ़ लें : वर्चुअल दुनिया के रीअल दोस्त  वर्धा स्थित सेवाग्राम अश्रम परिसर में बापू कुटी अगले दिन सुबह मैं ठीक समय पर तैयार होकर नागार्जुन सराय आ गया. बस निकलने ही वाली थी, इसलिए और कुछ भी किए बग़ैर मैं सीधे बस में बैठ गया. बस में भरपूर हंसी-ठिठोली करते थोड़ी ही देर में हम लोग सेवाग्राम पहुंच गए. बिलकुल प्राकृतिक वातावरण में मौजूद एक बड़े से परिसर में कई छोटे-छोटे घर... प्रकृतिप्रदत्त सुविधाओं से संपन्न. खपरैल के इन्हीं  घरों में से एक में गांधी जी का ऑफिस हुआ करता था, एक में वह रहते थे और एक में भोजन करते थे. एक घर के बारे में बताया गया कि यहां एक बार जब वे बीमार पड़ गए थे, तब रहे थे. यह उनके लिए उद्योगपति जमनालाल बजाज ने बनवाया था. कुछ लोग बड़ी श्रद्धापूर्वक गांधी जी को याद कर रहे थे, कुछ उनके ब्रह्मचर्य के प्रयोगों की चर्चा में मशगूल थे, कुछ क्रांतिकारियों के प्रति उनके दृष्टिकोण और कुछ उनके अहिंसा और सत्य पर किए गए प्रयोगों के. वैसे यशपाल के माध्यम से गांधी जी को जानने वालों की भी कमी नहीं थी. अच्छी बात यह थी कि सभी ने ...

वर्चुअल दुनिया के रीअल दोस्त

इष्ट देव सांकृत्यायन   डॉ. अरविंद मिश्र का ब्लॉग क्वचिदन्यतोsपि बहुत दिनों से पढ़ता आ रहा था. वैज्ञानिक विषयों पर और उससे इतर भी, लोकजीवन के विविध विषयों पर उनका लेखन प्रभावित करने वाला है. हमारा एक-दूसरे के ब्लॉग पर आना-जाना लगभग अच्छे पड़ोसियों जैसा रहा है, यह अलग बात है कि मुख़ातिब नहीं हो सके थे, पर होने का मन था. वयंग्यकार और आम बातचीत को भी तुकबंदी में ढालने की क्षमता रखने वाले अविनाश वाचस्पति मुन्नाभाई से काफ़ी पहले एक बार की मुलाक़ात तो थी. यह मुलाक़ात लगभग उन्हीं दिनों की थी, जब ब्लॉगबुखार वैसे ही फैल रहा था, जैसे आजकल डेंगू. उसके बाद फ़ोन पर हमारी बातचीत ज़रूर हुई, लिखना-पढ़ना तो लगा ही रहा, पर मुलाक़ात नहीं हुई. ब्लॉगिंग के बिलकुल शुरुआती दौर में ही मुलाक़ात हुई थी फ़ुरसतिया यानी अनूप शुक्ल जी से. संस्थागत मीटिंग के लिए कानपुर गया था. गीतकार साथी विनोद श्रीवास्तव से ब्लॉग में साहित्य का ज़िक्र चला तो उन्होंने बताया कि यहां फुरसतिया जी हैं. यह तो मालूम था कि अच्छा लिखने-पढ़ने वाले हैं, क्योंकि उनका ब्लॉग मैं देख चुका था. साहित्य के अलावा और भी बहुत कुछ था हिन्...

अज्ञेय को जनविरोधी कहना अधूरी समझ : नामवर

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हिन्दू कालेज में अज्ञेय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कालेज में अज्ञेय की जन्म शताब्दी के अवसर पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सहयोग से 'आज के प्रश्न और अज्ञेय' विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया. इस दो दिवसीय आयोजन में अनेक महविद्यालयों के अध्यापकों, शोधार्थियों और युवा विद्यार्थियों ने भागीदारी की. उदघाटन समारोह में सुविख्यात आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने कहा कि शब्दों का वैभव अज्ञेय के पूरे कविता संसार में देखा जा सकता है. कलात्मक रचाव और काव्य विन्यास के सन्दर्भ में वे मुक्तिबोध से आगे हैं यह स्वीकार किया जाना चाहिए, वहीं अज्ञेय को जन विरोधी समझ लेना भी अधूरी समझ होगी. उन्होंने कहा कि अज्ञेय को प्रयोगवादी कवि कहा जाता है, लेकिन अज्ञेय प्रयोगवादी कवि नहीं है, वे पूरी परम्परा के प्रतीकों में जैसा इस्तेमाल करते हैं वह सचमुच विरल है. कलात्मक रचाव और काव्य विन्यास के सन्दर्भ में वे मुक्तिबोध से आगे हैं यह स्वीकार किया जाना चाहिए, वहीं अज्ञेय को जन विरोधी समझ लेना भी अधूरी समझ होगी. प्रो. सिंह ने अज्ञेय की चर्चित कविताओं 'नाच' और 'असाध्य ...

व्यंग्य को आलोचना की बैसाखी की जरूरत नहीं

हिन्दी व्यंग्य एवं आलोचना पर लखनऊ में यह राष्ट्रीय संगोष्ठी हुई तो थी 30 नवंबर को ही थी और इसकी सूचना भी भाई अनूप श्रीवास्तव ने समयानुसार भेज दी थी, लेकिन मैं ही अति व्यस्तता के कारण इसे देख नहीं सका और इसीलिए पोस्ट नहीं कर सका. अब थोड़ी फ़ुर्सत मिलने पर देख कर पोस्ट कर रहा हूं. -इष्ट देव सांकृत्यायन हिन्दी व्यंग्य साहित्यिक आलोचना की परिधि से बाहर है ? इस विषय पर आज उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान और माध्यम साहित्यिक संस्थान की ओर से अट्टहास समारोह के अन्तर्गत आयोजित दो दिवसीय विचार गोष्ठी में यह निष्कर्ष निकला कि व्यंग्यकारों को आलोचना की चिन्ता न करते हुए विसंगतियों के विरूद्ध हस्तक्षेप की चिन्ता करनी चाहिए, क्योंकि वैसे भी अब व्यंग्य को आलोचना की बैसाखी की जरूरत नहीं. राष्ट्रीय संगोष्ठी की शुरूआत प्रख्यात व्यंग्यकार के.पी. सक्सेना की चर्चा से शुरू हुई. श्री सक्सेना का कहना था कि हिन्दी आलोचना को अब व्यंग्य विधा को गंभीरतापूर्वक लेना चाहिए.  उन्होंने यह भी कहा कि अब व्यंग्य को आलोचना की बैसाखी की जरूरत नहीं है. व्यंग्य लेखन अपने उस मुकाम पर पहुंच गया है कि  उसने राजनीति, समाज ए...

बाज़ार की बाढ़ में फंस गया मीडिया

हमारा समाज आज बाज़ार और मीडिया के बीच उलझता जा रहा है. बाज़ार भोगवाद और मुनाफे के सिद्धांतों पर समाज को चलाना चाहता है, जबकि मीडिया सरकार की आड़ से अब बाजार की बाढ़ में फंस गया है. यह बात जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के वैश्विक अध्ययन केन्द्र के संयोजक प्रो. आनन्द कुमार ने शहीद भगत सिंह कॉलेज में आयोजित एक संगोष्ठी में कही. ‘ बाजार , मीडिया और भारतीय समाज ’ विषयक इस संगोष्ठी में उन्होंने समाज के सजग लोगों से मीडिया और बाजार दोनों की सीमाओं को नये संदर्भ में समझने का आह्वान करते हुए कहा कि अगर ऐसा न हुआ तो लोकतंत्र के वावजूद मीडिया हमारे समाज में विदुर की जैसी नीतिसम्मत भूमिका छोड़कर मंथरा जैसी स्वार्थप्रेरित भूमिका में उलझती जाएगी. मीडिया का बाजारवादी हो जाना भारत के लोकतंत्र को मजबूत नहीं करेगा. बीते 4 नवंबर को हुई इस संगोष्ठी में शहीद भगत सिंह कॉलेज के प्राचार्य डॉ. पी.के. खुराना ने स्पष्ट किया कि अर्थव्यवस्था में बदलाव के कारण कैसे बाज़ार मजबूत हुआ है और मानवीय मूल्य निरंतर टूटते जा रहे हैं. भारतीय जनसंचार संस्थान में हिंदी पत्रकारिता के पाठ्यक्रम निदेशक डॉ. आनन्द प्रधान ने कहा कि ...

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