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त्रासद विभ्रम का दौर

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  इष्ट देव सांकृत्यायन  ॥श्री गुरुचरण कमलेभ्यो नमः॥ धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से लोगों को लगा होगा कि अब बवाल थम जाएगा। कॉक्रोच अलग प्रसन्न हुए कि वे सरकार से कुछ भी करवा सकते हैं। सरकार ने उस समय राहत की साँस ली कि उसने बला टाल दी। सरकारी लोग इसे मास्टर स्ट्रोक बताने में लग गए। लेकिन यह एक ऐसा भ्रम साबित हुआ , जिसका आज तक कोई जोड़ नहीं हुआ। यह भ्रम केवल सरकार ही नहीं , तथाकथित आंदोलनकारियों , अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों और आम जनता सबके लिए होगा। ग्रहस्थितियाँ ही ऐसी हैं कि पूरी दुनिया भ्रमित है और अभी देर तक रहेगी। हालाँकि एक-एक कर सारा भ्रम छँटेगा। ऐसे-ऐसे रहस्य सामने आएंगे , और ऐसे-ऐसे भ्रम छँटेंगे कि आश्चर्य को भी आश्चर्य होगा। आने वाला समय न केवल भारत , बल्कि पूरी दुनिया के लिए भयावह है। प्राकृतिक दुर्घटनाएँ , असंतोष , जन विद्रोह और सांप्रदायिक दंगे... यह सब दिखाई दे रहे हैं। अराजक तत्त्वों का अहंकार चरम पर होगा और सरकार जितना बैकफुट पर आती जाएगी , उनका यह अहंकार उतना ही प्रबल होता चला जाएगा। इस पूरे उपक्रम से शेयर बाजार भी बहुत बुरी तरह प्रभावित होगा। विश्व बाजार एक बार...

राजा गुरु: हड़बड़ी में गड़बड़ी से बचें

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इष्ट देव सांकृत्यायन      हालाँकि वर्षफल का समग्र आकलन सौरमंडल में वार्षिक मंत्रिमंडल में सभी ग्रहों और उनके दायित्वों तथा गोचर में एक-दूसरे के साथ बन रहे युति-दृष्टि संबंधों के साथ-साथ  किसी देश की अपनी कुंडली में चल रही महादशा-अंतर्दशा का भी ध्यान रखकर किया जाता है। फिर भी , अपने-अपने दायित्व के अनुसार प्रत्येक ग्रह क्या फल देगा , यह भी देखा जाना चाहिए। इसमें भी मुख्यतः राजा और मंत्री का प्रभाव सबसे अधिक होता है। इस वर्ष के राजा हैं देवगुरु बृहस्पति और मंत्री मंगल। बृहस्पति स्वभावतः शांत होने के साथ-साथ ज्ञान और उसके प्रचार-प्रसार के आग्रही हैं। जबकि मंगल स्वभावतः उग्र , त्वरित प्रतिक्रिया करने वाले तथा सामान्य विरोधी को शत्रु मानकर दंडित करने के पक्षधर हैं। सौरमंडल में मंगल का स्थायी दायित्व सेनापति का है , जबकि बृहस्पति का स्थायी दायित्व विधिनिर्माता , विधिप्रवर्तक और प्रधानमंत्री का है। किसी भी ग्रह को वर्ष के लिए जो दायित्व मिलता है उसे निभाते हुए भी अपने मूल दायित्व के स्वभाव को वह नहीं छोड़ता। आज इस वर्ष के राजा यानी बृहस्पति की भूमिका पर वैश्विक संदर्भ ...

इतना भी अशुभ नहीं होगा ग्रहण

  इष्ट देव सांकृत्यायन   ॥श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः॥ यद्येकस्मिन् मासे ग्रहणं रविसोमयोस्तदा क्षितिपाः। स्वबलक्षोभैः संक्षयमायांत्यतित्यतिशस्त्रकोपश्च॥ अर्थात यदि एक ही मास में सूर्य और चंद्र दोनों का ग्रहण हो तो अपनी-अपनी सेनाओं में हलचल मच जाने से या शस्त्रप्रहार से राजाओं का नाश होता है।   यह महर्षि वराहमिहिर कृत बृहत्संहिता के राहुचाराध्यायः का 26वाँ श्लोक है। कल एक मित्र ने बताया कि कोई दैवज्ञ ऐसा कह रहे हैं कि देश की सेनाओं में हलचल मच जाएगी। युद्ध तो होगा ही होगा , सरकार भी पलट जाएगी। मैंने दैवज्ञ जी को सुनने की जरूरत नहीं समझी। कौन सुने और क्यों ही सुने! आजकल सोशल मीडिया पर दैवज्ञ लोगों की बाढ़ हुई है। 56 साल के युवा नेता वाले देश में 20-30 साल के व्यापारधर्मा विद्वान अपने को खुद ही सद्गुरुदेव कह रहे हैं , जिन्हें कभी किसी सद्गुरु का दर्शन तक नहीं हुआ और रोज विज्ञापन पर विज्ञापन और व्हाट्सएप दर व्हाट्सएप ठेले जा रहे हैं कि बस हमसे अभिये मोक्ष की दीक्षा ले लो , नहीं तो टेम बीता जा रहा है। ऐसे ही कोई दैवज्ञ रहे होंगे और कहीं किसी अपने को पोलिटिकल कहने वाले गि...

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