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Azamgarh : History, Culture and People

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आजमगढ़ : इतिहास और संस्कृति                           - हरिशंकर राढ़ी  आजमगढ़ रेलवे स्टेशन    फोटो : हरिशंकर राढ़ी  रामायणकालीन महामुनि अत्रि और सतीत्व की प्रतीक उनकी पत्नी अनुसूया के तीनों पुत्रों महर्षि दुर्वासा, दत्तात्रेय और महर्षि चन्द्र की कर्मभूमि का गौरव प्राप्त करने वाला क्षेत्र आजमगढ़ आज अपनी सांस्कृतिक विरासत और आधुनिकता के बीच संघर्ष करता दिख रहा है। आदिकवि महर्षि वाल्मीकि के तप से पावन तमसा के प्रवाह से पवित्र आजमगढ़ न जाने कितने पौराणिक, मिथकीय, प्रागैतिहासिक और ऐतिहासिक तथ्यों और सौन्दर्य को छिपाए अपने अतीत का अवलोकन करता प्रतीत हो रहा है। आजमगढ़ को अपनी आज की स्थिति पर गहरा क्षोभ और दुख जरूर हो रहा होगा कि जिस गरिमा और सौष्ठव से उसकी पहचान थी, वह अतीत में कहीं खो गयी है और चंद धार्मिक उन्मादी और बर्बर उसकी पहचान बनते जा रहे हैं। आजमगढ़ ने तो कभी सोचा भी न होगा कि उसे महर्षि दुर्वासा, दत्तात्रेय, वाल्मीकि, महापंडित राहुल    सांकृत्यायन, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, शिक्ष...

Mahrajganj Of Azamgarh

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आधुनिकता और महराजगंज --हरिशंकर राढ़ी  महराजगंज बाजार और पूरे क्षेत्र की यह विशिष्टता उल्लेखनीय है कि इक्कीसवीं सदी के लगभग दो दशक पार कर लेने के बावजूद यहां अभी पश्चिमीकरण और बनावटीपन नहीं आया है। यह कहा जा सकता है कि जितना विकास राजमार्गों और जिला मुख्यालयों के पास वाले कस्बों का हुआ, उसकी तुलना में महराजगंज काफी नया चौक  महराजगंज  पर  पंडित लक्ष्मी कान्त मिश्र की प्रतिमा  पिछड़ा ही है । अभी तक इस क्षेत्र में कोई सिनेमा हॉल, ऑडीटोरियम, स्टेडियम या बड़ा सार्वजनिक सभा स्थल भी नहीं है। यदि महराजगंज बाजार का व्यापार देखा जाए तो किसी भी बड़े कस्बे से टक्कर ले सकता है। बड़ी गल्ला मंडी, सब्जी मंडी, मशीनरी, भवन निर्माण सामग्री और जीवनोपयोगी पदार्थों का एक विशाल बाजार है यहां। महराजगंज से उत्तर लगभग 12 किलोमीटर की दूरी, यानी घाघरा के तट तक कोई दूसरा बड़ा बाजार नहीं है और समस्त बड़ी खरीदारियां लोग यहीं से करते हैं। पश्चिम में राजे सुल्तान पुर, दक्षिण में कप्तानगंज और पूरब में सरदहा तथा बिलरियागंज बाजार जरूर हैं लेकिन बड़ी खरीदारी के लिए अभी महराजगंज थोकमंडी...

Bhairo Baba :Azamgarh ke

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स्थानीय आस्था के केंद्र : आजमगढ़ के भैरव बाबा                                                                          -हरिशंकर राढ़ी आस्था तो  बस आस्था ही होती है, न उसके पीछे कोई तर्क और  न सिद्धांत। भारत जैसे धर्म और आस्था प्रधान देश में आस्था के प्रतीक कदम-दर कदम बिखरे मिल जाते हैं। यह आवश्यक भी है। जब आदमी आदमी और प्रकृति के प्रकोपों से आहत होकर टूट रहा होता है, उसका विश्वास और साहस बिखर रहा होता है तो वह आस्था के इन्हीं केंद्रों से संजीवनी प्राप्त करता है और अपने बिगड़े समय को साध लेता है। भारत की विशाल जनसंख्या को यदि कहीं से संबल मिलता है तो आस्था के इन केंद्रों से ही मिलता है। तर्कशास्त्र कितना भी सही हो, इतने व्यापक स्तर पर वह किसी का सहारा नहीं बन सकता ! भैरव बाबा मंदिर का शिखर : छाया -  हरिशंकर राढ़ी  ऐसे ही आस्था का एक केंद्र उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद में महराजगंज ...

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