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नर्मदा के ओंकारेश्वर

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   - हरिशंकर राढ़ी              ओंकारेश्वर  मंदिर का एक दृश्य  महाकाल नगरी उज्जैन कई बार जाने के बावजूद वहाँ से लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर दूर नर्मदातट पर स्थित ओंकारेश्वर-ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग की अब तक मात्र दो यात्राएँ ही हो पाईं। हाँ , इतना अवश्य है कि जब भी उज्जैन जाना होता है , ओंकारेश्वर का मनोरम वातावरण बहुत गंभीरता से बुलाता है। यदि एक बार ओंकारेश्वर और नर्मदा तट पर पहुँच गए तो लौटते समय दुबारा आने का लोभ वहीं से प्रारंभ हो जाता है। द्वादश ज्योर्तिलिंगों की यात्रा में अभी केदारनाथ का सौभाग्य नहीं मिला है। निःसंदेह केदारनाथ प्राकृतिक दृष्टि से सर्वाधिक समृद्ध होगा , किंतु अन्य ज्योतिर्लिंगों की बात की जाए तो जो प्राकृतिक रमणीयता ओंकारेश्वर में है , वह किसी अन्य में नहीं है। अपनी लघु पर्वतीय सीमाओं में कल-कल , छल-छल करती नर्मदा , प्रातःकाल नर्मदा के स्वच्छ जल में नहाते लोग , नदी के दोनों ओर ज्योतिर्लिंगों के रूप में स्वयंभू ओंकारेश्वर और ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग जैसे पौराणिक स्थल प्रकृति और अध्यात्म का एक दुर्लभ दृश्य उपस्थित...

निज़ामाबाद और शीतला माता

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हरिशंकर राढ़ी  शीतला माता मंदिर निज़ामाबाद (आजमगढ़ )       छाया : हरिशंकर राढ़ी  हमारे देश में न जाने कितने ऐसे धार्मिक स्थल हैं जहाँ विशाल संख्या में श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। इससे न केवल आमजन का पर्यटन हो जाता है , अपितु उन स्थानों पर हजारों लोगों की जीविका का साधन बनता है। ऐसा ही एक धार्मिक स्थल आजमगढ़ के निज़ामाबाद में स्थित शीतला माता का मंदिर है। निज़ामाबाद आजमगढ़ जनपद के लगभग मध्य में है। सुना बहुत था , जाने का संयोग कभी नहीं बना। हरी-भरी फसलों के बीच प्रकृति के वैभव का आनंद लेते हम निजामबाद स्थित शीतला माता के मंदिर पहुँच गए। यहाँ मेरा आना पहली बार हुआ। प्रथम दृष्टि   ही विश्वास हो गया कि इस मंदिर पर श्रद्धालुओं का आना-जाना बड़ी संख्या में होगा। कुल मिलाकर ग्रामीण परिवेश में बड़ा प्रंागण। हरे-भरे छायादार वृक्ष और प्रसाद बेचने वालों के अनगिनत ठीहे। हिंदू धर्म में लगभग सभी देवी-देवताओं के दिन निश्चित किए हुए हैं। देवी दुर्गा से संबंधित दिन प्रायः सोमवार या वृहस्पतिवार माना जाता है। जहाँ इतने देवी-देवता होंगे , ऐसी व्यवस्था बनानी ही प...

Darshan, Drushti Aur Paaon

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दर्शन, दृष्टि और पाँव    (यात्रा संस्मरण) दर्शन, दृष्टि और पाँव का मुखपृष्ठ  आज मेरे यात्रा संस्मरण ‘दर्शन, दृष्टि और पाँव’ की लेखकीय प्रतियाँ प्राप्त हुईं। वैसे तो यह पुस्तक अगस्त 2019 में ही प्रकाशित होकर आ गई थी किंतु तब कुछ ही प्रतियाँ मिली थीं। इस संस्मरण को विमोचन का सौभाग्य साहित्य मनीषी प्रो0 रामदरश मिश्र के हाथों उनके जन्मदिन के अवसर पर मिला था। प्रो0 मिश्र जी के जन्मदिन पर वरिष्ठ कवि-आलोचक ओम निश्चल, नरेश शांडिल्य, अलका सिन्हा, डाॅ0 वेदमित्र शुक्ल, उपेन्द्र कुमार मिश्र एवं अन्य ख्यातिलब्ध साहित्यकार उपस्थित थे जिन्होंने इसके विमोचन को मेरे लिए गौरवपूर्ण बनाया। इसके बाद किन्ही कारणों से शेष प्रतियाँ आने में विलंब हो गया। इस संस्मरण में कुल दस ज्योतिर्लिंगों की यात्रा के साथ कन्याकुमारी, द्वारिका पुरी, मदुराई, सिक्किम, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, अजंता-एलोरा, पचमढ़ी, खजुराहो जैसे अनेक स्थानों का संस्मरण संकलित है। लगभग 240 पृष्ठों की इस पुस्तक को मनीष पब्लिकेशंस नई दिल्ली ने बहुत रुचिपूर्वक प्रकाशित किया है। आज शेष लेखकीय प्रतियाँ मिलीं तो सोचा कि क्य...

मेरी चीन यात्रा - 12

यात्रावृत्त शुरू से पढ़ने के लिए कृपया यहाँ देखें:   पहली ,  दूसरी ,  तीसरी ,  चौथी ,  पांचवीं ,   छठी ,  सातवीं ,  आठवीं ,  नौवीं ,  दसवीं   और   ग्यारहवीं   कड़ी   डॉ. अरविंद मिश्र इस समापन अंक में मैं कुछ छिटपुट बातों के साथ वापसी यात्रा की चर्चा करुंगा। सम्मेलन के दूसरे दिन डा. श्रीनरहरि ने अपराह्न को बताया कि एशियन साइंस फिक्शन एसोसिएशन की एक मीटिंग शाम को बुलाई गई है जिसमें उन्हें जाना है। मैं अभी भी इस एसोसिएशन के इक्ज़िक्यूटिव बोर्ड में हूं मगर मुझे कोई सूचना नहीं थी। डा. नरहरि ने कहा कि वी चैट चेक करिए होगी जरूर। देखा मगर नहीं थी। डा. नरहरि होटेल में ही आहूत मीटिंग में त्वरा से निकल गए।   अब बिना बुलाए तो भगवान के पास भी न जाऊं वाला ही विकल्प मेरे सामने था। गया नहीं मगर इसके बारे में वी चैट पर लिख जरुर दिया। एक दो मेम्बर्स ने भी कहा कि उन्हें भी कोई सूचना नहीं दी गई। बहरहाल बिना सभी बोर्ड मेम्बर्स को सूचित किए इस बैठक में क्या गुल खिले मालूम नहीं हो पाया। डा. नरहरि ने तदनंतर बताया क...

मेरी चीन यात्रा – 11

कृपया शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें: पहली , दूसरी , तीसरी , चौथी , पाँचवीं , छठी , सातवीं , आठवीं , नौवीं और दसवीं कड़ी  डॉ. अरविंद मिश्र   मेरे कुछ विज्ञानकथा कीड़ा (सा इं स फिक्शन बुकवर्म) मित्रों को अब तक के संस्मरणों के बजाय सम्मेलन के एजे ंडा की चर्चा की दरकार है। वैसे तो मैंने स ंप न्न विमर्शों की थोड़ी झलक पहले भी दे रखी है कि ंतु विज्ञानकथा प्रेमियों को और चाहि ए - दिल मांगे मोर की तर्ज पर। मैंने पहले भी यह स्पष्ट किया था कि वहां चर्चा परिचर्चा और विमर्श एक ही समय में कई कक्षों में समानांतर चल रहा था जिसे अकेले कवर कर पाना/सुनना संभव नहीं था। हां , कार्यक्रम विवरणिका से हम विषयों पर आपको   एक दृष्टि डालने का अवसर जरुर दे सकते हैं। मुख्य विषय निम्नवत रहे – १-विज्ञानकथा और न ई अर्थव्यवस्था २-एशि या ई विज्ञानकथा का भविष्य ३-वर्ल्डकान आयोजन के विविध पहलू ४-विविधतायुक्त जपानी विज्ञानकथा ५-कोरिआई विज्ञानकथा का भविष्य और वर्तमान ६-विज्ञानकथा और नगरीय नियोजन की संकल्पना एं ७-चीनी विज्ञानकथा का अनुवाद और निर्यात ८-विज्ञानकथा से प्रेम क्यों...

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...ये भी कोई तरीका है!

निज़ामाबाद और शीतला माता

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