Posts

Showing posts with the label चीन

जासूसी का चीनी रैकेट

Image
इष्ट देव सांकृत्यायन  देश के दुश्मनों की बात करें तो अभी तक आप केवल पाकिस्तान के नाम पर भरमाए जा रहे थे. 1962 के बाद भी आपके ही हुक्मरानों ने आपके सामने चीन का ऐसा हव्वा बना रखा था कि देश के भीतर मौजूद शल्य यानी देश के दुश्मन आपको चीन के नाम पर चिढ़ाते थे. भला हो डोकलाम और गलवान का जिसने आपको चीन की असली औकात बता दी. हम आप यही मानते रह जाते कि चीनी पिस्सू हमारी जासूसी के मामले में टुच्चे अर्बन नक्सलों के भरोसे बैठे हुए हैं. शायद यह बात इन चिरकुटों को भी पता न हो कि चीन जैसे चिरकुट विश्वासघाती देश अपने बाप पर भी भरोसा करना नहीं जानते. उसने इनके पीछे भी न मालूम कितने जासूस लगा रखे हों.  ये बेचारे जो एक-एक बात पर बिलबिलाते हैं , उससे भी यही पता चलता है कि इन्हें बताया कुछ नहीं जाता , सिर्फ कोंचा जाता है. यह उस कोंचने का नतीजा है जो पप्पू सुप्रीम कोर्ट की लात खाने के बाद भी ' चौकीदार चोर ' रेंकता रहता है और अर्बन नक्सल तथाकथित मेनस्ट्रीम मीडिया से लेकर फेसबुक -ट्विटर और व्हाट्सएप तक झूठ का बफर स्टॉक दौड़ाते रहते हैं. अर्धसत्य इन चीकटों का सबसे बड़ा हथियार है. सोवियत संघ के द...

जनता का ध्यान भटकाने का खेल

Image
इष्ट देव सांकृत्यायन   चीन एक ऐसा परोपकारी है जो चश्मा थमाकर आँखें छीन लेता है और चश्मा भी ऐसा जो सिर्फ़ धूप का होता है. कुछ नज़र आए तब तक तो वो अपने शिकार के पास आँखें होने का निशान भी ग़ायब कर देता है. भारत ने नेहरू के हाथ में अपनी कमान सौंपकर सिर्फ गलती की थी. उनके खानदान को सौंपकर ब्लंडर किया. ऐसी गलती जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती. नेपाल की जनता ने कम्युनिस्टों पर कभी भरोसा नहीं किया. उसकी गलती सिर्फ यह है कि राजपरिवार के नरसंहार के बाद उसके पास कोई चारा नहीं बचा. दुर्भाग्य से माओवादियों के इस कुकृत्य में हिस्सेदार ख़ुद राजपरिवार के ही कुछ लोग हुए. इसका अभिप्राय उस युवराज से कतई न लिया जाए जिनके सिर बाद में बेवजह सारा दोष मढ़ा गया. उस वक्त जनता के पास कोई चारा नहीं था. सिवा इसके जो भी तथाकथित लोकतांत्रिक प्रक्रिया घोषित कर देती , उसे ही वह मान लेती. इसी क्रम में चीन के पोषित कम्युनिस्टों ने जबरिया नेपाल पर कब्जा कर लिया. चीन ने वहाँ एक झूठमूठ की सत्ता सौंपी नेपाली कम्युनिस्टों को और परदे के पीछे से चलाता वह खुद रहा. बीते करीब दो दशकों से चीन लगातार नेपाल की व्यवस्था को अरा...

युद्ध में नहीं बदलेगा तनाव

इष्ट देव सांकृत्यायन भारत चीन सीमा पर तनाव को लेकर कुछ लोग युद्ध की आशंका से अभी चिंतित होने लगे हैं। स्वाभाविक है। बात केवल युद्ध की नहीं , उसके बाद बनने वाले हालात की होती है। इसका अंदाजा दोनों देशों को है। आशंका यह है कि अगर यह युद्ध शुरू हुआ तो केवल भारत चीन तक सीमित नहीं रहेगा। यह अंततः विश्वयुद्ध में बदल जाएगा। यह आशंका गलत नहीं है। युद्ध हुआ तो वाकई विश्वयुद्ध में बदलेगा। अमेरिका , इजरायल , आस्ट्रेलिया , फ्रांस जैसे बड़े पहलवान अभी से कमर कसने लगे हैं और सब भारत की ओर अखाड़े में कूद चुके हैं। कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों के भारत के अनन्य टाइप मित्र देशों में एक रूस भी शामिल है। पहलवानों में बस एक वही है जो तटस्थ रहेगा। तटस्थ रहने का मतलब हम जानते हैं। भारत का अनन्य मित्र ६२ में भी तटस्थ रहा था। उस तटस्थता में इसने पूरी बेशर्मी के साथ युद्ध के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया था और साथ ही इस युद्ध को भाई और दोस्त के बीच बताया था। इसमें भाई उसके लिए चीन था और दोस्त भारत। अब भी जो लोग रूस को लेकर भ्रम में हों , उन्हें उसकी नई तटस्थता से समझ लेना चाहिए। उधर कांग्रेस और कम्यूनि...

कोरोना के बाद की दुनिया – 4

इष्ट देव सांकृत्यायन  इसके पहले कि भारत में शल्य समस्या , उसके प्रभावों और निराकरण पर बात की जाए , दुनिया के बाजार में साख के महत्व और उसमें चीन की हिस्सेदारी पर बात कर लेते हैं। अधिक विस्तार के लिए मित्रों से क्षमा चाहता हूँ , लेकिन आगे की बातों से इसका बड़ा गहरा संबंध है और इसलिए इसकी चर्चा मुझे जरूरी लगती है। लॉयड ब्लैंकफीन एक अमेरिकी निवेश बैंकर हैं। वह कहते हैं , “ आपको अपने जीवन में ऐसे लोग चाहिए ही होते हैं जो आपके साथ काम करना चाहें और आपकी मदद करना चाहें। मेरे हिसाब से संगठनात्मक ढांचे का बहुत महत्व नहीं है। इसीलिए मैं अपने उच्चाधिकारियों की नज़र में अपनी साख बनाए रखना चाहता हूँ लेकिन अधिक प्रयास अपने सहयोगियों की साख प्राप्त करने की दिशा में करता हूँ।” यह सही है कि किसी की बात कोई ब्रह्मवाक्य नहीं है , लेकिन बाजार और कूटनीति की दुनिया पूरी तरह साख पर ही निर्भर है। बाजार में चीन की साख केवल और केवल सस्ते के लिए है। वहाँ बने सामानों के टिकाऊपन और गुणवत्ता की स्थिति यह है कि दुनिया भर में सबसे ज्यादा चुटकुले चीन के उत्पादों पर ही हैं। चीन में बने किसी भी सामान को दुनिया में ...

कोरोना के बाद की दुनिया-3

इष्ट देव सांकृत्यायन  तो क्या अब केवल अपनी इस आर्थिक ताक़त के भरोसे चीन दुनिया का नंबर एक बन जाएगा। यह सिर्फ सोचने की बात होगी। जब अमेरिका इस रास्ते पर बढ़ रहा था तब और भी कई देशों के पास आर्थिक और सामरिक ताक़त उससे बेहतर थी। विचारधारा के तौर पर लगभग वे सभी कमोबेश पूँजीवाद के समर्थक थे , लेकिन वे बन नहीं सके। पूँजीवाद को बाजारवाद तक सीमित मान बैठे पालतू बुद्धिजीवियों ने इस बात पर विचार करने की कभी जरूरत भी नहीं समझी कि ऐसा क्यों हुआ। एक विचार के तौर पर देखें तो पूँजीवाद खामियों से भरा हुआ है। लेकिन जो लोग सोचते हैं कि साम्यवाद उससे भिन्न है , वे बहुत बड़े मुगालते में हैं। मार्क्स ने जो कल्पना दी थी और लेनिन या माओ ने उसे जिस रूप में धरती पर उतारा , उन दोनों के बीच उतना ही अंतर है जितना जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के शब्दों में इस्लाम और मुसलमान में। दोनों ही ने उसे अव्यावहारिक , अप्रासंगिक और यहाँ तक कि अमानवीय सिद्ध कर दिया। अपनी खामियों के बावजूद पूँजीवाद आमजन को एक सेफ्टी वॉल्व देता है। तथाकथित साम्यवाद वह भी बंद कर देता है। चीन के मामले में उसके साथ पूरी दुनिया में विश्वास और भरोसे की विहीनत...

कोरोना के बाद की दुनिया - 2

इष्ट देव सांकृत्यायन    जंगल में दो गैंडे आम तौर पर लड़ते नहीं हैं। शायद इसलिए कि गैंडे अमूमन शांतिप्रेमी होते हैं और शायद इसलिए भी कि उन्हें एक दूसरे की ताक़त का अंदाज़ा होता है , लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वे लड़ते ही नहीं हैं। वे लड़ते भी हैं और तभी लड़ते हैं जब उनके बीच कोई सीमा विवाद होता है। जब वे लड़ते हैं तो खरगोश , चूहे , गिलहरी , नेवले जैसे कई जानवर बेवजह जान से हाथ धो बैठते हैं। हालांकि अपनी लड़ाई में किसी दूसरे जानवर को मारना उनका इरादा कतई नहीं होता। लेकिन यह हो जाता है। किसी दूसरे जानवर को बेवजह मारना उनका इरादा इसीलिए नहीं होता क्योंकि वे जानवर होते हैं। अगर वे इंसान होते तो बौद्धिकता के दंभ से भरे होते और बौद्धिकता का कुल मतलब उनके लिए केवल निहायत घटिया दर्जे का काइयांपन होता। और तब वे अनजाने में नहीं , जान बूझकर तमाम छोटे-मोटे जंतुओं को मार डालते केवल अपने को सबसे ताक़तवर बनाने के लिए। इसमें वे ऐसे गैर परंपरागत तौर-तरीकों ( मनुष्य के लिहाज से कहें तो हथियारों) का भी इस्तेमाल कर सकते थे जो पशुता को शर्मसार कर देते (मनुष्यता के पास तो अब शर्मसार होने लायक कुछ बचा नहीं...

कोरोना के बाद की दुनिया - 1

इष्ट देव सांकृत्यायन  लॉक डाउन के एक महीने में हम भारतीयों के धैर्य , समझदारी , अपने या दूसरों के जीवन को लेकर हमारी गंभीरता और अर्थव्यवस्था के प्रति हमारे बड़े बड़े विशेषज्ञों की समझ सब कुछ सामने आ गया है। कोई यमुना तैर कर हरियाणा से यूपी तो कोई तरबूज - प्याज खरीदते बेचते मुंबई से प्रयागराज आ जा रहा है। किसी को पूजा के लिए जान की परवाह छोड़कर मंदिर जाना है तो किसी को नमाज अदा करने मस्जिद और गले भी मिलना है। कुछ लोगों को अपने स्वास्थ्य की वास्तविक स्थिति बताने तक से परहेज है और अगर चिकित्साकर्मी खबर मिलने पर जाँच के लिए उनके घर पहुँचें तो उन पर पत्थरबाजी भी करनी है। यह तो हद है कि बीमारों के इलाज के लिए चिकित्साकर्मियों को पुलिस लेकर जानी पड़े और पुलिस को उनके परिजनों-पड़ोसियों से पूरा संघर्ष करना पड़े। इतना ही नहीं , खुद को खतरे में डालकर लोगों के इलाज में जुटी नर्सों के सामने अश्लील हरकतें , सीढ़ियों की रेलिगों और अस्पताल की दीवारों तक पर थूक-लार लगाना , पेशाब-मल बोतलों में भरकर फेंकना , लोगों में संक्रमण फैलाने के इरादे से हैंडपाइप तक में मल डाल देना... निकृष्टतम सोच की सारी हदें पार ...

बाजार और सभ्यताओं के युद्ध मे पिस रही है दुनिया

संजय तिवारी याद कीजिये। पिछली सदी का आखिरी दशक। विश्व मे कपड़ा उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र सूरत। सूरत के कपड़ो की मांग पूरी दुनिया मे बढ़ गयी थी। वे अन्य देश सूरत के इस प्रभुत्व से परेशान थे जो कपड़े का उत्पादन कर रहे थे। अचानक सूरत में प्लेग का संक्रमण हो गया। सूरत तबाह हो गया। उस समय भी सूरत से मजदूरों का वैसा ही पलायन हो रहा था जैसा आज आनंद विहार के जरिये दिखाया जा रहा है। उस समय सूचना तकनीक इतनी विकसित नही थी। न कोई सोशल मीडिया था और न ही कोई निजी चैनल। केवल दूरदर्शन था और अखबार थे। दूरदर्शन पर केवल रात 8 बज कर 20 मिनट पर एक बार समाचार आता था। रेडियो यानी आकाशवाणी था । तब मोबाइल का कही अतापता भी नही था। सूरत की तबाही की खबरें थी। उसी दौरान एक बड़े विशेषज्ञ की एक टिप्पणी एक अखबार में छपी। उसमें लिखा था कि सूरत में जो प्लेग फैला है इसमें चीन का हाथ है। चीन का यह जैविक युद्ध है । इसके पर्याप्त कारण भी गिनाए गए थे। लिखा था कि सूरत के कपड़ा उद्योगों के कारण चीन के कपड़ा उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुए। चीन में इसके कारण बाजार बिगड़ने लगे। इसी से घबरा कर चीन ने सूरत के कपड़ा उद्योग को अपने जैविक व...

Most Read Posts

रामेश्वरम में

Bhairo Baba :Azamgarh ke

इति सिद्धम

Azamgarh : History, Culture and People

Maihar Yatra

विदेशी विद्वानों के संस्कृत प्रेम की गहन पड़ताल

...ये भी कोई तरीका है!

निज़ामाबाद और शीतला माता

पेड न्यूज क्या है?