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Yatra Manual

 व्यंग्य                       यात्रा मैनुअल                                                                             -हरिशंकर  राढ़ी (यह व्यंग्य ‘जागरण सखी’ में प्रकाशित  हो चुका है)        अगर मैं महान दार्शनिकों  और धर्माचार्यों द्वारा स्थापित इस मत को नकार भी दूं कि जीवन एक यात्रा है, तब भी आज की यात्राओं की लंबाई और यात्रियों की संख्या अकूत रह जाएगी। उद्योगी पुरुषों  द्वारा परंपरागत उद्योगों को दरकिनार करके नए-नए उद्योग स्थापित किए जा रहे हैं। शिक्षा  उद्योग, धर्म उद्योग, प्रवचन उद्योग, वासना उद्योग, रोग उद्योग, फिल्म उद्योग, टीवी उद्योग के साथ-साथ पर्यटन उद्योग खूब विकसित हुआ है। यात्राओं की भरमार हो गई। यात्रावृत्तांतों से साहित्य और इंटरनेट को भर दिया गया। यात...

apsamskriti ka khatra

व्यंग्य                                                       अपसंस्कृति का खतरा                                                                                                             -हरिशंकर राढ़ी दूसरी किश्त  सड़कीय समारोहों पर प्रतिबंध् आसन्न अपसंस्कृति का सबसे बड़ा उदाहरण है। देश  के लोगों की रंगीनियत, जज्बे और मितव्ययिता का सम्मिलित रूप है सड़कों का ऐसा प्रयोग! गैरसरकारी संगठनों, सरकारों और न्यायालयों का यातायात के लिए परेशान होना सर्वथा अनावश्यक और तर्कहीन है। अपने देश का यातायात आज तक कभी रुका है क्या? यातायात रुक जाएगा, ऐसा सोचकर आप अपने देश  क...

अपसंस्कृति का खतरा

-  हरिशंकर राढ़ी ऐसा पहली बार होगा कि देश की संस्कृति की चिन्ता करने वाले मेरी किसी बात से इत्तेफाक रखेंगे। बात यह है कि अब मैं भी यह मानने लगा हूं कि देश  में अपसंस्कृति का प्रसार हो रहा है। हालांकि इस प्रकार की स्वीकारोक्ति से मैं देश  की युवाशक्ति  का समर्थन खो दूंगा और मेरी गणना भी खब्तियों में होने लगेगी। युवाशक्ति के समर्थन से हिम्मत दुगुनी रहती है और इस बात का गुमान रहता है कि मैं भी युवा हूं। युवाशक्ति से मेरा कोई प्रत्यक्ष हितलाभ नहीं है क्योंकि मैं कोई चुनाव लड़ने नहीं जा रहा जिसके लिए मुझे युवाशक्ति के रैपर में लिपटे वोट की दरकार हो। फिर भी आत्मरक्षा की दृष्टि  से इस वर्ग से पंगा लेना ठीक नहीं। जब भी ऐसी चर्चा होती है कि देश  में अपसंस्कृति का प्रसार हो रहा है, युवावर्ग फायरिंग पोजीशन  में आ जाता है। कुछ युवापार लोग भी इनके समर्थन में आ जाते हैं क्योंकि इसी अपसंस्कृति के चलते उन्हें  भी सुखद मौके मिल जाते हैं । ऐसी दशा  में संस्कृति के संवाहकों की चुनौती दोहरी हो जाती है। जिसे अप...

Aachar ka Yuddh

आचार का युद्ध   (दूसरी किश्त )                   - हरिशंकर  राढ़ी   भ्रष्टाचार  से लड़ने का एक हथियार ढूँढ़ निकाला गया है। यह इस युद्ध की अब तक की सबसे बड़ी सफलता है। सभी जानते हैं कि आधुनिक युद्ध शारीरिक या मानसिक बल से नहीं लड़े जाते। नए युद्ध पूरी तरह हथियारों पर निर्भर हैं। इसीलिए दुनिया के सारे देश  हथियारों की साधना में लगे हैं। पड़ोसी तो हथियारों के दम पर कई युद्ध लड़कर और हारकर भी हथियारों की बटोर में लगे हैं। कलेजा भले ही बकरी का हो पर तलवार तो राणा प्रताप की ही चाहिए। बाजरे की रोटी का ठिकाना भले न हो, पर कर्ज लेकर परमाणु अस्त्र तक बनाएंगे। ऐसी स्थिति में भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में हथियार का निश्चित  हो जाना कोई कम बात नहीं है। मजे की बात यह है कि दोनों ही दलों ने एक ही प्रकार के हथियार का चयन किया है। वह महत्त्वपूर्ण हथियार है कानून। सबसे बड़ी बात है कि कानून के हाथ बड़े लम्बे होते हैं, ऐसा यहाँ अज्ञातकाल से माना जाता है। पहले भगवान के हाथ लम्बे होते थे, बाद में क...

हाय हम क्यों ऩा बिक़े-2

(दूसरी किश्त) हरिशंकर राढ़ी  ''हो सकता है कि आपकी बात ठीक हो, पर ऐसा पहले नहीं था। आजकल पतन थोड़ा ज्यादा ही हो गया है। आज तो लोग-बाग खामखाह ही बिके जा रहे हैं।'' बोधनदास जी कुछ व्यंग्य पर उतर आए। मुझे लक्ष्य करके बोले, ''सरजी, किस जमाने की बात कर रहे हो ? कहाँ से शुरू  करूँ ? किस युग का नाम पहले लूँ ? सतयुग ठीक रहेगा क्या ? आपको मालूम है कि सबसे बड़ा  और सबसे पहले बिकने वाला आदमी कौन था? उसे खरीदा किसने था ?'' अब मैं चुप ! बिलकुल चुप ! ऐसा नहीं था कि मुझे कोई उत्तर नहीं सूझ रहा था; मैं अपने आपको फंसता हुआ महसूस कर रहा था। मैंने नकारात्मक शैली  में सिर हिलाया।  ''भाई मेरे, मनुष्यों  की बिक्री सतयुग से ही शुरू  है। आप उससे अच्छे जमाने की कल्पना तो कर ही नहीं सकते ! आपको याद है कि सतयुग में अयोध्या के परम प्रतापी राजा हरिश्चंद्र  बिके थे ? बिके क्या नीलाम ही हुए थे। हुए थे या नहीं ?'' इस बार तो जैसे मैं उछल ही पड़ा  । मुझमें जान आ गई। मुझे लगा कि अब प्वाइंट मिल गया है जिसपर मैं इन्हें लथेड  सकता हूँ। ...

vyangya banam mahila visheshank

                               व्यंग्य बनाम महिला विशेषांक                                                                                      -हरिशंकर  राढ़ी (दूसरी किश्त ) ( यह व्यंग्य  समकालीन अभिव्यक्ति के नारी विशेषांक के 'वक्रोक्ति ' स्तम्भ के लिए लिखा गया था और अप्रैल -अक्टूबर २०११ अंक में प्रकाशित हुआ था .) ''व्यंग्यकार हो सका हूँ? अरे यह क्यों नहीं कहते कि जिनके कारण जिन्दगी स्वयं व्यंग्य हो चुकी है उसी पर व्यंग्य लिखना है! चलिए, मान लिया कि श्रीमती जी पर व्यंग्य लिख भी दूँ, फिर इस बात की क्या गारंटी है कि मेरे प्राण संकट में नहीं होंगे? मैं अपनी ही छत के नीचे अपरिचित नहीं हो जाऊँगा? अच्छी खासी दो रोटी मिल रही है, वह भी मुश्किल  हो जाएगी। कोई अंगरेजी लेखक भी नहीं ह...

mahila banaam mahila visheshank

व्यंग्य                                      व्यंग्य बनाम महिला विशेषांक                                                                              -हरिशंकर  राढ़ी         उस दिन संपादक जी पधारे तो प्रकाश्य  महिला  विशेषांक  हेतु उपलब्ध सामग्री पर व्यापक चर्चा हुई। यहाँ तक तो गनीमत थी किन्तु चर्चा के उपसंहार रूप में उनका आदेशात्मक  आग्रह हुआ,''इस बार तुम्हारी वक्रोक्ति महिला  विशेषांक  या महिलाओं पर केन्द्रित होनी चाहिए , इस बात को ध्यान में रखकर ही कुछ लिखना ।'' मुझे काटो तो खून नहीं। मुझे संदेह हुआ- कहीं संपादक का दिमाग तो कुछ खिसक नहीं गया है। इनके मन में कब क्या आ जाएगा , भगवान भी नहीं जान सकता। हठात्‌ पूछ ही बैठा...

युधिष्ठिर का कुत्ता

(यह व्यंग्य 'समकालीन अभिव्यक्ति' के 'वक्रोक्ति' स्तम्भ में प्रकाशित हुआ था। यहां इसे दो किश्तों में दिया जा रहा है।) मैं धर्मराज युधिष्ठिर का कुत्ता बोल रहा हूँ। पूरी सृष्टि और पूरे इतिहास का वही एक्सक्ल्यूसिव कुत्ता जो उनके साथ स्वर्ग गया था। अब मैं स्वर्ग में नहीं हूँ। किसी धरती जैसे ग्रह पर मैं वापस आ गया हूँ और समझने का प्रयास कर रहा हूँ कि कहीं उसी भारतवर्ष में तो नहीं हूँ जहां से युगों पहले स्वर्ग गया था। ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि यहाँ के बारे मे यह प्रचार है कि धरती का स्वर्ग भारतवर्ष ही है, देवभूमि है।जब बिना सत्कर्म के ही मैं धरती से स्वर्ग ले जाया जा सकता हूँ तो वहां से अकारण तो मैं नर्क में फेंका नहीं जा सकता । जो भी हो ,जब मैं अपने महाभारत काल की पारिवारिक, सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों का मिलान यहां की आज की परिस्थितियों से करता हूँ तो लगता है कि मैं उस देश ही नहीं अपितु उसी काल में वापस लौट आया हूँ। कभी - कभी तो भ्रम होने लगता है कि मैं धर्मराज के साथ स्वर्ग गया भी था या नहीं! कहीं गहरी नींद में सो तो नहीं रहा था ? मैं धरती का सबसे सफल...

उत्तर आधुनिक शिक्षा में मटुकवाद

- हरि शंकर राढ़ी (यह व्यंग्य समकालीन अभिव्यक्ति के जनवरी -मार्च २०१० अंक में प्रकाशित हुआ था । यहाँ सुविधा की दृष्टि दो किश्तों में दिया जायेगा । ) वाद किसी भी सभ्य एवं विकसित समाज की पहचान होता है, प्रथम अनिवार्यता है। वाद से ही विवाद होता है और विवाद से ऊर्जा मिलती है। विवाद काल में मनुष्य की सुसुप्त शक्तियां एवं ओज जागृत हो जाते हैं। विवाद से सामाजिक चेतना उत्पन्न होती है। लोग चर्चा में आते हैं। जो जितना बड़ा विवादक होता है, वह उतना ही सफल होता है। आदमी जितना ही बौद्धिक होगा, उतना ही वाद होगा। जिस समाज में जितने ही वाद होंगे , वह उतना ही विकसित एवं सुशिक्षित माना जाएगा। वस्तुतः वाद का क्षेत्र अनन्त है, स्थाई है किन्तु साथ-साथ परिवर्तनशील भी है। इसका व्याप्ति क्षेत्र एवं कार्यक्षेत्र दोनों ही असीमित है। अब तो यह पूर्णतया भौमण्डलिक भी होने लगा है। इस पर तो एक सम्पूर्ण शोध की आवश्यकता है। कमी है तो बस केवल शुरुआत की। एक बार शुरुआत हो जाए तो देखा-देखी शोध ही शोध ! बुद्धि के क्षेत्र में अपने देश का शानी वैसे भी सदियों से कोई नहीं रहा है। अब जहां इतनी बुद्धि है वहाँ वाद...

मेरा चैन -वैन सब

(दूसरी और अन्तिम किश्त ) दसवीं जमात में नम्बरों के चक्कर में एक निबन्ध याद किया था - “ साहित्य समाज का दर्पण होता है। “ परीक्षा में साहित्य समाज ..... धोखा दे गया । नम्बर नहीं आए पर यह रट्टा अब काम आया है। बरात में खाना ज्यादा खाया था , सो नींद नहीं आई।अन्ततः सीरियस होना पड़ा और देश की दशा पर चिन्ता होने लगी। साहित्य समाज का दर्पण होता है इसलिए चैन - वैन असलियत में उजड़ा होगा ! आगे का वर्णन सच्चाई से बिलकुल मेल खाता है - बरबाद हो रहे हैं जी ये तेरे श हर वाले ...... । अभी पूरी तरह बरबाद नहीं हुए हैं। हाँ , कुछ दिन में हो जाएंगे। अभी मकान के पहले माले ही तोड़े गए हैं , ताले उन्हीं दुकानों में जड़े गए हैं जिनका राष्ट्रीय विकास में कोई विशिष्ट योगदान नहीं है। और तो और , हेराफेरी और जमाखोरी में भी निकम्मे साबित हुए हैं। गर्मी ठीक से नहीं पड़ रही है इसलिए पानी कभी-कभी आ ही जाता है। वर्मा जी मूली खरीदने गए थे; अत्याधुनिक आविष्कारों का लाभ प्राप्त हो गया-आर ड...

मेरा चैन -वैन सब

( थोड़ा सा भूतकाल में चलें ,चार - पाँच साल पहले जब इस मुखडे की धूम थी .तब यह व्यंग्य लिखा गया था और प्रकाशित हुआ था .) मैं पिछले कई महीने से असमंजस की स्थिति में हूँ। मैं ही क्या , पूरा देश ही ऐसी स्थिति में है। अन्तर सिर्फ इतना है कि देश को ऐसी स्थिति में रहने का लम्बा अनुभव है , जबकि मेरे लिए यह नया अवसर है।इसीलिए कुछ बेचैनी हो रही है मुझे।वस्तुतः इस बेचैनी के पीछे मेरे अज्ञान का ही हाथ है। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि इस समय अपना देश, अपना समाज खुश है या दुखी ? भ्रम की स्थिति बनी हुई है। जिधर देखिए, एक ही स्वर गूंज रहा है- मेरा चैन वैन सब उजड़ा.......। इस स्वर के गूंजते ही चेहरे पर रौनक आ जाती है- गोया बहुत बड़ी खुषखबरी मिल गई हो! क्षण भर को भागम-भाग,रेलम-पेल ठहर जाती है।सारी ताकत बटोरकर बन्दा अपने आप को नियन्त्रित करता है,अर्थात फिर भीड़ में घुसता है तो उसकी भी रागिनी फूट पड़ती है- मेरा चैन वैन सब उजड़ा। चैन उजड़ने जश्न पूरे जुनून पर है। यह सिद्ध करना है कि मेरा चैन सबसे ज्यादा उजड़ा है। आप इस बात को सिद्ध भी कर सकते हैं ,बशर्ते आप गर्दभ राग के विशेषज्ञ हों। सभी का चैन उजड़ा है...

जिन्न-आ मुझे मार

अब तो आपको विश्वास हो ही गया होगा कि जिन्न होते ही हैं और उनमें दम भी होता है। अब केवल दिखाने के लिए बहादुर मत बनिए, वैसे भी इस जिन्न का असर आप पर नहीं होने वाला। ये जिन्न बड़ा जबरदस्त है। जिन्न क्या है, समझिए जिन्ना है। ढूंढ़- ढूंढ़कर बड़े-बड़े नेताओं को मार रहा है , बिलकुल राष्ट्रीय स्तर और राष्ट्रवादी नेताओं को !मार भी क्या रहा है, न मरने दे रहा है न जीने। इस बार भी उसने बड़ा शिकार चुना है। मजे की बात तो यह है कि इस शिकार से किसी को सहानुभूति नहीं है, यहां तक कि ओझाओं और सोखाओं तक को नहीं जो कि इस के घर के ही हैं ! घर- परिवार वाले तो इसे देखना भी नहीं चाहते। इस शिकार से तो वे पहले से ही चिढ़े थे ,अब इसने एक जिन्न और लगा लिया अपने पीछे । दरअसल उन्हें शिकार से ज्यादा चिढ़ इस जिन्न से है । जिन्न इसने लगाया,चलो ठीक है, पर इस वाले जिन्न को क्यों लगाया ? और इस शिकार को क्या कहें ? इसे मालूम था कि इस जिन्न के प्रति माहौल खराब है,फिर भी इसे छेड़ा। पहले तो इसे कहते थे कि आ बैल मुझे मार , पर इसने तो कहा- आ जिन्न-आ मुझे मार ! ये जिन्न बड़ा राजनीतिज्ञ है, केवल चले बले राजनेताओं को मारता है। और मारता भ...

क्यों न रोएँ ?

शीर्षक पढ़ते ही आपने मुझे निराशावादी मान लिया होगा। किसी तरह कलेजा मजबूत करके मैं कह सकता हूँ कि मैं निराशावादी नहीं ,आशावादी हूँ। पर मेरे या आपके ऐसा कह देने से इस प्रश्न का अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता। सच तो यह है कि आशावाद के झूठे सहारे हम अपने जीवन का एक बडा हिस्सा निकाल लेते हैं। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। पर आंसू भी कम बलवान नहीं होते और कई बार हम अपने आंसुओं को दबाने के असफल प्रयास में भी रो पड़ते हैं। चलिए, माना हमें रोना नहीं चाहिए, लेकिन क्या इतना कह देने से रोने की स्थितियां उलट जाएंगी ?क्या हर भोले-भाले और निर्दोष चेहरे पर असली हँसी आ जाएगी ? कहाँ से शुरू करें ?अभी कल की बात है, बाजार गया था। किराने की एक बड़ी सी दूकान पर एक मजदूर ने दाल का भाव पूछा। चैरासी रुपये किलो! बेचारे का चेहरा उतर गया। “पाव कितने की हुई ?”इक्कीस रुपये। डरता हुआ सा वह धीरे से वापस चला गया। मैं सोचने को विवश हो गया कि आज वह परिवार क्या खाएगा? कई दिनों बाद सौ रुपये की दिहाड़ी लगाने वाला मजदूरकिस कलेजे से अपनी ”आय” का एक चैथाई एक वक्त की दाल पर खर्च कर देगा ? अब दाल रोटी से नीचे क्या है! शायद न...

एक श्रद्धांजलि उन्हें भी

कल उनका अन्तिम संस्कार हो गया। माफी चाहूंगा ,वहां इसे संस्कार नहीं बोलते। संस्कार वहां होते ही नहीं। यूँ समझिए कि क्रिया-कर्म हो गए। दफना दिए गए।लगभग दो सप्ताह तक यूँ ही पड़े रहे। मृत शरीर को देखकर कोई पुत्र, कोई पत्नी तो कोई वास्तविक उत्तराधिकारी होने का दावा कर रहा था।गनीमत थी कि क्रिया कर्म हो गया। ऐसा विवाद अपने देश में होता और कोर्टकेस हो जाता तो मिट्टी भी नहीं मिलती बेचारी काया को! खैर, क्रिया कर्म बड़ा शानदार हुआ।उनका जीवन भी तो बड़ा शानदार था।कई लोग उन्हें जिन्दा देखकर मरे, कई मरने के बाद मर गए।मुझे समझ नहीं आया।मानसिक मृत्यु के बाद ऐसे 12 लोगों को शारीरिक आत्महत्या की क्या आवश्यकता थी?परन्तु वे उनके फैन थे और फैन को कुछ भी करने का अधिकार होता है ।बहरहाल , उनके क्रियाकर्म पर विशाल जलसा हुआ- रंगारंग कार्यक्रम पेश किए गए।गाने गाए गए, डांस हुआ। शमशान भी गूंज उठा।उस मस्ती में कहां की वसीयत और कहां की आत्महत्या! सारे विवाद संगीत में डूब गए। जिस ताबूत में वे दफनाए गए,सुना कि बेशकीमती था। कीमती चीजों से उन्हें गहरा लगाव था।उसी के लिए जिए वे!जो भी किया ,बहुत बड़ा किय...

nijikaran

--------- गतांक से जारी ---- समापन किश्त एक अन्य महत्त्वपूर्ण विभाग जिसका निजीकरण किया गया , वह था पुलिस विभाग। सरकार ने देखा कि तनख्वाह बढ़ाने के बाद भी अपराधों में कमी नहीं आई है तो निजीकरण का मन बन ही गया। पुलिस की कमाई बढ़ाने के लिए न जाने कितने नियम बनाए गए, कितन प्रशिक्षण दिया गया, परन्तु परिणाम ढाक के वही तीन पात! अन्ततः निजीकरण हो ही गया। एक झटका तो लगा पुलिस को, लेकिन संभल गई। सरकार तनख्वाह ही तो नहीं देगी! पहले ही कौन सा खर्च चल जाता था? हाँ,यही न कि आयकर रिटर्न भरना आसान हो जाता था। असली साधन तो कानून था, वह तो अभी भी हाथ में दे ही रखा है। निजीकरण के बाद विभाग में व्यापक परिवर्तन हुए। चहुँओर शान्ति छा गई ।अब उपभोक्ता वाद के मज़े आने लगे! police ने अनेक प्रकार के शुल्क निर्धारित कर दिए, यथा-सुरक्षा शुल्क , पिटाई शुल्क , षिष्टाचार शुल्क आदि। सुरक्षा शुल्क वह शुल्क था जो सम्मानित नागरिक चोर-डाकुओं से सुरक्षित रहने के लिए जमा कराते। यह अनिवार्य शुल्क था। सम्मान शुल्क जमा कराने वाला नागरिक पुलिस की गाली अकारण प्राप्त करने से बच सक...

nijikaran

.......गतांक से आगे दूसरा महत्त्वपूर्ण निजीकरण शिक्षा का हुआ। सरकारी स्कूलों में कथित रूप से घोर भ्रष्टाचार फैला हुआ था। यद्यपि परिणाम प्रतिशत फेल विद्यार्थियों का ही अधिक होता ,फिर भी कुछ तो उत्तीर्ण हो ही जाते।यही उत्तीर्ण छात्र आगे चलकर बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि करते और देश की प्रतिष्ठा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर गिरती। न ढंग के कपड़े,न कापी न किताब,न तरीका। आखिर कब तक ढोए सरकार! सारे स्कूल ’पब्लिक स्कूल ’ हो गए।शिक्षा का स्तरोन्नयन हो गया।हाँ,अपवाद स्वरूप् कुछ राजकीय विद्यालय बचे रह गए थे। वस्तुतः इन स्कूलों का परीक्षा परिणाम अन्य विद्यालयों की तुलना में बहुत ऊँचा रह गया था। फलतः शिक्षकों एवं अभिभावकों ने आंदोलन कर दिया। बापू की समाधि पर धरना दे दिया। सरकार को झुकना पड़ा। समझदारी से काम लेना पड़ेगा। उन विद्यालयों के निजीकरण का मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया। उन दिनों सरकार के पास ठंडा बस्ता नामक एक अज्ञात एवं अतिगोपनीय उपकरण हुआ करता था। यह ठंडा बस्ता अलादीन के जादुई चिराग से भी चमत्कारी था। जब भी कोई राष्ट्रीय महत्त्व का मामला होता और सरकार उसे लटकाना चाहती तो उसे ठंडे...

तो क्या कहेंगे?

सलाहू आज बोल ही नहीं रहा है. हमेशा बिन बुलाए बोलने वाला आदमी और बिना मांगे ही बार-बार सलाह देने वाला शख्स अगर अचानक चुप हो जाए तो शुबहा तो होगा ही. यूं तो वह बिना किसी बात के बहस पर अकसर उतारू रहा करता है. कोई मामला-फ़साद हुए बग़ैर ही आईपीसी-सीआरपीसी से लेकर भारतीय संविधान के तमाम अनुच्छेदों तक का बात-बात में हवाला देने वाला आदमी आज कुछ भी कह देने पर भी कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं हो रहा है. मुझे लगा कि आख़िर मामला क्या है? कहीं ऐसा तो नहीं कि माया मेमसाहब द्वारा बापू को नाटकबाज कह देने से उसे सदमा लग गया हो! पर नहीं, इस बारे में पूछे जाने पर उसने मुझे सिर्फ़ देखा भर. ऐसे जैसे कभी-कभी कोई बड़ी शरारत कर के आने पर मेरे पिताजी देखा करते थे. चुपचाप. पर मैंने ऐसी कोई शरारत तो की नहीं थी. ज़ाहिर है, इसका मतलब साफ़ तौर पर सिर्फ़ यही था कि ऐसी कोई बात नहीं थी. फिर क्या वजह है? बार-बार पूछने पर भी सलाहू चुप रहा तो बस चुप ही रहा. जब भी मैंने उससे जो भी आशंका जताई हर बात पर वह सिर्फ़ चुप ही रहा. आंखों से या चेहरे से, अपनी विभिन्न भाव-भंगिमाओं के ज़रिये उसने हर बात पर यही जताया कि ऐसी कोई बात नहीं है. अ...

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