चम्मच दीमकेश्वर की सिंहासन साधना
इष्ट देव सांकृत्यायन
किसी भी सत्ता का सत्यानाश करना उसके विरोधियों के बस की बात नहीं होती। सत्ता का सूरज जब भी डूबता है चमचों के कारण डूबता है। चमचे राहु हैं। वे सत्ताधीशों की बुद्धि पर ऐसा ग्रहण लगाते हैं कि उसे तब तक खुलने ही नहीं देते जब तक कि उसके पार्थिव शरीर का सारा रस न चूस डालें। बिलकुल दीमक की तरह।
राहु के ठीक सामने ही, 180* पर यानी सातवें घर में, केतु महाराज होते हैं। केतु छूटने के कारण होते हैं। जब तक किसी सत्ताधीश की
सत्ता पर केतु पूरी तरह सशक्त और सक्रिय न हो जाएं, राहु यानी चम्मच दीमकेश्वर लोग उनके प्रिय नहीं हो सकते। अकसर यह देखा गया है
कि सत्ता जैसे जैसे पुरानी होती जाती है चम्मच दीमकेश्वर लोग प्रिय से अतिप्रिय, और यहाँ तक कि प्राणप्रिय तक होते चले जाते हैं।
चम्मच दीमकेश्वर लोगों का
व्यवहार, प्रायः देखा गया है कि जनता एंटी इनकम्बेंसी के
व्युत्क्रमानुपाती होता है। जनता और समझदार लोग सत्ता से जितने नाराज होते जाते
हैं, चम्मच दीमकेश्वर लोग उतने ही खुश होते जाते
हैं। उनकी दक्षता भी बढ़ती चली जाती है। जो पहले रूमाल की तुरपाई करते थे, वे कुर्ते की छोटी-मोटी रफूगरी करने लगते हैं। जो कुर्ते
की छोटी-मोटी रफूगरी करते थे, वे पाजामे की बड़ी-बड़ी
रफूगरी करने लगते हैं। जो पाजामे की बड़ी-बड़ी रफूगरी करते थे, वे सदरी में चकत्तियाँ लगाने लगते हैं और चकत्तियाँ लगाने वाले होते हैं, वे सारा शर्म-लिहाज छोड़कर तूफान से फटे शामियाने तक सिलने लगते हैं। मजे की
बात ये है कि अपने तईं समझते वे सब कुछ को रफूगरी ही हैं। चाहे भले उनमें बड़े-बड़े बेमेल
चकत्ते साफ तौर पर दिखाई दे रहे हों।
इधर वो मालिक की वर्षों से दबी हुई अपान वायु को सुवासित समीर बताते हुए “हवा हवा ऐ हवा खुश्बू
लुटा दे” गाते हुए पद-पुरस्कार से तृप्त होते रहते हैं और उधर मालिक का भरतपुर लुटता
रहता है, और उन्हें “खुश्बू लुटा दे” के शोर में पता तक नहीं चलने पाता। बाहर सड़कों
पर जनता “भरतपुर लुट गयो रात मोरी अम्मा” गाती रहती है, लेकिन राजमहल के बंद कमरे
वाले डीजे के नक्कारखाने में “खुश्बू लुटा दे” का असर ऐसा तारी होता है कि पाइल्स के
फिस्टुला बन जाने के कई दिन बाद तक भी “भरतपुर लुट” चुकने की कोई खबर तक नहीं होने
पाती। चम्मच दीमकेश्वर लोग अतितृप्त होते हुए स्वामी की हर मूढ़ता को मास्टर स्ट्रोक
बताते हुए तृप्त से अतितृप्त और अतितृप्त से नाते-रिश्तेदार सहित सर्वतृप्त होते रहते
हैं। खबर तब पहुँचती है जब सिंहासन साफ हो चुका होता है और साथ ही वे अगले सिंहासन
के नीचे की मिट्टी खोदने की व्यवस्था कर चुके हैं।
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