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अथातो जूता जिज्ञासा-32

आप कई बार देख चुके हैं और अकसर देखते ही रहते हैं कि ख़ुद को अजेय समझने वाले कई महारथी इसी खड़ाऊं के चलते धूल चाटने के लिए विवश होते हैं. यह अलग बात है कि अकसर जब आप धूल चाटने के लिए उन्हें मजबूर करते हैं तो यह काम आप जिस उद्देश्य से करते हैं, वह कभी पूरा नहीं हो पाता है. हर बार आप यह पाते हैं कि आप छले गए. इसकी बहुत बड़ी वजह तो यह है कि आप अकसर 'कोउ नृप होय हमें का हानी' वाला भाव ही रखते हैं. कभी अगर थोड़ा योगदान इस कार्य में करते भी हैं तो केवल इतना ही कि अपना खड़ाऊं चला आते हैं, बस. और वह काम भी आप पूरी सतर्कता और सम्यक ज़िम्मेदारी के साथ नहीं करते हैं. आप ख़ुद तमाशेबाज खिलाड़ियों के प्रचार तंत्र से प्रभावित होते हैं और इसी झोंक में हर बार अपने खड़ाऊं का पुण्यप्रताप बर्बाद कर आते हैं. और यह तो आप अपनी ज़िम्मेदारी समझते ही नहीं हैं कि आपके आसपास के लोगों के प्रति भी आपकी कोई ज़िम्मेदारी बनती है. अगर आपका पड़ोसी ग़लती करता है और आप उसे ग़लती करते हुए देखते हैं तो ज़्यादा न सही पर थोड़े तो आप भी उस ग़लती के ज़िम्मेदार होते ही हैं न! बिलकुल वैसे ही जैसे अत्याचार को सहना भी एक तरह का अत्याचार है, ग़...

अथातो जूता जिज्ञासा-31

तो अब बात उस खड़ाऊं की जो भगवान राम ने आपके लिए छोड़ी थी और जिसकी पहचान अब आप भूल गए हैं, या फिर पहचान कर भी उससे अनजान बने हुए हैं. यह भी हो सकता है कि आप उसे पहचान कर भी अनजान बने हों. इसकी एक वजह तो आपका आलस्य हो सकता है और दूसरी आपमें इच्छाशक्ति की भयावह कमी भी. अपनी इसी कमज़ोरी की वजह से आप तब वाह-वाह तो कर रहे हैं जब दूसरे लोग उल्टे-सीधे जूते परम माननीयों पर फेंक रहे हैं, लेकिन ख़ुद अपने हाथों में मौजूद खड़ाऊं का उपयोग करने से बच रहे हैं. मुझे मालूम है कि आप वह जूता भी नहीं चला सकेंगे. आख़िर आप बुद्धिजीवी हैं. बुद्धिजीवी कोई ऐसा-वैसा काम थोड़े करता है. असल बुद्धिजीवी तो सारा तूफ़ान चाय की एक प्याली में उठाता है और चाय के साथ ही उसे थमने के लिए मजबूर भी कर देता है. आजकल तो चाय की प्याली की भी ज़रूरत नहीं है. आज का बुद्धिजीवी तो एक ब्लॉग बनाता है और ब्लॉगे पे बेमतलब का बखेड़ा खड़ा कर देता है. ब्लॉग पर ही वह ख़ुश हो लेता है और ब्लॉग पर ही नाराज हो लेता है. कभी इस बात पर तो कभी उस बात पर. कभी इस बात पर कि कोई गाली क्यों देता है और कभी इस बात पर कि कोई गाली क्यों नहीं देता है. कभी इस बात पर कि क...

अथातो जूता जिज्ञासा-30

यक़ीन मानें आम जनता जो  जूता चला रही है, असल में वह जूता है ही नहीं. यह तो वह खड़ाऊं है जो भगवान राम ने दिया था भरत भाई को. भरत भाई ने यह खड़ाऊं अपने लिए नहीं लिया था, उन्होंने यह खड़ाऊं लिया था आम जनता के लिए. इसीलिए उनके समय में उस खड़ाऊं का इस्तेमाल उनके मंत्रियों, अफ़सरों और निजी सुरक्षाकर्मियों ने नहीं किया. यही वजह थी जो ख़ुद भरत राजधानी के बाहर कुटी बना कर रहते रहे और वहां से राजकाज चलाते रहे. जनता की व्याकुलता की वजह इस दौरान राम की अनुपस्थिति भले रही हो, पर शासन या व्यवस्था में किसी तरह की कोई कमी कतई नहीं थी. और सबसे बड़ी बात तो यह कि अधिकारों के उस खड़ाऊं में भरत के लिए कोई रस भी नहीं था. उनकी रुचि अगर थी तो उस ज़िम्मेदारी में जो राम की अनुपस्थिति के कारण उन पर आ पड़ी थी. जबकि अब के शासकों की रुचि अपनी ओढ़ी हुई ज़िम्मेदारी में कभी ग़लती से भी दिख जाए तो यह एक असामान्य बात मानी जाती है. क्योंकि सामान्यतया उनकी कुल रुचि केवल उस अधिकार में है जो उन्होंने जनता को बहला-फुसला कर या डरा-धमका कर अपने ही जैसे अपने प्रतिद्वन्द्वियों से छीना है. नतीजा यह है कि आपके जनप्रिय नेताओं के बंगलों के ब...

अथातो जूता जिज्ञासा-29

इन समानधर्माओं में सबसे पहला नाम आता है इराकी पत्रकार मुंतजिर अल ज़ैदी का, जिन्होंने ख़ुद को दुनिया सबसे ताक़तवर समझने वाले महापुरुष जॉर्ज बुश पर जूतास्त्र का इस्तेमाल किया. इसकी आवश्यकता कितने दिनों से महसूस की जा रही थी और कितने लोगों के मन में यह हसरत थी, यह बात  आप केवल इतने से ही समझ सकते हैं कि यह जूता चलते ही दुनिया भर में ख़ुशी की लहर दौड़ गई. भले ही कुछ लोगों ने दिखावे के तौर पर शिष्टाचारवश इसकी भर्त्सना की हो, पर अंतर्मन उनका भी प्रसन्न हुआ. बहुत लोगों ने तो साफ़ तौर पर ख़ुशी जताई. गोया करना तो वे ख़ुद यह चाहते थे, पर कर नहीं सके. या तो उन्हें मौक़ा नहीं मिला या फिर वे इतनी हिम्मत नहीं जुटा सके. सोचिए उस जूते की जिसकी क़ीमत चलते ही हज़ारों से करोड़ों में पहुंच गई. असल में ज़ैदी ने यह बात समझ ली थी कि अब अख़बार तोप-तलवार के मुकाबले के लिए नहीं, सिर्फ़ मुनाफ़े के लिए निकाले जाते हैं. उन्होंने देख लिया था कि अख़बार में बहुत दिनों तक लिख-लिख कर, टीवी पर बहुत दिनों तक चिल्ला-चिल्ला कर बहुतेरे पत्रकार तो थक गए. मर-खप गए और कुछ नहीं हुआ. वह समझ गए थे कि कलम में अब वह ताक़त नहीं रही कि इंकलाब ला ...

अथातो जूता जिज्ञासा-28

और अब बात आधुनिक भारत में जूता चिंतन की. निराला जी से थोड़े पहले उनके ही धातृ शहर इलाहाबाद में हुए एक अकबर इलाहाबादी साहब. अपने ज़माने के बहुत उम्दा शायरों में गिने जाते हैं वह और अगर क़रीने से देखा जाए तो बिलकुल आधुनिक सन्दर्भों में जूता चिंतन की शुरुआत ज़नाब अकबर इलाहाबादी साहब से ही होती है. यह अलग बात है कि उनके पूर्वजों को जूते चलाने का भी शौक़ रहा हो, पर जहां तक मैं जानता हूं, अकबर साहब के शौक़ सिर्फ़ जूते पहनने तक ही सीमित थे. उन्होंने कभी भी जूते चलाने में किसी तरह की हिस्सेदारी नहीं की. ख़ास कर जूते बनाने का शौक़ तो उनके पूर्वजों को भी नहीं था. इसके बावजूद पढ़े-लिखे लोगों के बीच जूते पर केन्द्रित उनका एक जुमला अत्यंत लोकप्रिय है. जब भी कोई ऐसी-वैसी बात होती है, भाई लोग उन्हें फट से कोट कर देते हैं. जूते पर केन्द्रित उनका शेर है : बूट डासन ने बनाया मैंने एक मज़्मूं लिखा मुल्क में मज़्मूं न फैला और जूता चल पड़ा. ख़ुद मुझे भी यह शेर बेहद पसन्द है. पर इस शेर के साथ एक दिक्कत है. इस दिक्कत की वजह शायद यह है कि शिल्प के स्तर पर वह ज़रूर थोड़े-बहुत पश्चिमी मानसिकता से प्रभावित रहे होंगे. जहां साह...

अथातो जूता जिज्ञासा-27

अब मध्यकाल से निकल कर अगर आधुनिक काल में आएं और जूतोन्मुखी रचनाधर्मिता की बात करें तो चचा ग़ालिब का नाम सबसे पहले लेने का मन करता है. एक तो सूफ़ियाना स्वभाव (तमाम तरह के दुराग्रहों को टाटा बाय-बाय वह पहले ही कह चुके थे) और दूसरे दुनियादारी की भी बेहतर समझ (ख़रीदारी कर के नहीं सिर्फ़ गज़रते हुए देखा था उन्होंने दुनिया के बाज़ार को), सच पूछिए तो दुनिया की हक़ीक़त ऐसा ही आदमी क़ायदे से जान पाता है. जूते की इस सर्वव्यापकता और सर्व शक्तिसम्पन्नता को उन्होंने बड़े क़ायदे से समझा और साथ ही  उसे शहद में भिगोने की कला भी उन्हें आती है. ऐसा लगता है कि रैदास और तुलसी द्वारा क़ायम की गई परंपरा को उन्होंने ही ठीक से समझा और इन दोनों को वह साथ लेकर आगे बढ़े. कभी-कभी तो उनके यहां सूर भी दिखाई दे जाते हैं. यह शायद सूर का, या कि सूफ़ी संतों का ही असर है जो वह भी ख़ुदा से दोस्ती के ही क्रम को आगे बढ़ाते हैं, यह कहते हुए - या तो मुझे मस्जिद में बैठकर पीने दे, या फिर वो जगह बता जहां पर ख़ुदा न हो . और ग़ालिब भी एक को मार कर दूसरे को छोड़ने वाले छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी नहीं हैं. वह भी अपने दूसरे पैर का जूता निकालते हैं...

अथातो जूता जिज्ञासा-26

यह तो आप जानते ही हैं कि भरत भाई ने भगवान राम की पनही यानी कि खड़ाऊं यहीं मांग ली थी. यह कह कर आपके नाम पर ही राजकाज चलाएंगे. भगवान राम ने उन्हें अपनी खड़ाऊं उतार के दे दी और फिर पूछा तक नहीं कि भाई भरत क्या कर रहे हो तुम मेरे खड़ाऊं का? अगर वह आज के ज़माने के लोकतांत्रिक सम्राट होते तो ज़रा सोचिए कि क्या वे कभी ऐसा कर सकते थे? नहीं न! तब तो वे ऐसा करते कि अपने जब चलते वन के लिए तभी अपने किसी भरोसेमन्द अफ़सर या पार्टी कार्यकर्ता को प्रधानमंत्री बना देते. छांट-छूंट के किसी ऐसे अफ़सर को जो ख़ुद को कभी इस लायक ही नहीं समझता कि वह देश चलाए. आख़िर तक यही कहता रहता कि भाई देखो! देश चलाने का मौक़ा मेरे हाथ लगा तो यह साहब की कृपा है. वह निरंतर महाराज और युवराज के प्रति वफ़ादार अफ़सर की तरह सरकार और राजकाज चलाता रहता. अगर कभी विपक्ष या देशी-विदेशी मीडिया का दबाव पड़्ता तो वनवासी साहब के निर्देशानुसार कह देता कि भाई देखो! ऐसा कुछ नहीं है कि मैं कठपुतली हूं. बस तुम यह जान लो कि मैं सरकार अपने ढंग से चला रहा हूं और अपनी मर्ज़ी से भी. यह अलग बात है कि किसी भी मौक़े पर वह सम्राट और युवराज के प्रति अपनी वफ़ादारी ज...

अथातो जूता जिज्ञासा-25

तो साहब कविवर रहीम ने पनही ही कहा था. उन्होंने पानी नहीं कहा था. मेरा ख़याल है कि यह बात अब तक आप समझ गए होंगे. वैसे हिन्दी के हतबुद्धि और कठकरेजी आलोचकों की  तरह इतने साफ़-साफ़ तर्कों के बावजूद अगर आप न ही समझना चाहें तो भी मेरे पास आपको समझाने का एक उपाय है. और वह भी कविवर रहीम के ही शब्दों में. ग़ौर फ़रमाइए: खीरा सिर ते काटिए, मलियत नमक मिलाय रहिमन ओछे जनन को चहियत इहे सजाय. ज़रा सोचिए, इतना कड़ा प्रावधान करने वाले महाकवि रहीम भला पानी की बात क्यों करेंगे? पानी रखने का नतीजा क्या होता है, इसका सबक उन्होंने इतिहास से ले लिया था. ध्यान रहे, वह सिर्फ़ फ़ौजी थे. फ़ौजी शासक नहीं थे. इसलिए पूरे निष्ठुर नहीं हो सकते थे. अगर शासक रहे होते तब तो कवि होकर भी निष्ठुर हो सकते थे. राजनीतिक कवि तो वही होता है जो जब पूरे देश के नौजवान आत्मदाह कर रहे हों, तब अपनी कुर्सी बचाने के जोड़-तोड़ में व्यस्त होता है. पर रहीम ऐसे नहीं थे. वे तो उनमें से थे जो अपना सारा कुछ लुटा कर कहते थे : देनहार कोउ और है, ताते नीचे नैन. अगर राजनीतिक होते हो बात जस्ट उलटी होती. जनता के पैसे से ऐश करते और जनता पर एहसान लादते क...

अथातो जूता जिज्ञासा-24

अथातो जूता जिज्ञासा-23 जूता चिंतन का यह क्रम संत रैदास पर आकर ठहर गया हो, ऐसा भी नहीं है. इतना ज़रूर है कि उनके बाद उनके ही जैसे जूते चलाने का रिवाज शुरू हो गया. आई मीन शहद में भिगो-भिगो कर जूते चलाने का. जूते सूर ने भी चलाए, लेकिन ज़रा धीरे-धीरे. शहद में भिगो-भिगो कर. हल्के-हल्के. जब वह कह रहे थे 'निर्गुन को को माई-बाप', तब असल में वह जूते ही चला रहे थे, लेकिन शहद में भिगो के, ज़रा हंस-हंस के. ताकि पता न चले. वही मरलस त बकिर पनहिया लाल रहे. वह साफ़ तौर पर यह जूते उन लोगों पर चला रहे थे जो उस ज़माने में एकेश्वरवाद और निर्गुन ब्रह्म को एक कट्टर पंथ के तौर पर स्थापित करने पर तुले हुए थे. अपने समय की सत्ता की शह उन्हें बड़े ज़ोरदार तरीक़े से मिली हुई थी. वह देख रहे थे कि इस तरह वे सामासिकता में यक़ीन करने वाली भारत की बहुलतावादी आस्था पर जूते चला रहे थे. जहां सभी अपने-अपने ढंग से अपने-अपने भगवान बनाने और उसमें विश्वास करने को स्वतंत्र हों, ऐसी खुली मानसिकता वाली संस्कृति का तालिबानीकरण वह बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे और इसीलिए उन्होंने कृष्ण के उस बालस्वरूप को अपने इष्ट के रूप में स्थापित क...

अथातो जूता जिज्ञासा-23

(भाई लोगों ने बड़ी राहत महसूस की होगी कि चलो अब जूता नहीं पड़ेगा. लेकिन नहीं साहब, जूता अभी थका नहीं है. अभी उसकी यात्रा पूरी भी नहीं हुई है. सच तो यह है कि जूता चिंतन जब अपने शवाब की ओर बढ़ ही रहा था, तभी मुझे यानी जूता चिंतक को वक़्त के कुछ जूते बर्दाश्त करने पड़ गए. बस इसीलिए जूता चिंतन को लिपिबद्ध करने की प्रक्रिया ज़रा थम सी गई थी. पर अब मैं फिर मैदान में हाजिर हूं और तब तक हाजिर ही रहूंगा जब तक कि फिर कोई जूता नहीं पड़्ता या चिंतन की प्रक्रिया अपनी चरम परिणति तक नहीं पहुंच जाती.) अथातो जूता जिज्ञासा-22 जूते बनाने वाला हमेशा सबसे ख़राब जूते ही पहनता है, यह कहावत जितनी पश्चिम में सही है उससे कहीं ज़्यादा सही यह हमारे भारतीय परिप्रेक्ष्य में है. ग़ौर करे तो आप पाएंगे कि हमारे भारत महान में तो बहुत दिनों तक जूते बनाने वाले के लिए जूते पहनना ग़ुनाह जैसी बात रही है. यहां जूते पहनने की अनुमति सिर्फ़ उन्हें ही रही है जो जूते चलाना जानते थे. बिलकुल वैसे ही जैसे फ्रांस की वह रानी साहिबा - मैरी अंतोनिएत. पर अब जूते बनाने वाले भी यहां जूते पहनने लगे हैं और यक़ीन मानिए उन्हें भी यह नसीब तभी हुआ है जब उन...

अथातो जूता जिज्ञासा-22

पिछले दिनों भाई ज्ञानदत्त जी बहुत परेशान हुए कि भरतलाल ने जाने उनकी चटपटी कहां रख दी है. पता नहीं आप कभी ऐसी परेशानी से हलकान हुए या नहीं, पर इस बात से इतना तो तय हुआ कि अभी भी ऐसे लोग हैं जिन्हें चटपटी पहनने का शौक़ है. चूंकि हिन्दुस्तान में चटपटी पहनने के शौक़ीन लोग हैं, लिहाजा यहाँ चटपटी मिलती भी है, अब यह अलग बात है कि ज़रा मुश्किल से मिलती है. वैसे मेरा ख़याल है कि आपको यह जानकर ताज्जुब नहीं होगा कि भारत के अलावा कुछ ऐसे देश भी हैं जहाँ जहाँ चटपटी बड़ी मुश्किल से मिलती है, अलबत्ता यह जानकर ताज्जुब ज़रूर होगा कि अभी भी पश्चिम में कुछ ऐसे देश हैं जहाँ चटपटी मिलती है और कुछ ऐसे लोग भी हैं जो बड़े शौक़ से उसका इस्तेमाल भी करते हैं. जी हाँ, मैं उसी चटपटी की बात कर रहा हूँ जो खड़ाऊँ जी की छोटी बहन है. आधुनिक भाषा में परिभाषित करना हो तो यूँ समझें कि लकड़ी के सोल पर रबड़ की पट्टी वाली चप्पल. अंग्रेज लोग इसे यही कहते भी हैं और इसे पहनना बड़ी प्रतिष्ठा की बात मानते हैं. उनकी एक कहावत है : ही इज़ सच अ लायर यू कैन फील इट विद योर वुडेन शूज़. यहँ वुडेन शूज़ का मतलब कुछ और नहीं वही चटपटी है. असल में यह कहाव...

अथातो जूता जिज्ञासा-21

अब जहाँ आदमी की औकात ही जूते से नापी जाती हो, ज़ाहिर है सुख-दुख की नाप-जोख के लिए वहाँ जूते के अलावा और कौन सा पैमाना हो सकता है! तो साहब अंग्रेजों के देश में सुख-दुख की पैमाइश भी जूते से ही होती है. अब देखिए न, अंग्रेजी की एक कहावत है : द बेस्ट वे टो फॉरगेट योर ट्र्बुल्स इज़ टु वियर टाइट शूज़. मतलब यह अपने कष्ट भूलने का सबसे बढ़िया तरीक़ा यह है कि थोड़ा ज़्यादा कसे हुए जूते पहन लीजिए. निश्चित रूप से यह कहावत ईज़ाद करने वाले लोग बड़े समझदार रहे होंगे. अपने नाप से छोटा जूता पहन कर चलने का नतीजा क्या होता है, यह हम हिन्दुस्तानियों से बेहतर और कौन जानता है. यह अलग बात है कि यह कहावत अंग्रेजों ने ईज़ाद की, लेकिन नाप से छोटे जूते पहन कर चलने की कवायद तो सबसे ज़्यादा हम भारतीयों ने ही की है. हमने चपरासी के लिए तो शैक्षणिक योग्यता निर्धारित की है, लेकिन प्रधानमंत्री बनने के लिए आज भी हमारी मुलुक में किसी शैक्षणिक योग्यता की ज़रूरत नहीं है. यह हाल तब है जबकि आजकल हमारे यहाँ आप कहीं से भी डिग्रियाँ ख़रीद सकते हैं.  मतलब यह कि जो ख़रीदी हुई डिग्रियाँ भी अपनी गर्दन में बांधने की औकात न रखता हो वह भी इस दे...

अथातो जूता जिज्ञासा-20

फ्रांस के इतिहास और उसके चलते उसकी संस्कृति पर जूते का असर कितना जबर्दस्त है, यह बात अब साफ़ हो गई. एक बात और शायद आप जानते ही हों और वह यह कि दुनिया भर में पिछली दो-तीन शताब्दियों से फ्रांस को आधुनिकता का पर्याय माना जाता है. बिलकुल वैसे ही जैसे जैसे कि हमारे भारत महान को रीढ़रहितता का. इससे बड़ी बात यह कि फ्रांस की जो आम जनता है, वह अंग्रेजी जानने को बहुत ज़रूरी नहीं समझती है. इससे भी ज़्यादा शर्मनाक बात यह है कि अपने को अंग्रेजी न आने पर वहाँ के लोगों को कोई शर्म भी नहीं आती है. छि कितने गन्दे लोग हैं. है न! लेकिन नहीं साहब! दुनिया अजूबों से भरी पडी है और उन्हीं कुछ हैरतअंगेज टाइप अजूबों में एक यह भी है कि बाक़ी दुनिया को भी उनके ऐसे होने पर कोई हैरत, कोई एतराज या कोई शर्म नहीं है. इससे ज़्यादा हैरत अंगेज बात जब मैं बीए  में पढ़ रहा था तब मेरे अंग्रेजी के प्रोफेसर साहब ने बताई थी. वह यह कि एक ज़माने में अंग्रेज लोग फ्रेंच सीखना अपने लिए गौरव की बात समझते थे. ठीक वैसे ही जैसे आजकल हम लोग अंग्रेजी सीखकर महसूस करते हैं. किसी हद तक ऐसा वे आज भी समझते हैं. अब ऐसे जूताप्रभावित देश का जिस इतना...

अथातो जूता जिज्ञासा-19

हाँ तो हम बात कर रहे थे, विदेशों में जूते के प्रताप का. तो सच यह है कि विदेशों में भी जूते का प्रताप भारतवर्ष से कुछ कम नहीं रहा है. बल्कि मुझे तो ऐसा लगता है कि कई जगह भारत से भी ज़्यादा प्रताप रहा है जूते का. इसी क्रम में भाई आलोक नन्दन ने पिछले दिनों जिक्र किया था फ्रांस की एक रानी मेरी अंतोनिएत का. यह जो रानी साहिबा थीं, ये पैदा तो हुई थीं ऑस्ट्रिया में सन 1755 में, लेकिन बाद में फ्रांस पहुंच गईं और वहीं की रानी हुईं. जैसा कि भाई आलोक जी ने बताया है ये अपने दरबारियों पर जूते चलाया करती थीं. बेशक यह जानकर आपको दुख हो सकता है और मुझे भी पहली बार तो यह लगा कि यह कैसी क्रूर किस्म की रानी रही होंगी. लेकिन साहब उनकी क्रूरता की कहानियों का मामला दीगर मान लिया जाए तो उनकी जूते चलाने की आदत कुछ बुरी नहीं लगती रही होगी. ख़ास तौर से उनके दरबारियों को. केवल इसलिए नहीं कि वे दरबारी थे और दरबारियों को आम तौर पर जूते खाने की आदत होती ही है. अव्वल तो किसी के सही अर्थों में दरबारी होने की यह प्राथमिक टाइप की योग्यता है कि वह जूते खाने में न सिर्फ़ माहिर हो, बल्कि इसमें उसे आनन्द भी आता हो. जूते खाकर ...

अथातो जूता जिज्ञासा-18

अब बात जूता शास्त्र या जूतापैथी की नहीं, अपितु समग्र जूताशास्त्रीय परम्परा के अनुशीलन की है तो इसकी शुरुआत हमें आधुनिक भारतीय नियमानुसार पश्चिम से ही करनी होगी. मैं जानता हूँ कि अगर मैं सीधे भारत से ही इस परम्परा का अनुशीलन करने लगा तो चाहे वह कितनी भी महत्वपूर्ण क्यों न होअ, विद्वान (सॉरी मेरा मतलब इंटेलेक्चुल्स से था) लोग उसे स्वीकार नहीं करेंगे. अब देखिए न! हम शेक्सपपीयर को इंग्लैण्ड का कालिदास नहीं, कालिदास को भारत का शेक्सपीयर कहते हैं. मम्मट और विश्वनाथ जैसे आचार्यों के रहते हम कबीर, गोरख, तुलसी और रैदास के काव्य को प्लेटो की कसौटी पर कसते हैं. तो भला इस परम्परा को अगर मैंने केवल भारतीय कहा तो आप कैसे मान लेंगे. अभी देखिए, भाई अरविन्द जी इधर बताने लगे हैं कि भोले बाबा की पूजा बहुत पहले से दूसरे देशों में भी होती रही है. मुझे पक्का यक़ीन है इस बार वे ब्लॉगर भी महाशिवरात्रि पर अभिषेक करने जाएंगे, जो पिछली बार तक नहीं जाते रहे हैं. आख़िर अब मामला ग्लोबल है न भाई! असल में हम भारतवर्षियों की एक बहुत ही पुरानी आदत ये है कि अपनी जो भी चीज़ें हमें बुरी लगती हैं (चाहे वास्तव में वे कितनी भ...

अथातो जूता जिज्ञासा-17

यूँ तो चिकित्सा पक्ष को 16वें अध्याय में ही सम्पूर्ण मान लेने का मेरा इरादा था, लेकिन कुछ चिट्ठाकार साथियों की टिप्पणियों के ज़रिए जो आदेश आए उसके मुताबिक मुझे इसे विस्तार देना ज़रूरी लगा. इधर व्यस्तता का आलम कुछ ऐसा रहा कि लिखना सम्भव नहीं रहा, इसलिए समय से मैं पोस्ट नहीं कर सका. व्यस्तता आज भी कुछ ऐसी ही रही और रात को क़रीब साढे 11 बजे लौट कर लिखने का इरादा तो बिलकुल भी नहीं था. पर अब तो धन्यवाद ही कहना पडेगा उन सर्वथा अपरिचित पडोसी महोदय-महोदया को, जिनके यहाँ शायद शादी है और फिल्मी-ग़ैर फिल्मी गाने इतनी ऊंची आवाज़ में बजाए जा रहे हैं कि बेचारे कान के सही-सलामत होने पर अफ़सोस हो रहा है. मुझे याद आ रहा है, काफ़ी पहले मैंने एक फिल्म देखी थी- 'अग्निसाक्षी'. उसमें नाना पाटेकर हीरो थे और उनके कोई बगलगीर अपना जन्मदिन मना रहे थे. देर रात तक वे भी ऐसा कानफाडू शोर मचाए हुए थे. काफ़ी देर तक बर्दाश्त करने के बाद जब नाना साहब से नहीं रहा गया तो उन्होने अपनी बन्दूक उठाई और पहुंच गए उनके तम्बू-कनात में. चलाने लगे दनादन गोलियां. उनका डायलॉग ठीक-ठीक तो याद नहीं, पर उसका लब्बोलुआब यह था कि साले तुमने...

अथातो जूता जिज्ञासा-16

जूता जी की भूमिका भारतीय चिकित्सा शास्त्र में केवल यहीं तक सीमित हो, ऐसा भी नहीं है. कई अन्य महकमों की तरह चिकित्सा जगत या कहें कि महकमे में भी जूते को एक सम्मानजनक हैसियत प्राप्त है. इसका एहसास मुझे बहुत जल्दी हो गया. तभी जब मैं गोरखपुर में था. हुआ यूँ कि एक बेचारे आम आदमी का एक्सीडेंट हो गया. घर-परिवार और गाँव-बाज़ार के लोगों की नज़र में वह सिर्फ़ आम ही नहीं, बल्कि कुछ-कुछ आवारा किस्म का आदमी था. अब ज़ाहिर है, ऐसी स्थिति में उसकी कोई हैसियत तो थी नहीं. फिर भी उसे लेकर लोग तुरंत अस्पताल आए. अब चूंकि वह आवारा ही था, पैसा-कौडी तो उसके या परिवार वालों के पास कुछ था नहीं,  लिहाज़ा उसे किसी प्राइवेट अस्पताल में नहीं जाया जा सकता था. उधर सरकारी अस्पतालों से गम्भीर मरीजों के ठीक होकर वापस घर लौटने की परम्परा आप जानते ही हैं कि आज तक शुरू नहीं हो सकी है. इसके बावजूद उसे सरकारी अस्पताल मे ही भरती करवाया गया. सरकारी अस्पताल में आने के बाद पहले तो उसे भर्ती करने से ही मना कर दिया गया, पर इसी बीच उसका कोई उसके ही जैसा यानी आवारा किस्म का मित्र आ गया और उसके दबाव पर उसे भरती कर लिया गया. हालांकि उ...

अथातो जूता जिज्ञासा-15

जूते के प्रताप की सीमा यहीं सम्पन्न नहीं हो जाती है. नज़र उतारने या बुरी नज़र से अपने भक्तों को बचाने की जूता जी सामर्थ्य तो उनकी शक्तिसम्पन्नता की एक बानगी भर है. वस्तुतः उनकी कूवत इस सबसे भी कहीं बहुत ज़्यादा है. पता नहीं आधुनिक विज्ञान वालों ने अभी मान्यता दी या नहीं, लेकिन सच यह है कि कई दारुण किस्म के रोगों के इलाज में भी जूता जी का प्रयोग धडल्ले से किया जाता है. आप ठीक समझ रहे हैं. मेरा इशारा मिरगी नामक रोग की ओर ही है. नए ज़माने के पढे-लिखे टाइप समझे जाने वाले लोग फिट्स कहते हैं. पता नहीं इसे फिट्स कहना वे कितना फिट समझते हैं, लेकिन एक बात ज़रूर है और वह यह कि फिट के इस बहुवचन का प्राथमिक उपचार वे भी जूते से ही करते हैं. यक़ीन मानिए, जूते का ऐसा भी उपयोग हो सकता है, यह अपने पिछडे गाँव में रहते हुए मुझे मालूम नहीं हो पाया. जूता जी की इस सामर्थ्य का पता मुझे तब चला जब मैं शहर में आया. हुआ यों कि एक दिन एक सरकारी दफ्तर में एक सज्जन को फिट्स पड गया. पहले तो लोगों ने यह समझा कि वह शायद फिट हो गए हैं. ऐसा लोगों ने इसलिए समझा क्योंकि वे सज्जन ऐसे लोगों में शामिल थे जिनके लिए खाने से ज़्यादा...

अथातो जूता जिज्ञासा-14

इससे इतना तो जाहिर हो ही गया कि अपनी व्यवस्था में जूते को हमने सिर पर बैठा रखा है. एक और बात हम सुनिश्चित तौर पर कह सकते हैं कि किसी ऐसी चीज़ को किसी देश की व्यवस्था में सिर पर प्रतिष्ठित किया ही नहीं जा सकता है जिसे उस देश के लोक ने अपने सिर पर स्थान न दिया हो. लिहाजा अब इस बात पर आपको कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि जूते को हमारे लोक ने भी अपने सिर पर बैठा रखा है और लोक ने उसे यह महत्वपूर्ण स्थान ऐसे ही नहीं दे दिया है. इसके मूल में कुछ अत्यंत वैज्ञानिक टाइप के कारण निहित हैं. भारत के कई शहरों के रिहायशी इलाकों में आपको बेहद ख़ूबसूरत इमारतें बनी दिख जाएंगी. अगर ग़ौर फरमाएंगे तो पाएंगे कि उनमें से कई घरों के छज़्जे से जूते लटके होते हैं. आप क्या सोचते हैं कि यह ग़लती से लटक रहे हैं. अरे नहीं जनाब! ऐसा सोचने की ग़लती भी मत करिएगा. असल में ये जूते बहुत सोच-समझ कर लटकाए गए होते हैं. ये जूते घरों के लिए वही काम करते हैं जो बच्चों के सिर पर डिठौने. एक ऐसी दुनिया में जहाँ मुट्ठी भर लोगो के पास सौ-सौ महल हों और करोडों लोगों के पास ढंग की झोपडी भी न हो, वहाँ अच्छे मकानों को देख कर लोगों द्वारा आहें ...

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