त्रासद विभ्रम का दौर
इष्ट देव सांकृत्यायन
॥श्री गुरुचरण कमलेभ्यो नमः॥
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से लोगों को लगा होगा कि अब बवाल थम जाएगा। कॉक्रोच
अलग प्रसन्न हुए कि वे सरकार से कुछ भी करवा सकते हैं। सरकार ने उस समय राहत की
साँस ली कि उसने बला टाल दी। सरकारी लोग इसे मास्टर स्ट्रोक बताने में लग गए। लेकिन
यह एक ऐसा भ्रम साबित हुआ, जिसका आज तक कोई जोड़ नहीं हुआ। यह भ्रम केवल सरकार ही नहीं, तथाकथित आंदोलनकारियों, अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों और आम
जनता सबके लिए होगा। ग्रहस्थितियाँ ही ऐसी हैं कि पूरी दुनिया भ्रमित है और अभी
देर तक रहेगी। हालाँकि एक-एक कर सारा भ्रम छँटेगा। ऐसे-ऐसे रहस्य सामने आएंगे, और ऐसे-ऐसे भ्रम छँटेंगे कि
आश्चर्य को भी आश्चर्य होगा। आने वाला समय न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया के लिए भयावह
है। प्राकृतिक दुर्घटनाएँ, असंतोष, जन विद्रोह और सांप्रदायिक दंगे... यह सब
दिखाई दे रहे हैं। अराजक तत्त्वों का अहंकार चरम पर होगा और सरकार जितना बैकफुट पर
आती जाएगी, उनका यह अहंकार उतना ही प्रबल होता चला जाएगा। इस पूरे उपक्रम से शेयर बाजार भी बहुत बुरी तरह प्रभावित
होगा। विश्व बाजार एक बार फिर मंदी की ओर बढ़ेगा और परिणाम होगा वित्तीय क्षेत्र
में अभूतपूर्व परिवर्तन। कुछ ऐसा हो सकता है जिससे मनी फ्लो का तरीका ही बदल जाए।
आइए, ग्रह
स्थितियाँ समझते हैं और यह भी कि यह सब क्यों होगा। बृहस्पति अतिचारी पहले से ही
हैं। 2 जून को ही 2 बजकर 25 मिनट पर उच्चस्थ भी हो चुके हैं। इसी अवस्था में 16
जुलाई को सायं 7 बजकर 27 मिनट पर अस्त हुए हैं। अब वे 11 अगस्त तक अस्त ही रहेंगे।
शनि 27 जुलाई से वक्री हो रहे हैं। चल वे बृहस्पति के घर में रहे हैं। बृहस्पति की
दृष्टि भी शनि पर है। बृहस्पति इस वर्ष के राजा, धनेश और नीरसेश तीनों हैं। शनि
मंत्रिमंडल में कहीं नहीं हैं। सूर्य के पुत्र होने के बावजूद उनसे नैसर्गिक बैर
के नाते नेता विपक्ष तो वह स्वाभाविक रूप से हैं ही। वक्री होने पर कोई भी ग्रह
अपने बैकलॉग पर पिल पड़ता है। उनका यह वक्रत्व 1 दिसंबर तक चलेगा। शनि के साथ ही
नेप्चून भी हैं। वक्री होने के बावजूद 20 अगस्त तक शनि रेवती नक्षत्र के दूसरे चरण
में ही बने रहेंगे, जहाँ ये 2
जुलाई को आए हैं। लेकिन, 20 अगस्त को सायं 7 बजकर 45 मिनट पर यह वापस रेवती के पहले चरण में पहुँच
जाएंगे। रेवती बुध के स्वामित्व वाला नक्षत्र है। दूसरा चरण शनि का अपना ही नवमांश
होता है, लेकिन
पहले में जाकर ये फिर से बृहस्पति के नवमांश में आ जाएंगे।
मंगल अभी वृष राशि में हैं और 2 अगस्त को मिथुन में आ जाएंगे, यानी नीचाभिलाषी हो जाएंगे। शनि
पहले से नीचाभिलाषी हैं। राहु पहले ही कुंभ में हैं। कुंभ राशि पर राहु अपना भी
अधिकार मानते हैं, साझेदारी
वाले स्वामित्व जैसा। वहाँ वे शनि, गुरु और मंगल तीनों की दृष्टि से ओझल हैं। साथ ही, शनि के निकट भी। उलटे अपनी ही राशि
मिथुन में स्थित बुध पर राहु की पाँचवीं दृष्टि है। यानी किशोर एवं युवा वर्ग
अदृश्य विदेशी ताकतों द्वारा फैलाए गए भ्रमजाल से पूरी तरह आक्रांत है। अगर सरकार
या किसी को यह लगता है कि इस्तीफे से कोई समाधान निकलेगा तो वह भी राहु के मायाजाल
में फँसे हुए होने का ही परिणाम हो सकता है। बिलकुल वैसे ही जैसे अभी देश में बहुत
सारे लोगों को ऐसा लग रहा है कि यह आंदोलन नीट के पेपर लीक के खिलाफ था।
समझने की बात यह है कि शनि अभी बृहस्पति के घर में हैं और बृहस्पति से दृष्ट भी। लेकिन हैं वे वक्री और साथ ही
नीचाभिलाषी भी। ऊपर से बृहस्पति स्वयं अस्त हैं। अभी 11 अगस्त तक का समय, जब तक शनि के वक्री होने के
साथ-साथ बृहस्पति अस्त भी हैं, त्रासद है। अगले तीन साल यानी 2029 तक ऐसी स्थिति कई बार
आएगी जब शनि वक्री और गुरु अस्त होंगे। ऐसे हर समय पर सचेत रहने की आवश्यकता होगी।
मेदिनी ज्योतिष में ये वह स्थिति होती है, जब पूरी जनता उबल पड़ती है। ऐसी
बहुत सारी माँगें नए सिरे से उठेंगी जिनको अभी तक दबाया गया है। जनता का असंतोष
अपने चरम पर होगा और खुलकर अभिव्यक्त भी होगा। शनि अनुशासन और निरंतरताप्रिय हैं।
अनुशासनहीनता उन्हें बिलकुल बर्दाश्त नहीं है। शनि के ठीक पीछे राहु बैठे हैं, उनके अपने ही घर में। वेनेजुएला
के सत्ता परिवर्तन में राहु की इस स्थिति की ही सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। नेपाल, बांग्लादेश और ईरान में भी हो हुआ
या हो रहा है, उसमें इस
ग्रहस्थिति की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
आपको याद होगा, वेनेजुएला
से जब राष्ट्रपति का अपहरण किया गया, उसी समय मचाडो को नोबेल प्राइज मिला था। ट्रंप ने खुद को
उसका असली हकदार बताया था और मचाडो ने वह मौखिक रूप से ट्रंप को समर्पित भी कर
दिया था। जिन लोगों को सीक्रेट सर्विसेज की कार्यशैली और सीआईए ऑपरेशंस की थोड़ी सी
भी समझ है, वे सब इस
संक्षिप्त नौटंकी और उसमें दोनों की ओवरएक्टिंग का मर्म बिलकुल ठीक समझ रहे थे। मैंने
तभी कहा था कि वेनेजुएला की जनता के साथ कुछ बहुत बड़ा धोखा होने जा रहा है। उस समय
राहु स्वयं अपने ही नक्षत्र शतभिषा में थे। यहाँ उनके रहते हुए मेदिनी की दृष्टि
से एक अच्छी बात यह होती है कि कुछ असाध्य रोगों की औषधियों या किसी नई उपचार
पद्धति का आविष्कार होता है। खराब बात यह होती है कि जिन देशों की कुंडली में राहु
अकारक हैं, उनमें अगर
वे मजबूत स्थिति में हुए तो वहाँ
लंबे समय से चली आ रही भितरघाती साजिशें सफल हो जाती हैं। न्यूनतम रक्तपात से दूसरे देशों की
सत्ता पर कब्जे का सर्वोत्तम माध्यम जनांदोलन माना जाता है और पूँजीवादी एवं अतिवादी
दोनों ही तरह की अतिवादी सत्ताओं ने इस तरह के कुछ तत्त्वों को हर देश में पाल रखा
है। समय-समय पर वे इनकी फंडिंग भी करते रहते हैं, दूसरे-दूसरे बहानों से। समय आने पर
वे इनका दुरुपयोग करते हैं। वे हर
आंदोलन में ऐसे ही घुसने का प्रयास करेंगे। उन आंदोलनों में भी जो बिलकुल सही माँगों
को लेकर गंभीरतापूर्वक और बड़ी सतर्कतापूर्वक चलाए जाएंगे। सरकार के लिए तो जो भी चुनौतियाँ
होंगी वो अलग बात हैं, जो आंदोलनों
में शामिल हों या नेतृत्व करें, उनके लिए यह ज्यादा जरूरी होगा
कि ऐसे तत्त्वों पर ध्यान रखें। आंदोलन के नाम पर अराजकता फैलाने या कहीं भी कुछ भी
खाने से बचें। खैरात का भोजन जानलेवा हो सकता है।
राहु का थोथे अहंकार
से जितना प्रेम है, आत्मसम्मान
से उन्हें उतनी ही घृणा है। ठीक यही बात कर्तव्यपरायणता और अकर्मण्यता के मामले
में भी है। राहु उद्यम के नए-नए और अद्भुत विचार देते हैं, लेकिन
सही दिशा में उद्यम उन्हें पसंद नहीं है। उन्हें पसंद है गलत दिशा में उद्यम।
भिखारी, चोर-डकैत, गुंडे-मवाली,
मुफ्तखोर, करचोर, जनता का खून चूसने की तरह कर वसूलने वाला
राजा [5000% टैरिफ लगा देंगे छाप], शोषक उद्योगपति [एक दिन में 30 घंटे काम छाप] और सबसे ज्यादा किसी दूसरे देश की शह पर अपने देश और उसकी
जनता के साथ घात करने वाले भेदिए या विदेशी एजेंट उनके विशेष कृपा पात्र होते हैं।
शनि को नियमित श्रम और उसके बदले न्यायपूर्ण वेतन देना पसंद है। लेकिन राहु को उलटे-सीधे
तरीके से आधी-पौनी मजदूरी देकर अनुबंधित कर्मचारी रखना और राजकीय कोष का अधिकतम पैसा
कमीशनखोरी में बर्बाद करवाना पसंद है। आप खुद यह गौर कर सकते हैं कि देश में अधिसंख्य
जनता से लेकर सरकार तक सभी राहु के ही तत्त्व को मजबूत करने में लगे हैं। यह सब तब
तक चलेगा जब मंगल में राहु की अंतर्दशा है। राहु का मजबूत होना न तो देशहित में है
और न ही समाजहित में। विदेशों से पुरस्कार-सम्मान मिलने के कारण भी राहु ही होते
हैं। चूँकि भारत की कुंडली में मंगल में राहु का अंतर है, तो आप देखेंगे कि भारत से जल्दी ही किसी
ऐसे व्यक्ति को सम्मान मिलेगा जो बहुतों को आश्चर्यचकित कर देगा। यह राहु का अंतर खत्म
होने के आसपास होगा। हालाँकि उसकी पोल-पट्टी जल्दी ही खुल जाएगी। क्योंकि उसके बाद
जल्दी ही बृहस्पति का अंतर आ जाएगा। मंगल में राहु का अंतर 26 फरवरी 2027 तक चलेगा।
फिर 1 फरवरी 2028 तक गुरु का अंतर होगा। यह दौर बड़े-बड़े रहस्योद्घाटनों का होगा। इसके बाद शनि आएंगे और वे 11 मार्च
2029 तक चलेंगे।
राहु और शनि का संबंध
बड़ा अद्भुत है, कार्यप्रणाली भी।
राहु अराजकता के लिए उकसाते हैं, और शनि उसी के लिए दंडित
करते हैं। राहु किसी के अहंकार को सातवें आसमान पर ले जाते हैं, फिर शनि और गुरु उसे धरती पर पटक देते हैं। जो शासक जनता की सही माँग पर
उसे बरगलाने की कोशिश करते हैं, उन्हें लफंगों के सामने
साष्टांग दंडवत होना पड़ता है। जो माननीय देश भर को यह समझा रहे थे कि यूजीसी
विनियमों का दुरुपयोग नहीं होने पाएगा, उन्हें एक बार भी यह
कहने की हिम्मत न पड़ी कि पेपरलीक का दुरुपयोग न होने पाएगा। एक ऐसी बात के लिए
इस्तीफा देना पड़ा जिसका कोई अर्थ ही नहीं था। 70 घंटे काम चाहने वाले सेठ जी को
फ्रांस में इसी बात के लिए जुर्माना देना पड़ा। छप्पन इंच के मुँह पर टेप लग गया। पुलिस
बलों को सही काम के लिए लफंगों की निंदा और अपने खिलाफ अफवाहों का शिकार होना पड़ा।
यह शनि और बृहस्पति की वर्तमान स्थिति का परिणाम है। शनि की दृष्टि गोचर में भारत
की आय, मित्रों, पड़ोसियों, पराक्रम और युवावर्ग पर है। ये सभी अभी दुष्प्रभावित हैं। अब शनि वक्री हो
चुके हैं। एक आंदोलन खत्म हुआ, दूसरे की भूमिका बननी शुरू हो
गई। लग्न में उच्च के बृहस्पति बचाएंगे तो लेकिन साथ ही लंबे समय से टलते आ रहे
कार्यों का हिसाब भी लेंगे।
सरकार को एक के बाद एक
जनाक्रोश का सामना करना पड़ेगा। ऐसा नहीं है कि सभी उत्पात मचाने वाले ही होंगे, लेकिन चूँकि राहु शनि के अत्यंत
निकट हैं, इसलिए किसी
भी आंदोलन में कुछ अराजक तत्त्वों
के घुस आने से इनकार नहीं किया जा सकता। यह सही माँग को लेकर चल रहे आंदोलनों की
धारा को भी गलत दिशा में मोड़ देगा। इनसे सरकार और आंदोलनकारियों दोनों ही को बहुत
सचेत रहने की आवश्यकता होगी। विपक्ष का रवैया नकारात्मकता की उस हद तक जाएगा जिसकी
अभी कल्पना भी नहीं की जा सकती।
मैंने बहुत पहले भी यह
कहा था कि ऐसे बहुत सारे लोगों की ऐसी असलियत सामने आएगी जो किसी ने सोचा भी नहीं
होगा। अयोध्या स्थित श्रीराम मंदिर और बदरीनाथ मंदिर के चढ़ावे में घपले से त्रासद
उदाहरण इसका और क्या हो सकता है! इसी बीच वक्फ बोर्ड में उससे भी बड़े घपले सामने
आए। लेकिन वे चर्चा के उतने बड़े विषय नहीं बने। हालाँकि बचेगा कोई नहीं। अभी जिस एफसीआरए संशोधन को लटकाने
के लिए सारे घोड़े खोले गए हैं, वो इस सत्र के अंत तक पास होकर रहेगा। इसके अलावा दिसंबर से
पहले ही कुछ ऐसे विधेयक या कानून बनने की संभावना भी प्रबल है जो एक झटके में
विदेशों से सहायता लेने वाले कई संगठनों की आय के रास्ते बंद कर दे। यह काम अचानक
किया जाएगा। यह तब होगा जब राहु कुंभ से मकर की ओर तथा गुरु कर्क से सिंह की ओर
बढ़ने वाले होंगे। हो सकता है कि ऐसे कई संगठनों को अचानक यह पता चले कि उनके खाते सीज
हो गए और अब वे कोई लेन-देन नहीं कर सकते।
राहु का मायाजाल वह है जिसने मायापति को भी धोखे में डाल दिया। ताकत वह है जो
सूर्य और चंद्र को लील जाती है। भारत की कुंडली में राहु कारक हैं। लग्न से अभी वह
दशमस्थ हैं, लेकिन
राशि से अष्टमस्थ। इसलिए सारी व्यवस्था चाक-चौबंद होने के बावजूद उसने विश्व स्तर
पर भारत के यश और सम्मान को मटियामेट कर दिया। एक ऐसे मुद्दे पर जिससे आंदोलन और
उसका समर्थन करने वालों का कितना लेना-देना था, यह जनता ने हाल ही में लोकसभा में
देखा। वही विपक्षी पार्टियाँ पूरी बेशर्मी से पेपरलीक संबंधी विधेयक का विरोध करती
हुई दिखीं जो नीट की चिंता में हलकान हुई जा रही थीं। राहु की माया का प्रभाव
देखिए। मजे की बात ये है कि पेपरलीक का जो मुख्य कारण है, यानी कोचिंग का गंदा धंधा, उसे पूरी तरह बंद करने या उसके
प्रॉपर रेगुलेशन की कहीं कोई बात तक नहीं हुई। यहाँ तक कि छात्र और अभिभावक भी
कोचिंग को एक अनिवार्य आवश्यकता मान चुके हैं, यह समझे बगैर कि 12वीं स्तर के
छात्र से एमएससी स्तर के आइक्यू की माँग करने वाली पेपर सेटिंग करवाने में कोचिंग
चलाने वालों की साजिशों की कितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। मतलब यह कि अगर यह
विधेयक पास भी हो जाए और कानून बनकर लागू भी हो जाए तो कोई खास फर्क पड़ने वाला
नहीं है। जिस देश में सौ रुपये वाला ट्रैफिक चालान तक साबित नहीं हो पाता, वहाँ आप एक करोड़ के जुर्माने वाला
पेपरलीक क्या खाकर साबित कर लेंगे? और साबित हुआ भी तो वह तब होगा जब जिसे आप जेल करने वाले
होंगे, वह मर
चुका होगा। जमानत तो भारत में बड़े सैन्य अफसर की जघन्य हत्या करने वाले आतंकवादी तक
की हो जाती है, पेपरलीक
क्या बला है!
मैं कोचिंग की चर्चा ऐसे ही नहीं कर रहा हूँ। ज्योतिष की दृष्टि से इसे गहराई
से समझने की जरूरत है। शिक्षा बृहस्पति का अधिकारक्षेत्र है, परीक्षा शनि का। लेकिन परीक्षा में
नकल, पेपरलीक, या परिणाम आने से पहले परीक्षक का
पता चल जाना और उसे प्रभावित करके अंक बढ़वाना, या परीक्षक पर किसी भी प्रकार का दबाव
डलवाना अथवा लापरवाही बरतना.... ये सब राहु के विषय हैं। किसी विषय में कमजोर
छात्र के लिए ईमानदारी से ट्यूशन लेने या अतिरिक्त श्रम करने में बृहस्पति के साथ
शनि की भूमिका होती है। लेकिन परीक्षा पास करने के लिए सिर्फ ट्रिक्स बताना राहु
का काम है। प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं के लिए जो भी कोचिंग चल रही हैं, आप जानते हैं कि उनके पास ट्रिक्स
के अलावा बताने के लिए और है क्या! राहु केवल ट्रिक्स नहीं बताते, वे वो सब करते हैं जिससे किसी भी प्रकार से लक्ष्य सधे, चाहे उसके लिए पात्रता हो या न हो।
लीक हुआ पेपर खरीदना भी बुध पर राहु के प्रभाव से होता है। यह बुध पर राहु के
प्रभाव का ही परिणाम है कि बड़ी संख्या में युवाओं ने लीक हुआ पेपर खरीदा, उसका उपयोग भी किया और अंततः सब
नष्ट हो गया। पेपर लीक खुल गया और वह सारा खर्च और श्रम भी बर्बाद हुआ। कुछ भी काम
न आया। असल में यह बात बहुत बाद में समझ आती है कि राहु भला किसी का नहीं करते।
उनका काम ही छल-प्रपंच है। ऊपर से गोचर में शनि पर गुरु की दृष्टि है। गुरु लग्न
में हैं। लग्नस्थ गुरु कितने शक्तिशाली और शुभ होते हैं, यह सभी जानते हैं। उनके रहते कोई साजिश पूरी तरह सफल नहीं
हो पाती। इसीलिए वृद्ध वसिष्ठ संहिता में कहा गया है –
किं कुर्वन्ति ग्रहाः सर्वे यस्य
केन्द्रे बृहस्पतिः।
लग्ने विशेषतः प्राज्ञो हन्ति दोषसहस्रकम्॥
इसलिए जो मूल साजिश थी, जिसकी बार बार जंतर मंतर पर घोषणा भी की
जाती रही, वह नहीं हो सका। पर बृहत्संहिता में यह भी कहा गया
है –
यदि गुरु शीघ्रं गच्छेत्, तदा जनव्यथाः भवन्ति,
राजकीय क्लेशः, वृष्टिहीनता च प्रकटते।
अर्थात जब बृहस्पति (गुरु) ग्रह अपनी
सामान्य गति छोड़कर अत्यधिक तीव्र गति (अतिचार) से आगे बढ़ते हैं, तब पृथ्वी पर जनसाधारण को पीड़ा, शासन-सत्ता में अस्थिरता (राजकीय क्लेश) तथा वर्षा में कमी
या बाधा (वृष्टिहीनता) का सामना करना पड़ता है। इसके परिणाम सामने हैं।
सूर्य अभी बृहस्पति के
ही नक्षत्र पुष्य में हैं। लेकिन 3 अगस्त को वे बुध के स्वामित्व वाले आश्लेषा
नक्षत्र में चले जाएंगे। और वहाँ उन पर राहु की दृष्टि है। बुध अभिव्यक्ति हैं, लेकिन किसी भी अभिव्यक्ति का
मैनिपुलेशन राहु। बुध राहु से दृष्ट होने के साथ-साथ 24 जुलाई तक अपनी ही राशि में वक्री भी थे। यह मैनिपुलेशन इस हद तक गया कि
जिस परीक्षा में बीसों बार पेपरलीक और खुलेआम बेईमानी की घटनाओं पर अखबारों में
दूसरे दिन खबर तक न आई उसी परीक्षा को लेकर इतना बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया। इसमें बड़ी
संख्या में युवा शामिल हुए, यह राहु पर बुध का प्रभाव है। लेकिन युवाओं के नाम पर इसी
आंदोलन में कई गुंडे-मवाली शामिल हुए। ऐसे-ऐसे तत्त्वों ने सरकार और व्यवस्था को
खुलकर गालियाँ दीं जिन्हें नीट का फुलफॉर्म तो छोड़िए, इस एब्रिविएशन की स्पेलिंग तक पता
न होगी। लिखने को कहा जाए तो शायद वे NEAT लिखें।
यह वक्री बुध पर राहु
का प्रभाव ही था जो सीजेआई की किसी और संदर्भ में की गई टिप्पणी को इतनी बुरी तरह मैनिपुलेट किया
गया कि उसी नाम से पार्टी तक बना दी गई। जोमैटो और स्विगी के जरिये अज्ञात स्थानों से आंदोलनकारियों के लिए भोजन का
ऑर्डर किया गया और आंदोलनकारियों ने खाया भी। छोटी सी दुकान से बीस हजार रुपये
महीना कमाने वाले महापुरुष ने हफ्ते भर रोज दस लाख रुपये से अधिक का खाना खिलाया।
अपने को नीट जैसी प्रतिष्ठित प्रतिस्पर्द्धा का हिस्सेदार बताने वाले अत्यंत तथाकथित
प्रतिभाशाली छात्रों ने उसे चटखारे ले लेकर खाया भी। कल्पना करिए, अगर कोई अराजक तत्त्व झूठमूठ में अपने को
स्विगी-जोमैटो का ध्वजवाहक बताकर एक फर्जी टीशर्ट पहनकर वहाँ दस लोगों को दूषित
खाद्य पदार्थ बाँट जाता....? क्या नीट छात्र ऐसे अति समझदार होते
हैं कि किसी का भेजा कुछ भी खा लें?
ये सारे आख्यान कैसे
खड़े किए गए और इसमें विदेशी एजेंसियों का कितना हाथ था, यह सब आगे खुलेगा। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं
है कि इससे सरकार या जनता की मुश्किलें कम हो जाएंगी। ऐसी वास्तविक माँगे भी
उठेंगी जिनको वर्षों से टरकाया जा रहा है। न्यायोचित होने के बावजूद उन पर किसी की
ओर से ध्यान तक नहीं दिया जा रहा है। जब भी कोई बात होती है तो राजनैतिक लोग और
उनके पालतू बुद्धिजीवी फालतू कुतर्क करने लगते हैं। कुछ ऐसी बातें भी होंगी जिनके
चलते सांप्रदायिक और जातीय टकराव जैसी उत्पन्न हो। क्योंकि बुध 3 अगस्त को राहु की
दृष्टि से तो बाहर हो जाएंगे लेकिन एक तो वे चंद्रमा की राशि में होंगे, जिन्हें वे अपना शत्रु मानते हैं।
और दूसरे 9 अगस्त को वे अपने
क्रांतिवृत्त अर्थात परिक्रमा पथ में परिवर्तन कर लेंगे। यह वह समय होगा जब
अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नियमों में कुछ बड़े परिवर्तन होंगे। राहु के धनिष्ठा में
जाने से जहाँ मंदी जैसे हालात बनेंगे, वहीं बुध के इस
परिवर्तन से आइटी सेक्टर जैसे कुछ शेयरों में तेजी भी आएगी। लेकिन कुल मिलाकर यह शेयर
बाजार या उद्योग जगत के लिए ठीक नहीं है। क्योंकि राहु 2 अगस्त को धनिष्ठा के चौथे
चरण में प्रवेश कर जाएंगे। फिर 4 अक्टूबर को वे धनिष्ठा के ही तीसरे पद में होंगे।
इस बीच का समय दुनिया भर की अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल मचाने वाला होगा। कच्चे या शौकिया
खिलाड़ियों के लिए शेयर बाजार से दूर रहना ही ठीक होगा।
मंगल पर शनि और केतु पर मंगल की दृष्टि और राशि से आठवें भाव में राहु का होना यह बता रहा है कि भूगर्भ में कुछ अलग तरह की हलचलें हो रही हैं। आने वाले दिनों में हिमालय और पश्चिमी घाट वाले क्षेत्रों में भूकंप और भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ सकती हैं। कुछ राज्यों में सरकारों में बड़ा फेरबदल हो सकता है। केंद्र सरकार में बदलाव की कोई आशंका नहीं है, लेकिन इसकी लोकप्रियता में निरंतर गिरावट आती दिख रही है। वे लोग भी जो इसके प्रबल समर्थक रहे हैं, किसी न किसी कारण से सरकार के प्रति अपनी सहानुभूति खोते दिखेंगे। उपद्रवी तत्त्वों के खिलाफ जनता सख्त कार्रवाई चाहेगी और सरकार ऐसे ही टालमटोल करती दिखेगी। कभी वार्ता और कभी कोर्ट। विदेशों भी भारत और सरकार की छवि धूमिल होगी। विपक्ष खुद अपने कृत्यों से ही अपनी मिट्टी पलीत करता दिखेगा।
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