mahila banaam mahila visheshank
व्यंग्य व्यंग्य बनाम महिला विशेषांक -हरिशंकर राढ़ी उस दिन संपादक जी पधारे तो प्रकाश्य महिला विशेषांक हेतु उपलब्ध सामग्री पर व्यापक चर्चा हुई। यहाँ तक तो गनीमत थी किन्तु चर्चा के उपसंहार रूप में उनका आदेशात्मक आग्रह हुआ,''इस बार तुम्हारी वक्रोक्ति महिला विशेषांक या महिलाओं पर केन्द्रित होनी चाहिए , इस बात को ध्यान में रखकर ही कुछ लिखना ।'' मुझे काटो तो खून नहीं। मुझे संदेह हुआ- कहीं संपादक का दिमाग तो कुछ खिसक नहीं गया है। इनके मन में कब क्या आ जाएगा , भगवान भी नहीं जान सकता। हठात् पूछ ही बैठा...