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ओपिनियन पोल

- काका , ए काका!   - हाँ बोल बेटा!   - ई ओपिनियन पोल का होता है काका ? - ओपिनियन पोल बस इस समझ ले बेटा कि जैसै गाँव एक-दुइ ठो टोनहा नइंं होत हैं... - हाँ हाँ काका , बूझि रहे हैं... - बूझि रह्यो ह्यो न ?  - हाँ बूझि रहे हैं..   - हाँ त बस ई समझि ल्यो कि जैसै ऊ टोनहा होत हैं... दिन भर बरबर बरबर करत रहत हैं.. मने न करै क कौनो मल्लब... न कुछ जानै के न कुछ बूझै के... बस ऐसै आपन हाँके जात हैं.. जैसै सबसे बड़ा बिदमान इहै हैं..   - मल्लब बुझाया नै काका... तनि और फरियाऔ ...   - का फरियाएं.. अब हम का फरियाएं हो...   - मल्लब ई बताओ कि एक ठू पिरी पोल होत है..   - हाँ होत है.   - ऊ का होत है ?  - ऊ बस ई समझौ कि फिरी पोल होत है. फिरी पोल मल्लब ई कि तब होत है जब चुनाव कि बस सुगबुगाहट हो. मन्ने जे कि कुच्छ नईं.. मने कि जैसै बस हवा में लट्ठ भांज रह्ये ह्यों... न सूत न कपास जुलाहों में लठमलठ... त जिसका जिसकौ मन करता है ऊ उसी को हरानै लगता है... और जिसको मन किया जितान लगा... अब ई समझ ल्यो कि टोनहा को जिधर से चाय पकौड़ी , पान बीड़ी और कबो दसटकियो मिल गया तब बस अब... उहै जीतेगा..

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