विकास दुबे या विनय तिवारी
इष्ट देव सांकृत्यायन जो दशा विकास दुबे के घर की हुई , वह उससे पहले विनय तिवारी के घर की होनी चाहिए थी। विकास दुबे ने तो केवल ब्राह्मण जाति और मनुष्यता को कलंकित किया है लेकिन विनय तिवारी और उसके साथियों ने तो अस्तित्व मात्र को कलंकित किया। अपने ही साथियों के खिलाफ एक गुंडे के लिए सुरागरसी और उसके यह कहने के बावजूद कि आने दो सालों को ... सबको कफन में लपे ट देंगे ... अपने साथियों को कोई हिंट तक न देना ... उन्हें सचेत तक न करना ... इससे क्या पता चलता है ? यही न कि विनय तिवारी का भरोसा खुद अपने विभाग यानी पुलिस पर कम और एक गुंडे पर ज्यादा है। जब तक थानों से लेकर चौकियों तक की नीलामी होती रहेगी , आप यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि कोई पुलिस वाला विनय तिवारी से भिन्न हो सकता है ? और जब तक विनय तिवारी जैसे पुलिसिये मौजूद हैं , आप यह सोच भी कैसे सकते हैं कि आम जनता अपनी सुरक्षा के लिए विकास दुबे , मुख्तार अंसारी , हरिशंकर तिवारी , वीरेंद्र...