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विद्रूप सच्चाई का सुंदर ‘स्वाँग’

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हरिशंकर राढ़ी समीक्षा                         - हिंदी साहित्य में विडंबनाओं की बात की जाए तो संभवतः सबसे ऊपर के क्रम में व्यंग्य विधा या व्यंग्य प्राचुर्य की रचनाओं का उत्थान-पतन आएगा। पतन के मामले में कविता एवं लघुकथा का स्थान व्यंग्य के आसपास ही ठहरता है। वैसे , कविताओं की स्थिति पर बात न ही की जाए तो अच्छा , क्योंकि छंदमुक्त कविताओं ने सामान्य पाठक तक अपनी पहुँच कभी बनाई ही नहीं थी। किंतु व्यंग्य के मामले में स्थिति सुखद थी। लगभग आधी सदी की यात्रा में व्यंग्य ने अपना एक विशाल पाठकवर्ग बनाया , प्रशंसक बनाये , अखबारों-पत्रिकाओं में स्थायी स्तंभ बनाये तथा आलोचकों-समीक्षकों के चाहने न चाहने के बावजूद एक विधा के रूप में स्थापित हो गया। उसकी इसी लोकप्रियता को देखते हुए तमाम तरह के लेखक अपना हाथ व्यंग्य के क्षेत्र में आजमाने लगे। परिणाम यह हुआ कि सुव्यंग्य कम , कुव्यंग्य ज्यादा पैदा होने लगा। अब तो स्थिति यह आ गई है कि विमर्श इस बात पर होने लगा है कि बुरे व्यंग्य या अव्यंग्य से व्यंग्य साहित्य को कैसे बचाया जाए ? ‘ राग दरबारी ’ के बाद व्यंग्य आधारित उपन्यासों न लंबी यात्रा की है। कभ

नर्मदा के ओंकारेश्वर

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   - हरिशंकर राढ़ी              ओंकारेश्वर  मंदिर का एक दृश्य  महाकाल नगरी उज्जैन कई बार जाने के बावजूद वहाँ से लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर दूर नर्मदातट पर स्थित ओंकारेश्वर-ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग की अब तक मात्र दो यात्राएँ ही हो पाईं। हाँ , इतना अवश्य है कि जब भी उज्जैन जाना होता है , ओंकारेश्वर का मनोरम वातावरण बहुत गंभीरता से बुलाता है। यदि एक बार ओंकारेश्वर और नर्मदा तट पर पहुँच गए तो लौटते समय दुबारा आने का लोभ वहीं से प्रारंभ हो जाता है। द्वादश ज्योर्तिलिंगों की यात्रा में अभी केदारनाथ का सौभाग्य नहीं मिला है। निःसंदेह केदारनाथ प्राकृतिक दृष्टि से सर्वाधिक समृद्ध होगा , किंतु अन्य ज्योतिर्लिंगों की बात की जाए तो जो प्राकृतिक रमणीयता ओंकारेश्वर में है , वह किसी अन्य में नहीं है। अपनी लघु पर्वतीय सीमाओं में कल-कल , छल-छल करती नर्मदा , प्रातःकाल नर्मदा के स्वच्छ जल में नहाते लोग , नदी के दोनों ओर ज्योतिर्लिंगों के रूप में स्वयंभू ओंकारेश्वर और ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग जैसे पौराणिक स्थल प्रकृति और अध्यात्म का एक दुर्लभ दृश्य उपस्थित करते हैं। महीना नवंबर का था जो यात्रा के लिए सर्वाधिक सु

विदेशी विद्वानों के संस्कृत प्रेम की गहन पड़ताल

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हरिशंकर राढ़ी  ( विदेशी विद्वानों का संस्कृत प्रेम ’ -  जगदीश प्रसाद बरनवाल ‘ कुंद ’) विश्व की प्राचीनतम एवं सर्वाधिक व्यवस्थित भाषा का पद पाने की अधिकारी संस्कृत आज अपनी ही जन्मभूमि पर भयंकर उपेक्षा का शिकार है। उपेक्षा ही नहीं , कहा जाए तो यह कुछ स्वच्छंदताचारियों या अराजकतावादियों की बौद्धिक हिंसा का भी शिकार है। भले ही व्याकरण के कड़े नियमों में बँधी हुई संस्कृत दुरूह है , किंतु इसके साहित्य और लालित्य को समझ लिया जाए तो शायद ही विश्व की किसी सभ्यता का साहित्य इसके बराबर दिखेगा। इसे अतीत के एक खासवर्ग की भाषा मानकर जिस तरह गरियाया जा रहा है , वह एक विकृत राजनीतिक मानसिकता का परिचायक है।यह हमारे यहाँ ही संभव है अपनी प्राचीन भाषाओं को जाति , क्षेत्र और वर्ग के राजनीतिक चश्मे से देखा जाए। यदि संस्कृत भाषा और साहित्य इतना ही अनुपयोगी और दुरूह होती तो यूरोप सहित अन्य महाद्वीपों के असंख्य विद्वान इसके लिए अपना जीवन होम नहीं कर देते। हाँ , यह विडंबना ही है कि हमें अपनी विरासत का महत्त्व विदेशियों से अनुमोदित करवाना पड़ता है। संस्कृत भाषा और साहित्य से विदेशी विद्वानों को कितना लगाव रहा ह

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