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वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए अपनी भाषा का विकास आवश्यक

नई दिल्ली। वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सीखने की प्रक्रिया के लिए , अपनी भाषा में ज्ञान होना और वैज्ञानिक तथा उचित रूप से अपनी भाषा का विकास करना आवश्यक है। ये विचार केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग के हीरक जयंती समारोह को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये संबोधित करते हुए कही। कार्यक्रम के मुख्यह अतिथि माननीय शिक्षा मंत्री श्री ' निशंक ' ने उदघाटन करते हुए शब्दावली आयोग परिवार को हीरक जंयती समारोह के उपलक्ष्यर में बधाई एवं शुभकामनाऍं दीं। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग ने 60 साल की अपनी गौरवपूर्ण यात्रा में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के लिए वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली के निर्माण और विकास में महत्वपूर्ण काम किया है। इस कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए श्री पोखरियाल ने हीरक जयंती समारोह के अवसर पर शब्दावली आयोग परिवार को बधाई दी। उन्होंने कहा कि 6 दशक की अपनी शानदार यात्रा के दौरान विज्ञान ,  इंजीनियरिंग एवं प्रौद्योगिकी ,  कृषि और चिकित्सा विज्ञान सहित विभिन्न विषयों में 9 लाख से अधिक अंग्रेजी शब्दों के लिए वैज्ञानिक और तक

बयानों के आलोक में किसान आंदोलन

इष्ट देव सांकृत्यायन  सरकार को हजारों किसानों की लाशों से गुजरना होगा - ये बयान है राकेश टिकैत का, 26 जनवरी से पहले। सरकार ने गोली क्यों नहीं चलाई - ये सवाल है राकेश टिकैत का, 26 जनवरी की इंतहाई बेहूदगी के बाद। सोचिए, राकेश टिकैत और उनके जैसे लोग क्या कर रहे हैं और किनके साथ खड़े हैं।  वे राजनीति के चूल्हे पर अपनी रोटी सेंकने के लिए उन्हीं लोगों को लाशों में तब्दील करने पर तुले हैं जो किसी भ्रम, किसी मामूली लालच या किसी तरह के बहकावे में उनके साथ आ गए हैं। ये न सोचिए कि किसी के मरने के बाद वे किसी के काम आएंगे। न तो उन्हें किसी किसान से कुछ लेना-देना है और न उसके परिवार से। अगर किसान से उनका मतलब होता तो वे उन बिचौलियों से लड़ते जो किसान की पांच रुपये की उपज उपभोक्ता तक 30-40 रुपये में पहुंचाते हैं और बीच के 25-35 रुपये अपनी जेब के हवाले करते हैं। पैदा करने वाला किसान गरीब का गरीब रह जाता है। कर्ज से दबता चला जाता है। खरीदने वाला उपभोक्ता अलग कर्ज से दबता जाता है। जेब ढीली होने के चलते। बीच का बिचौलिया देखते-देखते अरबपति बन जाता है। राकेश टिकैत और उनके जैसे कई स्वयंभू नेता उन्हीं बिचैलिय
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  समीक्षा इतिहास के आईने में आज़मगढ़                                                                                        - हरिशंकर राढ़ी भूलना इंसान की फितरत है , किंतु पिछले कुछ दशकों से वैश्वीकरण की ऐसी तेज हवा चली कि हम अपनी मिट्टी और अपनी पहचान को ही लगभग पूरी तरह से भूलने लग गए हैं। आधुनिकता की दौड़ में अपने इतिहास को भूल जाना किसी की मजबूरी तो किसी के लिए आधुनिकताबोध होता है। किंतु यह भी सत्य है कि अपने इतिहास से उखड़कर कोई भी समाज गौरव की प्राप्ति नहीं कर सकता। हाल यह है कि वैश्विक इतिहास , भूगोल एवं व्यापार की प्राथमिकता में हम अपने निजी भौगोलिक क्षेत्र के इतिहास को उपेक्षित कर बैठे। आज हम अपने गाँव और जनपद की बात तो क्या करें , अपने प्रदेश का इतिहास पढ़ना उचित नहीं समझते। ऐसे परिवेश में यदि किसी जिले का शोधपूर्ण , वृहद और रोचक इतिहास पढ़ने को मिल जाए तो कहना ही क्या! एक ऐसी ही सुखद अनुभूति से मेरा गुजरना इन दिनों हुआ जब प्रताप गोपेन्द्र यादव द्वारा लिखित पुस्तक ‘ इतिहास के आईने में आज़मगढ़ ’ पढ़ने को मिली। यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि किसी एक जनपदीय इकाई पर इतने आधिकारिक और

बलवाइयों ने किया देश को शर्मसार!

कवि‍लाश मि‍श्र कानून व्‍यवस्‍था के मददेनजर पहले बैरिकेडिंग तोड़ी, डिवाइडर तोड़े, सुरक्षा को देखते हुए सड़कों पर खड़ी की गई बसों के शीशे फोड़े और इन सबके बाद जब पुलि‍स वालों ने रोकने की कोशि‍श की तो पुलि‍स वालों को जान से मारने की कोशि‍श की गई।  ट्रैक्टर से रौंदने की चेष्‍टा की गई। पुलि‍सवाले धैर्य बनाए बलवाइयों को समझा रहे थे तो उन्‍हें डंडों से पीटा जा रहा था। पुलि‍स को दौड़ाया जा रहा था। लालकि‍ला के पास बने नहर में कूद कर पुलि‍सवालों ने जान बचाई।  …और फि‍र आंदोलनारी कि‍सानों ने लालकि‍ला पर फहरा रहे ति‍रंगा को उतार कर एक धर्म वि‍शेष का झंडा फहराया ….। जाहि‍र है, यह तस्वीरें किसानों की नहीं लगती और न ही अकस्‍मात होता दिखा। दिल्ली को अशांत करना ही इनकी मंशा थी। बकायदा,  अपनी पहचान छुपाने के लि‍ए प्रदर्नकारियों ने गमछे से मुंह ढक रखा था। जाहिर है कि ये लोग पहले से ही मन बनाकर आए थे कि ऐसा करना है। दिल्ली पुलिस ने ट्रैक्टर परेड के लिए संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं के साथ छह दौर की वार्ता के बाद तीन रूट तय किए थे। जि‍न कि‍सान नेताओं ने पुलि‍स को भरोसा दि‍या था कि‍ कि‍सान आंदोलन का ट्रैक्‍

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