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पूर्णिमा का चाँद है गुरु

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कृतघ्न मनुष्य के लिए माता-पिता , भाई-बहन , गुरु-शिष्य... या किसी भी संबंध का कोई अर्थ नहीं है. लेकिन यदि कृतज्ञ मनुष्य हो तो उसके लिए पूरा जीवन ही कम पड़ जाए. ऐसे ही संबंधों में एक है गुरु का. ऐसे हमारे जीवन में बहुत गुरु होते हैं और सबके प्रति कृतज्ञता भी होती है. लेकिन कोई-कोई होते हैं जिन्हें हम सद्गुरु कह पाते हैं. जो बहुत भाग्यशाली होते हैं , उनके ही जीवन में सद्गुरु का अविर्भाव होता है. फिर उस सद्गुरु के लिए हर दिन कम पड़ जाता है. पूरा जीवन ही कम लगने लगता है. गुरु को केवल शिक्षक के रूप में देखना और वह भी आज मैकालेवादी व्यवस्था के शिक्षक के रूप में देखना तो उसका भयावह अवमूल्यन है. यह वह व्यवस्था है जिसने हमें ' बलिहारी गुरु आपने ' से लाकर ' गुरुघंटाल ' पर औंधे मुँह गिरा दिया है. तो फिर इसके लिए उस बात का अर्थ भी नहीं है , जो यहाँ कही जा रही है. ठीक है कि अब हम सरकारी तौर पर शिक्षक दिवस मनाते हैं. मुझे इसे भी मना लेने में कोई हर्ज नहीं दिखता. लेकिन हमारे यहाँ गुरु पूर्णिमा है इसके लिए. यह क्यों है... इसका रहस्य ओशो के शब्दों में.   इष्ट देव सांकृत्यायन     प्रश्न...

मुर्दा आचरण के खिलाफ

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इष्ट देव सांकृत्यायन आज वह दिन है जब आचार्य रजनीश ने इस दुनिया से विदा ली थी. आचार्य रजनीश से मेरी कभी मुलाक़ात तो नहीं हुई, रूबरू कभी उनको देखा भी नहीं. जब तक वह थे तब तक उनके प्रति में भी वैसे ही विरोध भाव से भरा हुआ था, जैसे वे बहुत लोग हैं जिन्होंने उनको ढंग से पढा-सूना या जाना नहीं. और यह कोई आश्चर्यजनक या अनहोनी बात नहीं हुई. मैंने उन्हें जाना अचानक और वह भी कबीर के मार्फ़त. हुआ यों कि में अपनी बड़ी बहन के घर गया हुआ था और वहाँ जीजा जी के कलेक्शन में मुझे एक किताब मिली 'हीरा पायो गाँठ गठियायो'. यह कबीर के कुछ पदों की एक व्याख्या थी. सचमुच यह हीरा ही था, जिसे मैंने गाँठ गठिया लिया. कबीर के पदों की जैसी व्याख्या रजनीश ने की थी, वैसी अन्यत्र दुर्लभ है. यहाँ तक कि हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे साहित्य के बडे आलोचकों और व्याख्याकारों से भी नहीं मिल पाई थी. हालांकि तब मैंने उसे अपनी काट-छाँट के साथ पढा था. चूंकि पूरी तरह नास्तिक था, आत्मा-परमात्मा में कोई विश्वास मेरा नहीं था, इसलिए जहाँ कहीं भी वैसी कोई बात आई तो मैंने मन ही मन 'सार-सार को गहि रही, थोथा देई उड़ाय' वाले भाव...

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