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वचन लल्लेश्वरी के

कुस मरि तय कसू मारन। मरि कुस तय मारन कस॥ युस हर-हर त्राविथ गर-गर करे। अद सुय मरि तय मारन तस॥ [कौन मरता है और कौन है जो मारा जाता है बस वही जिसने भुला दिया ईश्वर का नाम और खो गया संसार की विषय-वासनाओं में वही है जो मरता है और वही है जो मारा जाता है॥] शिव चुय थाली थाली रोज़न। मो ज़न हिंदू ता मुसलमान॥ त्रुक अय चुक पन पनुन प्रजनव। सोय चय साहिबस जानिय जन॥ [सर्वत्र व्याप्त हैं शिव , कण-कण में शिव का वास। कभी न करो भेद क्या हिंदू और क्या मुसलमान॥ देखो अपने भीतर , यदि हो तुम चतुर सुजान। मन के मंदिर में ही तेरे है बैठा भगवान॥] मूढस ज्ञानच कथ न वएंजे। खरस गोरे दिना रवि दोह॥ स्येकि शठस बोलि न वएंजे। कोम यज्ञन रावी तील॥ [मूढ़ को कभी न दो भक्ति का ज्ञान वृथा प्रयत्न यह वैसे जैसे गधे को खिलाओ गुड़ यह है वैसे जैसे मरुथल में बो देना बीज ऐसे जैसे व्यर्थ गंवाना तेल चोकर से पूड़ियां बनाने में] चाहे कोई हिंदू हो या मुसलमान , अगर बात-बात में बतौर उदाहरण इन पदों का इस्तेमाल करता न मिले तो समझिए कि वह और चाहे कुछ भी हो , कश्मीरी तो नहीं हो सकता। जानत...

नाम में क्या नहीं रक्खा!

हाल ही में मार्क जुकरबर्ग ने अपनी बहन रैंडी जुकरबर्ग को किसी उपलब्धि पर बधाई दी थी। इसके तुरंत बाद ही रैंडी के नाम का अपने हिसाब से देसी अर्थ निकालकर भाई लोग पिल पड़े। केवल भारत नहीं , पूरा दक्षिण एशिया शामिल था उनमें। खैर , अच्छी बात रही कि उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। शायद वे जानते हैं कि इतिहास जो भी रहा हो , आज का सच यह है कि एशियाई समाज एक यौन कुंठित समाज है। और तो जाने दीजिए , हम भारत के भीतर ही कई बार ऐसा करते हैं। पंजाब के कुछ नाम उत्तर प्रदेश , बिहार या मध्य प्रदेश में कुछ अन्यथा अर्थ देते हैं। ठीक वैसे ही उत्तर प्रदेश , बिहार या मध्य प्रदेश के नाम पंजाब या तमिलनाडु में भी। यह स्थानीय बोलियों और भाषाओं में शब्दों की अर्थ-छवियों के वैविध्य का परिणाम है। जो एक बार पूरा भारत घूम लेता है , वह इससे सहज हो जाता है। एक जगह में सिमटा व्यक्ति ऐसे ही बार-बार हैरत में पड़ता रहता है। इसी क्रम में एक और बात होती है , नामों को धर्म से जोड़कर देखना। ऐसे तो नामों का किसी धार्मिक पंथविशेष से कुछ लेना-देना है नहीं। क्योंकि नाम संज्ञा हैं और संज्ञाएं शब्द हैं। शब्द किसी भाषाविशेष के हो...

ऋषियों-सूफियों की साझी विरासत

दिल्ली को तो मैं शहर मानता ही नहीं। मेरी नजर में यह एक बहुत बड़ा बाजार है और बाजार को घेरे हुए कारखाने हैं। यहाँ अगर बीच-बीच में स्थानीय लोगों के पुराने गाँव और उनकी मूल आबादी न बची होती तो मुझे लगता है कि इंसान दिखाई भी नहीं देते। दोपायों के नाम पर जो होते वो या तो बाजार के व्यापारी और खरीदार होते या फिर कारखानों के पुर्जे। ये सिर्फ इस इलाके के ओरिजनल गाँव हैं जिनके होने से यहाँ ज़िंदगी की धड़कन चल रही है। वरना राजनीति और उनसे जुड़े विद्यापीठों की साजिशें और कारखाने-बाजार की यूज़ एंड थ्रो वाली अपसंस्कृति से पैदा हुई नकारात्मकता दोनों मिलकर कब का यहाँ जिंदगी की साँसें लील गई होतीं। शहर तो मुझे गोरखपुर भी नहीं लगता। अपनी मूल प्रकृति में मेरा पूरा शहर मुझे हमेशा एक बड़ा गाँव लगा। एक ऐसा गाँव जहाँ शहर एक चोर की तरह कभी इस गली तो कभी उस गली से निरंतर घुसपैठ बनाने की कोशिश कर रहा है। पता नहीं क्यों , पर मेरे भीतर एक विश्वास है कि शहर वहाँ अपने असल मकसद में कभी कामयाब नहीं होने वाला। हो सकता है , यह एक अंधविश्वास हो , पर है। ख़ैर , शहर मानना न मानना एक बात है , पर यह भी सच है कि दुनिया के ...

होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह

भाई ख़ुर्शीद अनवर की फेसबुकिया दीवार से बाबा बुल्ले शाह (बुल्ला की जाणां मैं कौण .... तो सुना ही होगा आपने रब्बी शेरगिल का, वही वाले) एक दिलकश कलाम :  होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह नाम नबी की रतन चढी, बूँद पडी इल्लल्लाह रंग-रंगीली उही खिलावे, जो सखी होवे फ़ना-फी-अल्लाह होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह अलस्तु बिरब्बिकुम पीतम बोले, सभ सखियाँ ने घूंघट खोले क़ालू बला ही यूँ कर बोले, ला-इलाहा-इल्लल्लाह होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह नह्नो-अकरब की बंसी बजायी, मन अरफ़ा नफ्सहू की कूक सुनायी फसुम-वजहिल्लाह की धूम मचाई, विच दरबार रसूल-अल्लाह होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह हाथ जोड़ कर पाऊँ पडूँगी आजिज़ होंकर बिनी करुँगी झगडा कर भर झोली लूंगी, नूर मोहम्मद सल्लल्लाह होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह फ़ज अज्कुरनी होरी बताऊँ , वाश्करुली पीया को रिझाऊं ऐसे पिया के मैं बल जाऊं, कैसा पिया सुब्हान-अल्लाह होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह सिबगतुल्लाह की भर पिचकारी, अल्लाहुस-समद पिया मुंह पर मारी नूर नबी डा हक से जारी, नूर मोहम्मद सल्लल्लाह बुला शाह दी धूम मची है, ला-इलाहा-इल्लल्लाह होरी खेलूंगी कह कर...

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