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मेरी चीन यात्रा - 12

यात्रावृत्त शुरू से पढ़ने के लिए कृपया यहाँ देखें:   पहली ,  दूसरी ,  तीसरी ,  चौथी ,  पांचवीं ,   छठी ,  सातवीं ,  आठवीं ,  नौवीं ,  दसवीं   और   ग्यारहवीं   कड़ी   डॉ. अरविंद मिश्र इस समापन अंक में मैं कुछ छिटपुट बातों के साथ वापसी यात्रा की चर्चा करुंगा। सम्मेलन के दूसरे दिन डा. श्रीनरहरि ने अपराह्न को बताया कि एशियन साइंस फिक्शन एसोसिएशन की एक मीटिंग शाम को बुलाई गई है जिसमें उन्हें जाना है। मैं अभी भी इस एसोसिएशन के इक्ज़िक्यूटिव बोर्ड में हूं मगर मुझे कोई सूचना नहीं थी। डा. नरहरि ने कहा कि वी चैट चेक करिए होगी जरूर। देखा मगर नहीं थी। डा. नरहरि होटेल में ही आहूत मीटिंग में त्वरा से निकल गए।   अब बिना बुलाए तो भगवान के पास भी न जाऊं वाला ही विकल्प मेरे सामने था। गया नहीं मगर इसके बारे में वी चैट पर लिख जरुर दिया। एक दो मेम्बर्स ने भी कहा कि उन्हें भी कोई सूचना नहीं दी गई। बहरहाल बिना सभी बोर्ड मेम्बर्स को सूचित किए इस बैठक में क्या गुल खिले मालूम नहीं हो पाया। डा. नरहरि ने तदनंतर बताया क...

मेरी चीन यात्रा – 11

कृपया शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें: पहली , दूसरी , तीसरी , चौथी , पाँचवीं , छठी , सातवीं , आठवीं , नौवीं और दसवीं कड़ी  डॉ. अरविंद मिश्र   मेरे कुछ विज्ञानकथा कीड़ा (सा इं स फिक्शन बुकवर्म) मित्रों को अब तक के संस्मरणों के बजाय सम्मेलन के एजे ंडा की चर्चा की दरकार है। वैसे तो मैंने स ंप न्न विमर्शों की थोड़ी झलक पहले भी दे रखी है कि ंतु विज्ञानकथा प्रेमियों को और चाहि ए - दिल मांगे मोर की तर्ज पर। मैंने पहले भी यह स्पष्ट किया था कि वहां चर्चा परिचर्चा और विमर्श एक ही समय में कई कक्षों में समानांतर चल रहा था जिसे अकेले कवर कर पाना/सुनना संभव नहीं था। हां , कार्यक्रम विवरणिका से हम विषयों पर आपको   एक दृष्टि डालने का अवसर जरुर दे सकते हैं। मुख्य विषय निम्नवत रहे – १-विज्ञानकथा और न ई अर्थव्यवस्था २-एशि या ई विज्ञानकथा का भविष्य ३-वर्ल्डकान आयोजन के विविध पहलू ४-विविधतायुक्त जपानी विज्ञानकथा ५-कोरिआई विज्ञानकथा का भविष्य और वर्तमान ६-विज्ञानकथा और नगरीय नियोजन की संकल्पना एं ७-चीनी विज्ञानकथा का अनुवाद और निर्यात ८-विज्ञानकथा से प्रेम क्यों...

मेरी चीन यात्रा - 10

यात्रावृत्त शुरू से पढ़ने के लिए कृपया देखें : पहली , दूसरी , तीसरी , चौथी , पांचवीं , छठीं , सातवीं , आठवीं एवं नौवीं कड़ी  डॉ. अरविंद मिश्र  मुझे आगाह किया गया था कि चीन में गूगल , वाट्सअप और फेसबुक काम नहीं करते । बस वी चैट अच्छा काम करता है। मैंने चायनीज सिम ले लिया था। वी चैट ऐप पहले से ही मोबाइल में था। उसके द्वारा कुछ चीनी मित्रों से बात की थी तो उन्होंने भी गूगल और अन्य प्रचलित सोशल साइट के चीन में निष्क्रिय होने की बात की थी। हां वीपीएन (वर्चुअल प्राइवेट नंबर) के सहारे सब ऐप उपयोग में लाए जा सकते। वीपीएन के लिए तो हम कोशिश नहीं कर सके। यात्रा पर रवाना हो गए। मगर यह आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हुई कि कभी कभार वाट्सअप और फेसबुक पर संदेशों का आदान प्रदान हो जा रहा था। खास तौर पर जब हमारे विमान की आपात लैंडिंग चोंगक्विंग अ ंत रराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हुई तो हमने ' सा इं स फिक्शन इन इ ंडि या ' के अपने वाट्सअप ग्रुप में भी ' एसओएस ' किया था और मित्रों की शुभकामनाएं प्राप्त की थीं। बल्कि कुछ मित्रों ने आश्चर्य भी व्यक्त किया था और पूछा भी कि चीन से वाट्स...

मेरी चीन यात्रा - 8

यह यात्रावृत्त शुरू से पढ़ने के लिए कृपया चटका लगाएं: पहली , दूसरी , तीसरी , चौथी , पांचवीं , छठी एवं सातवीं कड़ी  डॉ. अरविंद मिश्र   एक घंटे के उद्घाटन समारोह के पश्चात मुख्य हाल में ही कई विषयों पर विचारोत्तेजक विमर्श था। बीच में लंच भी था। चायनीज अपने दैनिक कार्यकलापों में नाश्ता लंच डिनर जल्दी करते हैं। साढ़े छह बजे नाश्ता , 12 बजे लंच और शाम को जल्दी ही छह बजे से डिनर शु रू । हमें कूपन भी इसी तरह मिले थे। एक बड़े से आयोजन परिसर में मुख्य कार्यक्रम हाल , प्रदर्शनी हाल , समाना ंत र सत्रों के कक्ष और भोजन का हाल भी था जो लगभग दस मिनट की चहलकदमी पर था। पूरे परिसर में कई खानपान और स्मृति चिह्नों की सजी - धजी दुकाने ं भी थीं जिससे खूब चहल - पहल रहती थी। आयोजकों की ओर से प्रतिभागी स्वतंत्र थे , चाहे वे चर्चा परिचर्चा या विमर्श से ज्ञानार्जन करें या घूमे फिरें। मेरा , डॉ . नरहरि और डॉ . सामी का किसी पैनेल में नाम नहीं था और कहीं बोलने का भी अवसर नहीं घोषित था । इसलि ए हम भी बिल्कुल मुक्त महसूस कर रहे थे कि ंतु यह तनिक क्षोभजनक तो था ही कि क्या हमें केवल मूक द...

मेरी चीन यात्रा - 4

कृपया यात्रा वृत्तांत को शुरू से पढ़ने के लिए क्लिक करें : पहली , दूसरी और तीसरी किस्त.  डॉ. अरविंद मिश्र  हमारे दैनिक क्रियाकलाप की जैवीय घड़ी जन्मभूमि से जुड़ी होती है। मैं रात में जल्दी सो जाता हूं और जल्दी उठता हूं। अब ज्यादातर विदेशी हवाई यात्रा एं रात में होती हैं। यानि जब हम रात मे आरामदायक शैय्या शयन कर रहे होते हैं तो एक विदेशयात्री वायुयान की असहज सीट पर ऊंघता होता है। अब यही हमारी स्थिति थी। आंखे भले झपक जा रहीं थी पर नींद गायब थी। सारे विमान में भी लोगों की यही स्थिति थी। सभी ऊंघ रहे थे। मैंने चीन के समय के अनुसार सेट की गई अपनी घड़ी देखी। सुबह के साढ़े तीन बज रहे थे यानि अपने देश में रात्रि के एक बजे। मन अशांत सा था। दरअसल मनुष्य के लिए अपनों से अलगाव , अकेलापन तथा विस्थापन एक त्रासद मनःस्थिति होती है। नए स्थान , नए लोगों को लेकर तरह तरह की आशंकाएं और एक तरह की असहायता सी मन में उभरती है। और मुझे अकेलेपन की भी अनुभूति हो रही थी। बगल के दोनों यात्री चीनी थे। उनसे बोलना बतियाना तो दूर हम एक दूसरे के चेहरे के भावों को भी समझ नहीं पा रहे थे। हां , इस अ...

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