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Beyond popular outrage

मैं मानता हूं कि टीम अन्ना ने भ्रष्टाचार रोकने के लिए एक सार्थक शुरुआत की है. मैं अन्ना के मुद्दे और आंदोलन दोनों के पक्ष में रहा हूं और आगे भी रहूंगा. मेरे कुछ मित्र इस विषय पर ज़रा हटकर सोचते हैं. एक आदर्श लोकतंत्र की यह शर्त है कि वहां जितना महत्व समर्थन के लिए है, विरोध के प्रति उतना ही सम्मान होना चाहिए. हमारे विरुद्ध सोचने वालों के भी अपने तर्क हैं और अपनी चिंताएं हैं. वरिष्ठ पत्रकार विशाल दुग्गल इस मुद्दे और आंदोलन के विरुद्ध तो नहीं हैं, लेकिन अलग ढंग से सोचते हैं. अब जब इस पर हल्ले का माहौल बीत चुका है, मेरा मानना है कि अगर हम वाक़ई भ्रष्टाचार मिटाना चाहते हैं तो इन मुद्दों पर भी सोचा जाना चाहिए. श्री दुग्गल का पूरा लेख आपके विचार के लिए: इष्ट देव सांकृत्यायन Corruption today has seeped into the vitals of India’s body politic, acquiring frighteningly menacing proportions to the extent that any fresh disclosure of a scam has ceased to shock the people any more. What has accentuated the citizens’ growing disenchantment with the system is the connivance o...

Samarthan ka Sailaab

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समर्थन का सैलाब                     -हरिशंकर राढ़ी अनुमान था कि होगा ऐसा ही।  देशवासियों को एक इंजन मिल गया है और वे अब किसी भी ब्रेक से रुकने वाले नहीं। आज तो जैसे दिल्ली के सारे रास्ते रामलीला मैदान की ओर जाने के लिए ही हों , जैसे दिल्ली मेट्रो केवल अन्ना समर्थकों के लिए ही चल रही हो और हर व्यक्ति के पास जैसे एक ही काम हो- रामलीला मैदान पहुँचना और अन्ना के बहाने अपनी खुद की लड़ाई को लड़ना । साकेत मेट्रो स्टेशन  पर जो ट्रेन बिलकुल खाली आई थी वह एम्स जाते-जाते भर गई और सिर्फ भ्रष्टाचार  विरोधी बैनरों और नारों से। नई दिल्ली स्टेशन से बाहर निकलता हुआ हुजूम आज परसों की तुलना में कई गुना बड़ा था। सामान्य प्रवेश द्वार पर ही हजारों  की भीड़ केवल प्रवेश की प्रतीक्षा में पंक्तिबद्ध थी। किसी भी चेहरे पर कोई शिकन  नहीं, कोई शिकायत  नहीं। ऐसा शांतिपूर्ण प्रदर्शन  मैंने तो अब तक नहीं देखा था। सच तो यह है कि प्रदर्शनों  से अपना कुछ विशेष  लेना -देना नहीं। राजनैतिक पार्टियों का प्रदर्शन...

Azadi ki doosari ladaaie

आज़ादी की दूसरी लड़ाई    ---हरिशंकर राढ़ी नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलते ही एक आदमी ने पूछा-‘‘ भाई साहब, ये रामलीला मैदान किधर है ?’’ मन में कुछ प्रसन्नता सी हुई और उसे रास्ता बताया- ‘‘ बस इधर सामने से निकल जाइए, ये रहा रामलीला मैदान! वैसे आज तो सभी रास्ते रामलीला मैदान ही जा रहे हैं। किसी भी हुजूम को पकड़ लीजिए, रामलीला मैदान पहुँच जाएंगे। इतने दिनों बाद पहली बार तो असली रामलीला हो रही है वहाँ ! वरना रावणलीला से किसे फुरसत मिलती है यहाँ ? वैसे मैं भी वहीं चल रहा हूँ, अगर डर न लग रहा हो तो मेरे साथ चले चलिए। ’’श्रीमान जी मुस्कराए- ‘‘ डर से बचने के लिए ही तो यहाँ आया हूँ। अगर आज भी हम डर गए तो डर से फिर कभी बच नहीं पाएंगे। जहाँ देश  इतने संकट से गुजर रहा हो, वहाँ भी डरने के लिए  बचता क्या है? और डर तो नहीं रहा है एक सत्तर पार का बुजुर्ग जिसका अपना कोई रक्तसंबन्धी ही नहीं है, जो पूरे देश को अपना संबन्धी समझ बैठा है तो मैं क्यों डरूँ?’’ गेट से बाहर निकलकर कमला मार्किट वाली सड़क पर पहुँचा तो जुलूस ही जुलूस । मै भी एक अनजाने जुलूस का हिस्सा बन ग...

जनतवा का जिउ सांसत में है!

अ से अन्ना हज़ारे क से काला धन ग से गंगा द से दिग्गी राजा न से निगमानंद ब से बयानबाजी भ से भ्रष्टाचार र से रामदेव भौत रट लिए यार ये सब. इन सबके बीच में ख से खाना भ से भूख म से महंगाई ब से बढ़ते ब्याज दर ई सब भी होते हैं. कौनो नामे नईं ले रहा है इनका................ बताओ न, का किया जाए??????????????????????????????????????????????????????????????????????? ??????????????????????????????????????????????????????

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