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विद्रूप स्थिति और आंतरिक खोखलापन

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भूपेंद्र सिंह   बंद गली का आखिरी मकान अभी अभी पढ़ डाली। प्रिय शिव कुमार जी बहुत डूबकर उसका जिक्र करते हैं , सो खोज कर पढ़ना ही था। शानदार अंतर्संघर्ष और संबंधों के उलझे ताने-बाने , समाज की विद्रूपता भरी स्थिति और मूल्यों का आंतरिक खोखलापन। भारती जी का रचनाकार अपनी पूरी ताकत से उभरता है घटनाओं के बीच से। लगता है पलंग पर कोई और नहीं मुंशी जी के रूप में स्वयं भारती जी ही लेटे हों।  मछली रेत की पढ़ी कांता भारती की कल ही। शिव ही दिल्ली से लाए खास तौर पर मेरे लिए और तमाम कीमती किताबों के साथ। उस घटनाक्रम से इस कहानी का खूबसूरत तालमेल बैठा है। वही तनाव , दोहराव वाला जीवन जीने से पैदा , वही सामाजिक दबाव , वही कूट रचनाएं , गो कि निजी जीवन में भारती और पुष्पा जी खुद रहीं तनावकारक की भूमिका में। यहां समाज , मामा और बिटानू। निम्न वर्ग की सीमितताओं से जूझता आदमी कितना टूटता है , कितना छीजता है। पल पल यह मुंशी जी का चरित्र साफ दिखाता है। राधे के लिए उमड़ती ममता और स्नेह का ज्वार उसे सब कुछ दे डालना चाहता है पर प्यार हरिया से भी कम नहीं। जो समाज नन्हे बच्चों की परवरिश न कर पाया वह नौकरी मिलते ह...

छोटा कितना दर्जा, बड़ा कितना दुख

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मधुकर उपाध्याय ...औरतों के खिलाफ जुल्म का मसला कितना बड़ा है, मैं यह महसूस करके भौचक्की रह जाती हूं। हर उस औरत के मुकाबले, जो जुल्म के खिलाफ लड़ती है और बच निकलती है, कितनी औरतें रेत में दफन हो जाती हैं, बिना किसी कद्र और कीमत के, यहां तक कि कब्र के बिना भी। तकलीफ की इस दुनिया में मेरा दुख कितना छोटा है।... पाकिस्तान की मुख्तारन माई का ये दुख दरअसल उतना छोटा नहीं है। बहुत बड़ा है। इसकी कई मिसालें इस्लामी देशों में फैली हुई मिलती हैं। एशिया से अफ्रीका तक। ऐसा शायद पहली बार हुआ है, जब इस्लामी देशों की औरतों की बात किताबों की शक्ल में लिख कर कही गई है। इनमें से कई किताबें औरतों की लिखी हुई हैं। मुख्तारन माई की किताब ...इन द नेम ऑफ ऑनर... तकरीबन दो साल पहले आई थी। उसी के साथ सोमालिया की एक लड़की अयान हिरसी अली की किताब आई ...इनफिडेल... और उसके बाद खालिद हुसैनी की किताब ... थाउजेन्ड स्प्लैंडिड सन्स...। इस बीच दो किताबें और आईं। जॉर्डन की एक महिला नोरमा खोरी ने ...फोरबिडन लव... और इरान की अज़र नफ़ीसी ने ...रीडिंग लोलिता इन तेहरान... लिखी। एक और किताब नार्वे की आस्ने सेयरेस्ताद की थी, ...द ...

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