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Showing posts with the label व्यंग्य

राहु के दो मूल

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भौतिक दृष्टि से देखें तो अव्वल तो राहु हैं ही नहीं। वह जो हैं , वो एक बिंदु हैं। केवल फलित ज्योतिष ही उन्हें ग्रह मानता है और वह भी छाया ग्रह। क्योंकि इनके पास ठोस खगोलीय शरीर नहीं है। विज्ञान के अनुसार वह केवल एक बिंदु हैं। खगोल विज्ञान के अनुसार , राहु वह Intersection Point हैं , जहाँ पृथ्वी की कक्षा और चंद्रमा की कक्षा आपस में एक दूसरे को काटती है। ऐसे दो बिंदु हैं। एक उत्तर और दूसरा दक्षिण में। उत्तरी बिंदु को राहु और दक्षिणी बिंदु को केतु कहा जाता है। पौराणिक कथा तो आप जानते ही हैं कि स्वरभानु नामक राक्षस का सिर राहु है और धड़ केतु। फलित ज्योतिष में राहु और केतु दोनों ही की बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। पता नहीं क्या कारण है कि राहु को तो बहुत लोग अपने नाम में रखते हैं , लेकिन केतु को बिरला ही कोई रखता है। मेरे परिचितों में केवल एक हैं , जिन्हें माता-पिता की ओर से तो रणविजय सिंह नाम मिला , लेकिन केतु को उन्होंने स्वयं अपने नाम में जोड़ लिया - सत्यकेतु – तखल्लुस के रूप में। यह तखल्लुस उन्होंने क्या सोचकर जोड़ा , ये मैंने कभी पूछा नहीं। बहरहाल , आज हम राहु-केतु का ज्योतिषीय नहीं , बल्...

माननीय गिरगिट जी

  इष्ट देव सांकृत्यायन   माननीय कोई परिचय के मोहताज तो हैं नहीं! भला इन्हें कौन नहीं जानता! आज सुबह ही मिल गए। मॉर्निंग वॉक के दौरान। मैंने नमस्ते किया तो बड़े गर्व से मुंडी नीचे-ऊपर और दाएँ-बाएँ घुमाते हुए बोले - आजकल हर काम पंडीजी से पूछके कर रहा हूँ। मैंने कहा - अच्छा। क्या हुआ , मौलाना साहब से सब ठीक तो है ? माननीय बोले - हाँ हाँ , बिलकुल ठीक है। असल में मैं पंडीजी का कहा करने के बाद फिर मौलाना साहब से भी पूछ लेता हूँ। मैंने कहा - अच्छा। इससे कोई नाराज़ तो नहीं होता ? माननीय बोले - नहीं , नाराज क्यों होंगे ? असल में पंडीजी जो बताए होते हैं , मौलाना साहब उसका उल्टा बता देते हैं। मैंने कहा - फिर ? माननीय बोले - फिर मैं वो भी कर देता हूँ। मैंने कहा - फिर ठीक है। माननीय बोले - हाँ , आप तो जानते ही हैं। मैंने कहा - जी जी। अच्छा चलते हैं। नमस्ते। माननीय बोले - नमस्ते नमस्ते , लेकिन एक बात याद रखिएगा। मैंने हाथ जोड़कर कहा - जी , हुकुम करें। माननीय भी हाथ जोड़कर बोले - अरे , आप भी क्या मज़ाक करते हैं। हुकुम कहाँ , मैं तो बस गुजारिश कर सकता हूँ। मैंने थ...

डिजिटल इंडिया पर लालित्य ललित की पैनी नज़र: प्रो.राजेश कुमार

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नई दिल्ली। नई दिल्ली स्थित प्रेस क्लब में डॉ लालित्य ललित के ताज़ा व्यंग्य संग्रह डिजिटल इंडिया का लोकार्पण बुधवार को किया गया। यह व्यंग्य संग्रह गीतिका प्रकाशन की सुश्री गीता पंडित ने किया। इस अवसर पर व्यंग्य समालोचक व केंद्रीय हिंदी संस्थान के न्यासी सदस्य प्रो राजेश कुमार ने कहा- आज हमारी सारी दुनिया डिजिटल हो चुकी है. आज हम चाहे किसी से बात करने की सोचें , चाहे हम किसी खरीदारी करने की सोच है या हम किसी से कोई व्यवहार करने की बात सोचें या हम कोई व्यापार करने की बात सोचें या हम कोई आंदोलन करने की बात सोचें , हर जगह है डिजिटल दुनिया हावी है. डिजिटल दुनिया के माध्यम से हम गरीबों के लिए आंदोलन करते हैं , नेताओं के लिए समर्थन जताते हैं और और इसके साथ ही हम अपने दैनिक जीवन की रोजमर्रा की चीजें भी डिजिटल दुनिया के माध्यम से ही करते हैं. ऐसे में लेखक कैसे इस दुनिया से अलग हो सकता है. लालित्य ललित ने इस महत्वपूर्ण विषय पर अनेक कोणों से विचार किया है. चाहे वह मीडिया की दुनिया हो , चाहे वह सामाजिक मीडिया की दुनिया को , चाहे वह सामान्य रूप से हमें प्रभावित करने वाले डिजिटल दुनिया हो , उनकी कलम उ...

कानून किसके साथ?

इष्ट देव सांकृत्यायन कश्मीर में ये अनपढ़ और बेरोजगार युवा थे. गरीबी और बदहाली से तंग. दिल्ली में ये विश्वविद्यालय के छात्र निकले. लखनऊ में ये गरीब बेसहारा मजदूर हो गए. और कानून तो हुजूर वह तो कुछ लोगों की उस टाइप वाली रखेल है जिसका कोई हक नहीं और जिसे वे जैसे चाहें प्रताड़ित कर सकते हैं. निर्भया के बाद भी अगर किसी को कोई शक बचा हो तो उसका कोई इलाज नहीं है. केवल इसी देश में न्याय आतंकवादियों के बचाव में सेना का रास्ता रोकने और उस पर हमला करने वाले नागरिकों पर गोलियां चलाने से रोक सकता है. जनता की गाढ़ी कमाई से बनी सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुँचाने वालों को वसूली की नोटिस भेजे जाने पर स्टे दे सकता है. इस पृथ्वी नामक ग्रह के किसी और कोने के इतिहास में अगर ऐसा कुछ हुआ दिखा हो तो जरा बताइएगा. अब सवाल यह है कि विश्वविद्यालय स्तर पर पहुंचकर अगर यही पत्थरबाजी ही पढ़ाई जानी है तो बेहतर होगा कि इसकी पढ़ाई सभी बोर्डों में प्राइमरी स्तर से ही करा दी जाए. वरना इस समाज का क्या होगा ? क्या एक बड़ा तबका सिर्फ़ अपराधों का भुक्तभोगी बनने के लिए होगा ? और दूसरा बड़ा तबका सिर्फ ...

स्वतंत्र भारत : एक टाइमलाइन

इष्ट देव सांकृत्यायन    Ø   बच्चों के लिए कुछ बिंदु ·          बिंदुओं के बीच-बीच में टिप्पणियां अर्धशतकीय  युवाओं द्वारा युवाओं के लिए युवाओं की हैं.  v   अगस्त 14, 1947 धार्मिक आधार पर भारत का विभाजन. v   मार्च 1971 पांचवीं लोकसभा का गठन... गरीबी हटाओ का नारा भी श्रीमती इंदिरा गांधी ने इसी चुनाव में दिया था. आप देख ही रहे थे , उसके बाद देश में गरीबी कहीं बची थी. वो तो उस ‘ गरीबी हटाओ ’ की लोकप्रियता से घबरा कर दुबारा से थोड़ी-बहुत गरीबी तलाशने के लिए मोदी जी को नोटबंदी करनी पड़ी और तबसे देश में चारों तरफ गरीबी फैली दिखने लगी. ख़ैर , इसी परम लोकप्रिय और महान नारे को लेकर सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने एक नाटक लिखा था – अब गरीबी हटाओ. [ विधि के अनुसार यह लोकसभा चलती तो इसका अधिकतम कार्यकाल होता फरवरी 1976 तक] लेकिन इसके पहले ही v   जून 12, 1975 इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने चुनावी भ्रष्टाचार के आधार पर श्रीमती इंदिरा गांधी के निर्वाचन को ही अवैध ठहरा दिया.   [...

ओपिनियन पोल

- काका , ए काका!   - हाँ बोल बेटा!   - ई ओपिनियन पोल का होता है काका ? - ओपिनियन पोल बस इस समझ ले बेटा कि जैसै गाँव एक-दुइ ठो टोनहा नइंं होत हैं... - हाँ हाँ काका , बूझि रहे हैं... - बूझि रह्यो ह्यो न ?  - हाँ बूझि रहे हैं..   - हाँ त बस ई समझि ल्यो कि जैसै ऊ टोनहा होत हैं... दिन भर बरबर बरबर करत रहत हैं.. मने न करै क कौनो मल्लब... न कुछ जानै के न कुछ बूझै के... बस ऐसै आपन हाँके जात हैं.. जैसै सबसे बड़ा बिदमान इहै हैं..   - मल्लब बुझाया नै काका... तनि और फरियाऔ ...   - का फरियाएं.. अब हम का फरियाएं हो...   - मल्लब ई बताओ कि एक ठू पिरी पोल होत है..   - हाँ होत है.   - ऊ का होत है ?  - ऊ बस ई समझौ कि फिरी पोल होत है. फिरी पोल मल्लब ई कि तब होत है जब चुनाव कि बस सुगबुगाहट हो. मन्ने जे कि कुच्छ नईं.. मने कि जैसै बस हवा में लट्ठ भांज रह्ये ह्यों... न सूत न कपास जुलाहों में लठमलठ... त जिसका जिसकौ मन करता है ऊ उसी को हरानै लगता है... और जिसको मन किया जितान लगा... अब ई समझ ल्यो कि टोनहा को जिधर से चाय पकौड़ी , पान बीड़...

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