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Jeet - Haar

गीत   - हरिशंकर राढ़ी  किसको समझें जीत आपनी किसको समझें  हार। मधुर यामिनी का सुख बेटा पहले ही पाए फिर सुहाग की सेज देख वे उल्टे सो जाएं । बंधन तो शरीर  का अच्छा मन का बँधना क्या जीवन तो परंपरा विरोधी इससे सधना  क्या ? हाट बिके अब सबसे सस्ता मान - प्रतिष्ठा  - प्यार । बहुत ख़ुशी  की बात  पिताजी चले गए परलोक अम्मा मान गईं वृद्धाश्रम अब काहें का शोक  ! कितनी सुखी जिंदगी होगी जब एकल परिवार ना कोई रिश्ते का  झंझट ना कोई दरकार । बस अपनी बीवी और बच्चे क्या सुंदर संसार ! गाँव  गए उम्मीद लगाकर होंगे सब ‘अपने’ राजनीति से अर्थनीति ने         बदल दिए सपने         भीषम बाबा की टिक्ठी को         उठा रहे मजदूर         बेटे बैठे अमरीका में        ‘बेबस’ औ’ ‘मजबूर’। कैसे गाएँ- "डोली लेकर आए पिया - कहाँर " ।

ek geet

कारवाँ क्या करूँ (जीवन के तमाम चमकीले रंगों के बीच श्वेत - श्याम  रंग का अपना अलग महत्त्व होता है।  बाहर से रंगहीन दिखने वाली सूरज की किरणों में इन्द्र धनुष  के सातो रंग समाए होते हैं । श्वेत - श्याम  रंग में बना ये क्लॉसिकल चित्र आप भी देखें और सोचें- )  अंजुमन स्याह सा, हर चमन आह सा दर्द की राह सा मैं रहा क्या करूँ ? दौड़ते - दौड़ते, देखते - देखते मंजिलें लुट गईं ,कारवाँ क्या करूँ ?  जिन्दगी -जिन्दगी तू बता क्या करूँ ? अपनी अर्थी गुजरते रहा देखते और मैंने ही पहले चढ़ाया सुमन खुद चिता पर लिटाकर उदासे नयन रुक गए पाँव लेकर चला जब अगन पुष्प  क्या हो गए , हाय कैसा नमन - नागफनियों के नीचे दबा था कफन ! अलविदा कर लिया हर ख़ुशी  का सजन रो पड़ीं लकड़ियाँ आंसुओं में सघन और चिता बुझ गई, कैसे होगा दहन ? देखकर वेदना यह सिसकती चिता मरमराने लगी प्रस्फुटित ये वचन - तुम कहाँ योग्य मेरे प्रणय देवता लौट जाओ नहीं मैं करूँगी वरण,           हम खड़े के खड़े , मूर्तिवत हो जड़े       दर्द को भ...

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