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भक्ति और प्रकृति का अनूठा संगम: भीमाशंकर

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हरिशंकर राढ़ी भीमाशंकर मंदिर का एक विहंगम दृश्य                             छाया : हरिशंकर राढ़ी  भीमाशंकर की पहाड़ियाँ और वन क्षेत्र शुरू होते ही किसी संुदर प्राकृतिक और आध्यात्मिक तिलिस्म का आभास होने लग जाता है। सहयाद्रि पर्वतमाला में स्थित भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग कई मामलों में अन्य ज्योर्तिलिंगों से अलग है, और उसमें सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि यह आरक्षित वन क्षेत्र में स्थित है, जिसके कारण इसका अंधाधुंध शहरीकरण नहीं हो पाया है। यह आज भी पर्यटकीय ‘सुविधओं’ के प्रकोप से बचा विचित्र सा आनंद देता है। वैसे सर्पीली पर्वतीय सड़कों पर वाहन की चढ़ाई शुरू होते ही ऐसा अनुमान होता है कि हम किसी हिल स्टेशन की ओर जा रहे हैं और कुछ ऐसे ही आनंद की कल्पना करने लगते हैं। किंतु वहां जाकर यदि कुछ मिलता है तो केवल और केवल भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग तथा साथ में समृद्धि प्रकृति का साक्षात्कार। पुणे से लगभग सवा सौ किलोमीटर की कुल दूरी में पर्वतीय क्षेत्र का हिस्सा बहुत अधिक नहीं है, किंतु जितना भी है, अपने आप में बहुत ही रोमांचक और मनो...

अजंता: जहां पत्थरों में अध्यात्म है

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-हरिशंकर राढ़ी बस में अजंता की ओर  :  छाया - हरिशंकर राढ़ी  एलोरा तो देख आए किंतु अजंता का आकर्षण  एलोरा से भी बड़ा था। कारण जो भी रहा हो, चाहे वह अजंता - एलोरा के युग्म में पहले आता है, इसलिए या फिर अब तक की पढ़ाई लिखाई और इंटरनेट से एकत्र की गई जानकारी के कारण। जलगांव में रात अच्छी गुजरी थी और नींद तो खूब आई ही थी। सुबह की चाय के बाद नाश्ता  और दो बार चाय लेने के बाद मन में उत्साह थोड़ा और बढ़ गया। लगभग दस बजे हम जलगांव से अजंता की गुफाओं के लिए कूच कर गए। बैग - सैग गाड़ी में ही जमा लिया क्योंकि वापसी हमें भुसावल से करनी थी। जलगांव से अजंता गुफाओं की दूरी 62 किलोमीटर है और भारतीय राजमार्ग की परंपरा के अनुसार तेज चलने पर भी लगभग डेढ़ घंटा लग ही जाता है। हम लोग तो वैसे भी तसल्ली से चलने रास्ते का आनंद लेने वाले पथिक हैं, सो डेढ़ घंटे से कुछ                                                           ...

एलोरा: जहां पत्थर बोलते हैं

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-हरिशंकर राढ़ी  गुफा पर नक्काशी                             छाया : हरिशंकर राढ़ी  घृष्णेश्वर  के बाद हमारे आकर्षण  का केंद्र एलोरा की गुफाएं थीं। अजंता - एलोरा की गुफाएं एक तिलिस्म के रूप में मन में किशोरावस्था से ही स्थापित थीं। उनके  विषय  में छठी से आठवीं कक्षा के दौरान हिंदी की पाठ्यपुस्तक में पढ़ा था। तब पाठ्यक्रम में बड़ी उपयोगी बातें शामिल  की जाती थीं और पाठ्यक्रम का संशोधन  कम होता था। भारत और दुनिया के तमाम पर्यटन एवं धर्मस्थलों की जानकारी दी गई होती। बच्चे इसमें रुचि दिखाते थे। शायद  अतिबुद्धिजीवी लोगों की पैठ पाठ्यक्रम में नहीं रही होगी और मनोविज्ञान तथा आधुनिकता के नाम पर उबासी लाने वाली विषयवस्तु कम से कम छात्रों को ढरकी (बांस की एक छोटी नलकी जिससे पशुओं को बलपूर्वक दवा पिलाई जाती है, पूर्वी उत्तर प्रदेश  में इसे ढरकी कहा जाता है।) के रूप में नहीं दी जाती थी। कंबोडिया के अंकोरवाट तक के  मंदिरों का यात्रावृत...

To Ghrishneshwar

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                                                    घृष्णेश्वर  की ओर:                                                                    -हरिशंकर राढ़ी  हमारा अगला गंतव्य घृष्णेश्वर  ज्योतिर्लिंग और अजंता एलोरा की गुफाएँ थीं। घृष्णेश्वर  ज्योतिर्लिंग और एलोरा की गुफाएं महाराष्ट्र  के औरंगाबाद जिले में हैं और दोनों ही एक दूसरे के बहुत पास पास हैं। हमारे कार्यक्रम में पहले घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग का  दर्शन  था और उसके बाद एलोरा। शिरडी  से वहां जाने के लिए औरंगाबाद की बस पकड़नी थी। यद्यपि हम लोग एक जीप भर की सवारी थे किंतु अनजान सी जगह पर जाते समय प्रायः मैं सरकारी बसों को तरजीह देता हूं। शि...

शिरडी की ओर

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हरिशंकर राढ़ी  पंचवटी की परिक्रमा कर चुकने के बाद हमारा अगला पड़ाव साईं का शिरडी धाम था। पर्णकुटी से वापसी करते समय मेरा मन उस काल की ओर भाग रहा था जिसे अभी इतिहासकारों द्वारा निश्चित नहीं किया जा सका है। इतिहासकार वैसे भी उन्हें कहां मानने को तैयार बैठे हैं ? उनके अस्तित्व को न मानने से शायद उन्हें  आधुनिक एवं वैज्ञानिक सोच का तमगा बैठे - बिठाए मिल जाए ! चलिए मत मानिए उनके अस्तित्व को, उनके आदर्शों  को तो मान लीजिए। एक ऐसे युग में पैदा हुए थे राम जब भारत एक विस्तारित देश  था, भले ही अलग-अलग राजाओं के अधीन रहा हो। पूरे देश  की एक संस्कृति थी, एक भाषा थी और सामान्यतः चहुँओर शांति  थी। कुछ विशिष्ट लोगों के लिए विशिष्ट  विज्ञान था, विकसित विज्ञान था। यह बात सच है कि यह विज्ञान सबके लिए नहीं था। आवागमन के साधन नहीं थे, संचार साधन नहीं थे और समाज सुविधाभोगी नहीं थे। अपने राज्य से हजारों मील दूर भयंकर दंडक वन में राम ने अपनी कुटिया बनाई और जंगल को अपनी तपस्या से बसने योग्य बनाया। भयंकर राक्षसों के बीच रहकर उनकी चुनौ...

Triambkeshwar Darshan

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 यात्रा वृत्तांत                                                          त्र्यंबकं गौतमीतटे                                                                         - - हरिशंकर  राढ़ी मृत्युभय से मुक्ति प्रदान करने वाले महामृत्युंजय  मंत्र के आदि शब्द  --ऊँ त्र्यंबकं यजामहे ...... निश्चित  रूप से भगवान त्रयंबकेश्वर  के महत्त्व को रेखांकित करते हैं। भगवान शिव  के द्वादश  ज्योतिर्लिंगों  में त्रयंबकेश्वर  की विशिष्ट महिमा  है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार त्रयंबकेश्वर  जैसा पवित्र स्थल, गोदावरी जैसी पवित्र नदी और ब्रह्मगिरि जैसा पवित्र पर्...

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