बिना लाइन की पटरी
धड़ड़...धड़ड़..धड़ड़ धड़ड़...धड़ड़..धड़ड़ ...धड़ड़..धड़ड़ पटरियों पर लोकर ट्रेन दोनों तरफ से सांप की तरह बल खाती हुई निकल रही थी। सोम, रोहन और नाथू गुमटी के पास उतर कर पटरियों के किनारे-किनारे एक ओर अंधेरे में बढ़ रहे थे। रेल्वे की बांड्री के दूसरी तरफ खड़ा एक सात मंजिला बिल्डिंग की खिड़कियों से निकलने वाली रोशनी अंधरे को धीरे-धीरे चाट रहा था। बांड्री के इस ओर कतारबद्ध तरीके से इंटों के छोटी-छोटी कोठरियां बनी हुई थी, जिनमें खिड़कियां नहीं थी। पटरियां बैठाने वाले मजदूरों के परिवार इन्हीं कोठरियों में टिके हुये हुये थे। अंधेरे में आगे बढ़ते हुये सोम का पैर एक बड़े से पत्थर से टकराया और इसके साथ ही उसके हाथ में पड़े पोलीथीन के बैग से आपस में बोतलों के खनखनाने की आवाज अंधेरे में तेजी से फैल कर गुम हो गई। अबे देख के....केएलपीडी करेगा क्या..., अंधेरे में संभलते हुये सोम की ओर घूरते हुये नाथू गुर्राया। चिंता मत कर....मेरे नाक मुंह टूट जाये, लेकिन ये बोतल नहीं टूटेंगे...पोलीथीन के बैग में हाथ डालकर बोतलों को टटोलते हुये सोम ने तसल्ली दी। कुछ चखना ले लेना चाहिये था....आगे बढ़ते हुये नाथू ...