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आप क्या तय कर रहे हैं?

बिहार चुनाव के नतीजों ने पूरी भारतीय राजनीति को झकझोर दिया है. जाति-धर्म-क्षेत्र जैसे झूठे मुद्दों पर बन्दर की तरह नाचने वाले देसी मतदाताओं ने इन छलावों को मेटहे में बन्द कर लोकतंत्र की बहती नदी की तीव्र धारा के हवाले कर दिया है. बबुआ का जादू भी नहीं चला. स्विस बैंक के खुलासे सामने हैं और आम भारतीय उनमें रुचि ले रहा है. ग़ौर करने की ज़रूरत है, यह लगभग वैसा ही दौर है, जैसा राजीव गान्धी के दौर में हुआ था. आम आदमी का ध्यान पहली बार ख़ास लोगों के काले कारनामों की ओर गया था और जिसने झूठमूठ मुद्दा बना कर जनता को बहकाया था उसी ने मदारी के झोले से मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों का ख़तरनाक सांप निकाल दिया था. कांग्रेस को छात्र नेताओं के जरिये अपनी राजनीति चमकाने का मौक़ा मिल गया और उसने तुरंत पिछले दरवाज़े से छात्र नेताओं को हवा देकर आत्मदाहों का दौर चलवा दिया. पूरे देश में लगभग ख़त्म हो चुका जातिवाद नए सिरे से स्थापित हो गया. यह न तो अकेले कांग्रेस की चाल थी, न वीपी सिंह की और न भाजपा की. वस्तुतः यह इन सबकी मिली-जुली चाल थी. इस बात पर व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में सोचने की ज़रूरत है. हम फिर एक कठिन दौर...

डर के बिना कुछ न करेंगे जी...!

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  इलाहाबाद में आजकल पब्लिक स्कूलों में बढ़ी हुई फीस के ख़िलाफ अभिभावक सड़कों पर उतर आए हैं। वकील, पत्रकार, व्यापारी, सरकारी कर्मचारी आदि सभी इस भारी फीस वृद्धि से उत्तेजित हैं। रोषपूर्ण प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं। इसे लेकर कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने लगी तो जिलाधिकारी को स्कूल प्रबन्धकों के साथ समझौता वार्ता करनी पड़ी है। नतीजा चाहे जो रहे लेकिन इस प्रकरण ने मन में कुछ मौलिक सवाल फिर से उठा दिए हैं। भारतीय संविधान में ८६वें संशोधन(२००२) द्वारा प्राथमिक शिक्षा को अब मौलिक अधिकारों में सम्मिलित कर लिया गया है। मौलिक अधिकारों से सम्बन्धित अध्याय-३ में जोड़े गये अनुच्छेद २१-क में उल्लिखित है कि- “राज्य ऐसी रीति से जैसा कि विधि बनाकर निर्धारित करे, छः वर्ष की आयु से चौदह वर्ष की आयु तक के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध करेगा।” नागरिकों के लिए निर्धारित मौलिक कर्तव्यों की सूची, अनु.५१-क, में भी यह कर्तव्य जोड़ा गया है कि- “ ५१-क(ट) : छः वर्ष की आयु से १४ वर्ष की आयु के बच्चों के माता पिता और प्रतिपाल्य के संरक्षक, जैसा मामला हो, उन्हें शिक्षा क...

चढत चइत चित लागे न रामा......

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Technorati Tags: indian music , current affairs चढत चइत चित लागे न रामा बाबा के भवनवा...... उपशास्त्रीय संगीत मे अधिक्रित घुसपैठिए के रूप मे प्रतिष्ठित लोकसंगीत की अत्यंत लोकप्रिय विधा के साथ मुश्किल यह है इसे साल मे सिर्फ एक महीने ही गाया-सुना जा सकता है. ऐसा नही कि बाकी समय इसकी धुन बजने से मना कर देती हो, पर इसे ठीक नही समझा जाता. यह वह वक़्त है जब फागुन जाने को तैयार है और चैत बिल्कुल द्स्तक ही दे रहा है. ऐसे समय मे कही चैता की धुन भी भोजपुरिया कान मे पड जाए तो सीधे दिल मे उतरती चली जाती है. ऐसे समय मे होरी और चैता दोनो साथ-साथ सुनने का मौका मिले तो भला कौन छोड्ना चाहेगा. कुछ ऐसा ही आज हुआ. मौका था बनारस घराने की प्रसिद्ध शास्त्रीय गयिका पद्मभूषण गिरिजा देवी के सम्मान का. दिल्ली के इंडिया हैबिटैट सेंटर मे सखा क्रिएशंस की ओर से आज उन्हे द ग्रेट मास्ट्रोज़ एवार्ड भेट किया गया. एवार्ड दिया पंडित बिरजू महराज ने और इसी मौके पर अपना गायन प्रस्तुत किया अप्पा यानी गिरिजा देवी की शिष्या मालिनी अवस्थी ने. 'उडत अबीर गुलाल' शीर्षक इस आयोजन का श्रीगणेश उन्होने किया एक ठुमरी से. "नदिय...

ध्यान का इतिहास है जरूरी

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इष्ट देव सांकृत्यायन तिथि : 19 सितंबर 2007, बुधवार मुकाम : दिल्ली में लोदी रोड स्थित श्री सत्य साईँ सेंटर का ऑडिटोरियम लंबे समय बाद स्वामी वेद भारती का साथ था. दशमेश एजुकेशनल चैरिटेबल ट्रस्ट ने यह आयोजन किया था और इसके कर्णधार थे राय साहब. राय साहब यानी वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय. जब मैं पहुँचा तब तक 'ध्यान का वैश्विक प्रभाव' विषय पर केंद्रित इस व्याख्यान की औपचारिक शुरुआत हो चुकी थी. राय साहब बता रहे थे स्वामी वेद भारती के बारे में. निश्चित रुप से मेरे जैसे लोगों के लिए इसमें कोई रूचिकर बात नहीं थी, जो पहले से ही स्वामी जी के बारे में काफी कुछ जानते थे. लेकिन उन तमाम लोगों के लिए यह दिलचस्प था जो पहले से ज्यादा कुछ नहीं जानते थे. स्वामी जी से मेरा परिचय 'योग इंटरनेशनल' पत्रिका के मार्फ़त हुआ था. अमेरिका से छपने वाली इस पत्रिका में स्वामी जी की योजनाओं के बारे में जानकारी दी गई थी और उनका भारत का पूरा पता भी उसमें था. बाद में दिल्ली से छपने वाली लाइफ पोजिटिव में भी मैंने स्वामी जी पर एक पूरा लेख पढा और फिर मेरे माना में उनका एक इंटरव्यू करने की इच्छा हुई. ऋषिकेश स...

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