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अशआर

शेर किसका है मालूम नही. ऐसे ही गालिब-ओ-मीर पर बाते करते आज ये शेर विनय ने सुनाया. जानते वह भी नही कि किसका है. मुझे अच्छा लगा, लिहाजा  आपके लिए भी - दिल मे रहो जिगर मे रहो नजर मे रहो सब तुम्हारे ही लिए है चाहे जिस घर मे रहो अब ये हाल है दर-दर भटकती फिरती है मुसीबतो से कहा मैने मेरे घर मे रहो. Technorati Tags:

कोर्ट पर हमला क्यों?

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सत्येन्द्र प्रताप वाराणसी में हुए संकटमोचन और रेलवे स्टेशनों पर विस्फोट के बाद जोरदार आंदोलन चला. भारत में दहशतगर्दी के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ था जब गांव-गिराव से आई महिलाओं के एक दल ने आतंकवादियों के खिलाफ फतवा जारी किए जाने की मांग उठा दी थी. बाद में तो विरोध का अनूठा दौर चल पड़ा था। संकटमोचन मंदिर में मुस्लिमों ने हनुमानचालीसा का पाठ किया और जबर्दस्त एकता दिखाई. मुस्लिम उलेमाओं ने एक कदम आगे बढ़कर दहशतगर्दों के खिलाफ़ फतवा जारी कर दिया. इसी क्रम में न्यायालयों में पेश किए जाने वाले संदिग्धों के विरोध का भी दौर चला और वकीलों ने इसकी शुरुआत की। लखनऊ, वाराणसी और फैजाबाद में वकीलों ने अलग-अलग मौकों पर आतंकवादियों की पिटाई की थी।शुरुआत वाराणसी से हुई. अधिवक्ताओं ने पिछले साल सात मार्च को आरोपियों के साथ हाथापाई की और उसकी टोपी छीनकर जला डाली। आरोपी को न्यायालय में पेश करने में पुलिस को खासी मशक्कत करनी पड़ी. फैजाबाद में वकीलों ने अयोध्या में अस्थायी राम मंदिर पर हमले के आरोपियों का मुकदमा लड़ने से इनकार कर दिया। कुछ दिन पहले लखनऊ कचहरी में जैश ए मोहम्मद से संबद्ध आतंकियों की पिटाई क...

...यूं ही कभू लब खोलें हैं

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आने वाली नसलें तुम पे रश्क करेंगी हमअसरों जब उनको ये ध्यान आयेगा तुमने फिराक को देखा था इसे आप चाहें तो नार्सिसिया की इंतहां कह सकते हैं. जैसा मैने लोगों से सुना है अगर उस भरोसा कर सकूं तो मानना होगा वास्तव में फिराक साहब आत्ममुग्धता के बहुत हद तक शिकार थे भी. यूँ इसमें कितना सच है और कितना फ़साना, यह तो मैं नहीं जानता और इस पर कोई टिप्पणी भी नहीं करूंगा कि आत्ममुग्ध होना सही है या ग़लत, पर हाँ इस बात का मलाल मुझे जरूर है कि मैं फिराक को नहीं देख सका. हालांकि चाहता तो देख सकता था क्या? शायद हाँ, शायद नहीं.... ये अलग है कि फिराक उन थोड़े से लोगों मैं शामिल हैं जो अपने जीते जी किंवदंती बन गए,पर फिराक के बारे में मैं जान ही तब पाया जब उनका निधन हुआ। 1982 में जब फिराक साहब का निधन हुआ तब मैं छठे दर्जे में पढता था. सुबह-सुबह आकाशवाणी के प्रादेशिक समाचार में उनके निधन की खबर जानकर पिताजी बहुत दुखी हुए थे। यूँ रेडियो बहुत लोगों के मरने-जीने की बात किया करता था, पर उस पर पिताजी पर कोई फर्क पड़ते मैं नहीं देखता था. आखिर ऐसा क्या था कि वह फिराक साहब के निधन से दुखी हुए. मेरे बालमन में यह कुतूहल उ...

जालिब की गज़लें

हबीब जालिब वाली पोस्ट पर प्रतिक्रिया करते हुए उड़न तश्तरी वाले भाई समीर जी ने अनुरोध किया है कि हो सके कुछ पूरी कविताएँ पढ़वाएं. वैसे उनकी एक कविता 'पाकिस्तान का मतलब क्या' पहले ही इयत्ता पर पोस्ट की जा चुकी है. यहाँ मैं जालिब साहब की कुछ गजलें दे रहा हूँ, जो मुझे. बहुत पसंद आईं. ......गली में ना आएं हम ये और बात तेरी गली में ना आएं हम लेकिन ये क्या कि शहर तेरा छोड़ जाएँ हम मुद्दत हुई है कू-ए-बुताँ की तरफ गए आवारगी से दिल को कहाँ तक बचाएं हम शायद बाक़ैद-ए-ज़ीस्त ये साअत ना आ सके तुम दास्ताँ-ए-शौक़ सुनो और सुनाएं हम बेनूर हो चुकी है बहुत शहर की फजा तारीक रास्तों में कहीँ खो ना जाएँ हम उस के बग़ैर आज बहुत जी उदास है 'जालिब' चलो कहीं से उसे ढूँढ लाएं हम इस शहर-ए-खराबी में ...... इस शहर-ए-खराबी में गम-ए-इश्क के मारे ज़िंदा हैं यही बात बड़ी बात है प्यारे ये हंसता हुआ लिखना ये पुरनूर सितारे ताबिंदा-ओ-पा_इन्दा हैं ज़र्रों के सहारे हसरत है कोई गुंचा हमें प्यार से देखे अरमां है कोई फूल हमें दिल से पुकारे हर सुबह मेरी सुबह पे रोती रही शबनम हर रात मेरी रात पे हँसते रहे तारे कुछ और भी है...

अशआर

झूठे सिक्कों में भी उठा देते हैं अक्सर सच्चा माल शक्लें देख के सौदा करना काम है इन बाजारों का. ******** ******** ******** एक जरा सी बात थी जिसका चर्चा पहुँचा गली-गली हम गुमनामों ने फिर भी एहसान न माना यारों का. ******** ******** ******** दर्द का कहना चीख उठो दिल का तकाजा वजा निभाओ सब कुछ सहना चुप-चुप रहना काम है इज्ज़तदारों का. इब्न-ए-इंशा

अशआर

कुदरत को नामंज़ूर थी सख्ती ज़बान में. इसीलिये हड्डी न अता की ज़बान में. -अज्ञात चमक शीशे के टुकड़े भी चुरा लाते हैं हीरे की , मुहब्बत की नज़र जल्दी में पहचानी नहीं जाती. जिधर वो मुस्कराकर के निगाहें फेर लेते हैं - क़यामत तक फिर उस दिल की परेशानी नहीं जाती. -अज्ञात यूं ज़िन्दगी में मेरे कोई कमी नहीं- फिर भी ये शामें कुछ माँग रही हैं तुमसे. - फिराक गोरखपुरी ये जल्वागहे खास है कुछ आम नहीं है. कमजोर निगाहों का यहाँ काम नहीं है. तुम सामने खुद आए ये इनायत है तुम्हारी, अब मेरी नज़र पर कोई इलज़ाम नहीं है. -अज्ञात बारिश हुई तो फूलों के दिल चाक़ हो गए. मौसम के हाथों भीग कर शफ्फाक हो गए. बस्ती के जो भे आबगज़ीदा थे सब के सब- दरिया ने रुख़ बदला तो तैराक हो गए. - परवीन शाकिर

अशआर

सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहॉ जिंदगी ग़र कुछ रही तो नौजवानी फिर कहॉ. इस्माइल मेरठी

गीतों से

हम नए हैं नए थे भी नए आगे भी रहेंगे यह हमारा गीत होना सुनो समयातीत होना है बन सदाशिव जहर से अमृत बिलोना है कल दहे थे दह रहे हैं कंठ आगे भी दहेंगे हम नए हैं नए थे भी नए आगे भी रहेंगे कुमार रवीन्द्र

अशआर

अब यकीनन ठोस है धरती हकीकत की तरह ये हकीकत देख लेकिन खौफ के मारे न देख. रक्त वर्षों से नसों में खौलता है, आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है. दुष्यंत कुमार

चुप रहिए

देख रहे हैं जो भी, किसी से मत कहिए, मौसम ठीक नहीं है, आजकल चुप रहिए. फुलवारी में फूलों से भी ज्यादा साँपों के पहरे हैं, रंगों के शौक़ीन आजकल जलते जंगल में ठहरे हैं. जिनके लिए समंदर छोड़ा वे बदल भी काम न आए, नई सुबह का वादा करके लोग अंधेरों तक ले आए. भूलो यह भी दर्द चलो कुछ और जिएँ, जाने कब रूक जाएँ जिंदगी के पहिए. रमानाथ अवस्थी

अशआर

अपना कशकोल छिपा लो तो सभी हातिम हैं वरना हर शख्स भिखारी है, जिधर जाओगे. मैदां की हार-जीत तो किस्मत की बात है टूटी है किसके हाथ में तलवार देखना. हरेक आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी जिसको भी देखना, कई बार देखना.

बातें अपनी सी

सर जमीन-ए-हिंद पर अक्वाम-ए-आलम के फ़िराक क़ाफ़िले बस्ते गए हिन्दोस्तां बनता गया फिराक गोरखपुरी

आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः

आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः

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