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सोशल मीडिया में सुरक्षा आपके ही हाथ

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अंकुर विजयवर्गीय    रायपुर । अगर आप इस डिजिटल युग में गांधीजी के रास्ते पर चलना चाहते हैं , तो आज से डिजिटल सत्याग्रह की शुरुआत कीजिए। '' यह विचार भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने अग्रसेन महाविद्यालय द्वारा आयोजित वेबिनार में व्यक्त किए। आयोजन में देश के प्रतिष्ठित अपराध मामलों के लेखक एवं पत्रकार विवेक अग्रवाल मुख्य वक्ता के तौर पर शामिल हुए। '' डिजिटल समय में मीडिया '' विषय पर मुख्य अतिथि के तौर पर बालते हुए प्रो. द्विवेदी ने कहा कि आपने महात्मा गांधी के तीन बंदरों के बारे में ज़रूर सुना होगा। महात्मा गांधी ने इन बंदरों के ज़रिए बुरा ना देखने , बुरा ना बोलने और बुरा ना सुनने की शिक्षा दी थी। लेकिन आज के इस डिजिटल युग में मैं आपसे ये कहना चाहता हूं कि '' बुरा मत टाइप करो , बुरा मत लाइक करो और बुरा मत शेयर करो। '' प्रो. द्विवेदी ने कहा कि पत्रकारिता चाहे प्रिंट की हो या डिजिटल की , उसका भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह जिस मोड़ पर खड़ी है , वहां से किस रास्ते पर जाने को तैयार है। पत्रकार अगर पत्रकारिता क...

सभी भारतीय भाषाएं राष्ट्रीय भाषाएं : प्रो. अग्निहोत्री

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  नई दिल्ली।  '' सभी भारतीय भाषाएं राष्ट्रीय भाषाएं हैं , इसलिए किसी भाषा को क्षेत्रीय भाषा और किसी को राष्ट्रीय भाषा कहना ठीक नहीं होगा। जिस दिन हमारे शिक्षकों ने भारतीय भाषाओं में पढ़ाना शुरू कर दिया , उस दिन हिन्दुस्तान अन्य देशों से बहुत आगे निकल जाएगा। '' यह विचार हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय , धर्मशाला के कुलपति प्रो. कुलदीप चंद्र अग्निहोत्री ने सोमवार को भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) द्वारा आयोजित राष्ट्रीय वेबिनार में व्यक्त किए। कार्यक्रम की अध्यक्षता महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय , मोतिहारी के कुलपति प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने की। आयोजन में प्रसिद्ध लेखिका एवं दैनिक हिंदुस्तान की कार्यकारी संपादक श्रीमती जयंती रंगनाथन मुख्य वक्ता के तौर पर शामिल हुईं। इसके अलावा नवभारत टाइम्स , मुंबई के पूर्व संपादक श्री विश्वनाथ सचदेव , दैनिक जागरण , नई दिल्ली के सह-संपादक श्री अनंत विजय और पांडिचेरी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ. सी जयशंकर बाबु ने भी वेबिनार में अपने विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम में भारतीय जन संचार संस्थान के महानिदेशक प्रो. ...

मूल्यानुगत मीडिया अभिक्रम समिति की कार्ययोजनाओं पर चर्चा

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  नई दिल्ली। मूल्यानुगत मीडिया अभिक्रम समिति के अध्यक्ष प्रो. संजय द्विवेदी को भारतीय जनसंचार संस्थान नई दिल्ली का महानिदेशक नियुक्त किए जाने पर समिति की ओर से ऑनलाइन सम्मान समारोह आयोजित किया गया। समारोह की अध्यक्षता भी प्रो.संजय द्विवेदी ने की। जिसमें मूल्यानुगत मीडिया अभिक्रम समिति के संचालन परिषद व कोर कमेटी के पदाधिकारियों सहित देशभर से अनेक वरिष्ठ पत्रकार शामिल हुए। इस समारोह में मूल्यानुगत मीडिया अभिक्रम समिति की भविष्य की कार्ययोजनाओं पर भी चर्चा की गई। बता दें कि दिसंबर 2019 में मध्यप्रदेश के इंदौर में हुए समिति के चुनाव में प्रो. संजय द्विवेदी को अध्यक्ष चुना गया था। समारोह की शुरूआत में समिति की ओर से सचिव बी.के. डॉ रीना ने प्रो. संजय द्विवेदी का सम्मान किया। समिति के संस्थापक व वरिष्ठ पत्रकार प्रो.कमल दीक्षित ने प्रो.द्विवेदी का सम्मान करने के साथ समिति की कार्यवाही से सभी सदस्यों को अवगत कराया। मूल्यानुगत मीडिया अभिक्रम समिति की बैठक समिति ने प्रो. संजय द्विवेदी का किया सम्मान इस अवसर पर प्रो. संजय द्विवेदी ने संबोधित करते हुए कहा कि वर्तमान समय में मीडिया के लोगों...

हिंदी वालों का दंभ और समाज में उनकी भूमिका

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इष्ट देव सांकृत्यायन 60 के बाद की जो हिंदी है , दंभ से उसका चोली-दामन का साथ है। क्योंकि 47 में जो संविधान सभा के बहुमत के बावजूद हिंदी के राष्ट्रभाषा बनाए जाने का विरोध कर रहे थे और आखिरकार उसे अपने षड्यनत्रकारी दुष्चक्र में फँसाकर राजभाषा के दायरे में सीमित कर ही डाला , उन्होंने ही अपने उसी षड्यंत्र चातुर्य का उपयोग कर हिंदी की छाती पर अपने वर्चस्व का खूँटा गाड़ लिया। यह किस एक महापुरुष की कृपा का फल है , इस पर बार-बार बोलने का कोई लाभ नहीं। लेकिन जब बात समाज को बचाने में साहित्य की भूमिका की आएगी तो उन्हीं दंभियों में से कई अपनी वे कीलें ले-लेकर निकल आएंगे जो उन्होंने कभी हिंदी सेवा के नाम पर हिंदी भाषा , साहित्य और समाज के चक्के में ठोंकी थीं। उन्होंने वे कीलें ठोंकी तो थीं हिंदी के चक्के की हवा निकालने के लिए , लेकिन सहस्राब्दियों से वंचित समाज की अंतर्निहित चेतना ने उसका भी उपयोग कर लिया। वह उपयोग उसने अपनी मजबूती बढ़ाने में किया। आखिरकार गाड़ी और ज्यादा मजबूती से समय की सड़क पर जम गई और बेहवा ही चलने लगी । लढ़िये की तरह। लढ़िये की ये खासियत है कि वह ज़रा धीमे चलती है , लेकिन जब...

इन्द्राणी के बहाने

हालांकि मीडिया के सोचने-करने के लिए हमेशा बहुत कुछ रहता है, इस वक़्त भी है. न तो किसानों की आत्महत्या रुकी है, न कंपनियों की लूट, न ग़रीबों-मज़दूरों का शोषण, न फीस के नाम पर स्कूलों की लूट. सांस्कृतिक दृष्टि से देखें देश का सबसे बड़ा पर्व महाकुंभ नासिक में और राजनीतिक नज़रिये से चुनाव बिहार में चल ही रहे हैं. मीडिया चाहे तो इनके बहाने उन बुनियादी सवालों से जूझ सकती है जिनसे जूझना देश और जन के लिए ज़रूरी है. लेकिन हमारी मीडिया ऐसा कभी करती नहीं है. इन सवालों से वह हमेशा बचती रही है और आगे भी बचती रही है. इनसे बचने के लिए ही वह कभी कुछ झूठमूठ के मुद्दे गढ़ती है और कभी तलाश लेती है. जिन मुद्दों को वह तलाश लेती है, उनमें कुछ देश को जानना चाहिए या जिन प्रश्नों की ओर देश का ध्यान जाना चाहिए, उनसे वह हमेशा बचती है. ऐसा ही एक मुद्दा इन दिनों इंद्राणी मुखर्जी का है. ख़बरें उन्हें लेकर बहुत चल रही हैं, लेकिन उन तीखे प्रश्नों से हमारी मीडिया बच कर भाग जा रही है, जो उठाए ही जाने चाहिए. वही प्रश्न उठा रहे हैं भारत संस्कृति न्यास के अध्यक्ष संजय शांडिल्य । वास्तव में कहा आ गए है हम। क़ुछ समझ में नहीं...

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