ऐसे भी दिन तूने देखे, ओए नूरू!!
कवि त्रिलोचन शास्त्री एक बात कहा करते थे - अच्छी कविता वह नहीं है जो पूरी तरह बन्द रहे और वह भी नहीं जो पूरी तरह खुली हो। अच्छी कविता वह है जो थोड़ी खुली हो और थोड़ी बन्द। अच्छी कविता वह है जो पहली बार सुनने पर भी समझी जा सके और बाद में जितनी बार पढ़ी- सु नी जाए , उसके उतने नए-नए अर्थ , नए-नए भाव खुलें। आजकल गाली गलौज को बिलकुल वैसे ही साहित्य का अभिन्न अंग माना जाने लगा है जैसे नंगेपन को सिनेमा और नंगई को राजनीति का। गजब यह है कि साहित्य वालों को सिर्फ अपने ही पढ़े-लिखे होने का भयावह और बीभत्स अहंकार है और इसलिए वे अपने पक्ष में गंभीर दिखने वाले अत्यन्त हास्यास्पद कुतर्क भी लिए आते हैं। जुगुप्सा की इस बाढ़ ने व्यंजना के बिम्ब और प्रतीक जैसे उपकरणों के लिए कोई स्पेस ही नहीं छोड़ा है। जिनने पहले इन माध्यमों से गहरे सत्य को व्यक्त करने की कोशिश की है , आने वाले दिनों में उनका क्या होगा , यह सोचकर ही कभी कभी मन सिहर जाता है। वैसे भी संस्कृति की दुनिया में विकृतात्म राजनीतिक पिट्ठुओं के कब्जे ने कुपाठ और दुर्व्याख्याओं की आशंका को निरंतर बढ़ाया ही है और वह घटने का नाम भी न...