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राहु के दो मूल

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भौतिक दृष्टि से देखें तो अव्वल तो राहु हैं ही नहीं। वह जो हैं , वो एक बिंदु हैं। केवल फलित ज्योतिष ही उन्हें ग्रह मानता है और वह भी छाया ग्रह। क्योंकि इनके पास ठोस खगोलीय शरीर नहीं है। विज्ञान के अनुसार वह केवल एक बिंदु हैं। खगोल विज्ञान के अनुसार , राहु वह Intersection Point हैं , जहाँ पृथ्वी की कक्षा और चंद्रमा की कक्षा आपस में एक दूसरे को काटती है। ऐसे दो बिंदु हैं। एक उत्तर और दूसरा दक्षिण में। उत्तरी बिंदु को राहु और दक्षिणी बिंदु को केतु कहा जाता है। पौराणिक कथा तो आप जानते ही हैं कि स्वरभानु नामक राक्षस का सिर राहु है और धड़ केतु। फलित ज्योतिष में राहु और केतु दोनों ही की बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। पता नहीं क्या कारण है कि राहु को तो बहुत लोग अपने नाम में रखते हैं , लेकिन केतु को बिरला ही कोई रखता है। मेरे परिचितों में केवल एक हैं , जिन्हें माता-पिता की ओर से तो रणविजय सिंह नाम मिला , लेकिन केतु को उन्होंने स्वयं अपने नाम में जोड़ लिया - सत्यकेतु – तखल्लुस के रूप में। यह तखल्लुस उन्होंने क्या सोचकर जोड़ा , ये मैंने कभी पूछा नहीं। बहरहाल , आज हम राहु-केतु का ज्योतिषीय नहीं , बल्...

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