गुरुओं को अक्सर लठैतों की भूमिका में ही देखा
स्कूल में गुरुओं को मैंने अक्सर लठैत की भूमिका में ही देखा, कब किस बात पर ठोक दे पता ही नहीं चलता था, ऊपर से तुर्रा यह कि गुरु की पिटाई को आर्शिवाद समझना चाहिये। मैथ का एक लंगड़ा टीचर तो इतना मरखंड था कि बाप रे बाप....आज भी उसके बारे में सोंचता हूं तो हड्डी में सिहरन होती है। एक मोटा सा रूल हमेशा उसके हाथ में होता था, और जिस गति से उसका रूल चलता था उसे देखकर यही लगता था कि बचपन में इसके गुरू ने भी इसकी खूब धुलाई की होगी, बिना तोलमोल के। मारकूट के बच्चों को पढ़ाने की अदा निराली थी। लेकिन चकचंदा के दिन उसकी नरमी देखते बनती थी। छोटे से कस्बे में गुरुदक्षिणा के नाम पर यह सार्वजनिक वसूली का दिन होता था। सुबह से उसके होठों पर रसगुल्ले टपकते रहते थे। सभी छात्रों को इकठ्ठा करके द्वार-द्वार जाता था और मोटा धन समेटने की जुगाड़ में रहता था। आंटा, चावल, दाल, चना, साग-सब्जी जो कुछ मिलता था सब समेट लेता था और उसे गधे की तरह ढोने के काम पर बच्चों को लगा देता था। अब शिक्षक दिवस पर एसे गुरुओं की याद आने लगे तो, मैं क्या कर सकता हूं, सिवाये ब्लोगियाने के। कस्बा छूटा, शहर छूटा और नये शहर में गया। स्कूल क...