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Showing posts from August, 2010

परसाईं जन्मोत्सव 22 अगस्त 2010

विगत 22 अगस्त को व्यंग्यशिल्पी हरिशंकर परसाईं का जन्मोत्सव उनकी कर्म नगरी जबलपुर में मनाया गया । अस्वस्थता के कारण मैं उस आयोजन में शामिल ना हो सका । वे मेरे और अनेकों साहित्य सेवियों के गुरु हैं । उन्हें शत-शत नमन ! इयत्ता के सुधि अनुसरण कर्ताओं के लिए निम्नांकित लिंक [ब्लॉग टुटही पलानी बोले ] दे रहा हूँ । जिसमें इस अवसर पर राष्ट्रपति पुरूस्कार प्राप्त पत्रकार और साहित्यकार श्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने अपने ब्लॉग के माध्यम से एक बात रखी है । प्रत्क्रियायें उनके ब्लॉग तक पहुंचे । वे हिंदी और भोजपुरी के अच्छे कवि भी हैं । http://tutheepalaaneebole.blogspot.com/2010/08/blog-post.html#comments

बेरुखी को छोडि़ए

रतन प्यार है गर दिल में तो फिर बेरुखी को छोडि़ए आदमी हैं हम सभी इस दुश्मनी को छोडि़ए गैर का रोशन मकां हो आज ऐसा काम कर जो जला दे आशियां उस रोशनी को छोडि़ए हैं मुसाफिर हम सभी कुछ पल के मिलजुल कर रहें दर्द हो जिससे किसी को उस खुशी को छोडि़ए प्यार बांटो जिंदगी भर गम को रखो दूर-दूर फिक्र आ जाए कभी तो जिंदगी को छोडि़ए गुल मोहब्बत के जहां पर खिलते हों अकसर रतन ना खिलें गुल जो वहां तो उस जमीं को छोडि़ए जानते हैं हम कि दुनिया चार दिन की है यहां नफरतों और दहशतों की उस लड़ी को छोडि़ए

उत्तर आधुनिक शिक्षा में मटुक वाद - दूसरी किश्त

- हरिशंकर राढ़ी माना कि प्रो० मटुकनाथ से पूर्व और उनकी उम्र से काफी अधिक या यूँ कहें कि श्मशानोंमुख असंखय प्राध्यापकों ने ऐसा या इससे भी ज्यादा पहले किया था, किन्तु वे इसे आदर्श रूप में प्रस्तुत नहीं कर पाए थे।उनके अन्दर न तो इतना साहस था और न ही क्रान्ति की कोई इच्छा।जो भी किया , चुपके से किया। छात्राओं के सौन्दर्य एवं कमनीयता का साङ्‌गोपांग अध्ययन किया, गहन शोध किया और अपनी गुरुता प्रदान कर दी । प्रत्युपकार भी किया, पर चुपके- चुपके। आज न जाने कितनी पीएचडियाँ घूम रही हैं और न जाने कितने महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में ज्ञान बांटकर पैसे और इज्जत बटोर रही हैं, देश की बौद्धिक सम्पदा की प्रतीक बनी बैठी हैं ।ये बात अलग है कि गुरुजी ने कितना बड़ा समझौता शिक्षा जगत से किया, कितना बड़ा पत्थर सीने पर रखा , ये वही जानते हैं। पर मन का क्या करें? अब वे भी उदार भाव से पीएचडी बाँट रही हैं। प्रोफेसर साहब की असली शिष्या जो ठहरीं! पर दाद देनी होगी अपने प्रोफेसर मटुकनाथ जी को जिन्होंने इस तरह के गुमशुदा एवं निजी संबन्धों को मान्यता प्रदान की और मटुकवाद स्थापित किया। उनको एक उच

उत्तर आधुनिक शिक्षा में मटुकवाद

- हरि शंकर राढ़ी (यह व्यंग्य समकालीन अभिव्यक्ति के जनवरी -मार्च २०१० अंक में प्रकाशित हुआ था । यहाँ सुविधा की दृष्टि दो किश्तों में दिया जायेगा । ) वाद किसी भी सभ्य एवं विकसित समाज की पहचान होता है, प्रथम अनिवार्यता है। वाद से ही विवाद होता है और विवाद से ऊर्जा मिलती है। विवाद काल में मनुष्य की सुसुप्त शक्तियां एवं ओज जागृत हो जाते हैं। विवाद से सामाजिक चेतना उत्पन्न होती है। लोग चर्चा में आते हैं। जो जितना बड़ा विवादक होता है, वह उतना ही सफल होता है। आदमी जितना ही बौद्धिक होगा, उतना ही वाद होगा। जिस समाज में जितने ही वाद होंगे , वह उतना ही विकसित एवं सुशिक्षित माना जाएगा। वस्तुतः वाद का क्षेत्र अनन्त है, स्थाई है किन्तु साथ-साथ परिवर्तनशील भी है। इसका व्याप्ति क्षेत्र एवं कार्यक्षेत्र दोनों ही असीमित है। अब तो यह पूर्णतया भौमण्डलिक भी होने लगा है। इस पर तो एक सम्पूर्ण शोध की आवश्यकता है। कमी है तो बस केवल शुरुआत की। एक बार शुरुआत हो जाए तो देखा-देखी शोध ही शोध ! बुद्धि के क्षेत्र में अपने देश का शानी वैसे भी सदियों से कोई नहीं रहा है। अब जहां इतनी बुद्धि है वहाँ वा

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