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Showing posts with the label इतिहास
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  समीक्षा इतिहास के आईने में आज़मगढ़                                                                                        - हरिशंकर राढ़ी भूलना इंसान की फितरत है , किंतु पिछले कुछ दशकों से वैश्वीकरण की ऐसी तेज हवा चली कि हम अपनी मिट्टी और अपनी पहचान को ही लगभग पूरी तरह से भूलने लग गए हैं। आधुनिकता की दौड़ में अपने इतिहास को भूल जाना किसी की मजबूरी तो किसी के लिए आधुनिकताबोध होता है। किंतु यह भी सत्य है कि अपने इतिहास से उखड़कर कोई भी समाज गौरव की प्राप्ति नहीं कर सकता। हाल यह है कि वैश्विक इतिहास , भूगोल एवं व्यापार की प्राथमिकता में हम अपने निजी भौगोलिक क्षेत्र के इतिहास को उपेक्षित कर बैठे। आज हम अपने गाँव और जनपद की बात तो क्या करें , अपने प्रदेश का इतिहास पढ़ना उचित नहीं समझते। ऐसे परिवेश में यदि किसी जिले का शोधपूर्ण , वृहद और रोचक इत...

याली : एक मिथकीय आकृति

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नितीश ओझा रावण के दरबार में जब अंगद आते हैं तो उनके पीछे के खम्भों पर यही आकृति बनी हुई है . यह एक पौराणिक आकृति है जिसकी आधी आकृति शेर , आधी हाथी और आधी आकृति घोड़े की भी होती है. दक्षिण भारतीय मंदिरों में अक्सर खम्भे पर पाई जाने वाली एक आकृति , जिसका नाम याली है जो संस्कृत के व्याल से निकला जिसका अर्थ रक्षक , और कुछ स्थानों पर गज मुख सर्प से है यथा खलनायक रूप में , नाट्यशास्त्र में इनका सम्बन्ध दस नाम रूप दंडक से भी है 15 वी शताब्दी   में विकसित इस आकृति को दक्षिण भारत के सभी मंदिरों में देखा जा सकता - मदुरै तमिलानाडू , चेन्ना केशव , थिरुवन्नमलाई , हलेबीडू , होयसल मंदिरों कर्णाटक इत्यादि. मदुरै के मीनाक्षी नायक मंडपम में आपको 1000 याली दीखते हैं.  भारत के बाहर भी यह आकृतियाँ मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थलों में मिलती हैं , बर्मा थाईलैंड , कम्बोडिया , लाओस के बौद्ध मंदिरों में पैगोडा के आगे भी यह आकृति एक Guard / रक्षक के रूप मे मिलती है जहां इनका नाम Chinthe है . बौद्ध धर्म की कहानियों में इसका जन्म एक रानी से हुवा जिसने एक शेर (सिंह) से विवाह किया लेकिन कालांतर में उस शे...

जाग मछेंदर गोरख आया-3

कल लिखने बैठा तो मन थोड़ा भन्नाया हुआ था. सोच ही नहीं पा रहा था कि शुरू कहाँ से करूँ. वजह कुछ ख़ास नहीं , बस एक दुविधा थी. दुविधा यह कि आगे की कड़ी बढ़ाएँ कहाँ से. मन यह बन रहा था कि पहले जन्म से जुड़े सारे मिथकों की सारी चर्चा कर ली जाए. क्योंकि पिछली पोस्ट में जिस मिथक ज़िक्र किया वह कई मिथकों में से एक ही है. वह जो लगभग उत्तर भारत में प्रचलित है. लगभग माने बिहार , उत्तर प्रदेश , पंजाब और हिमाचल तक. राजस्थान के कुछ भागों में यही मिथक है और कुछ में दूसरा. इसी से मिलता-जुलता. इसी से मिलती-जुलती कई लोकगाथाएँ कई दूसरे क्षेत्रों में भी हैं. लेकिन पूर्वोत्तर भारत में भिन्न. गुजरात में कुछ और भिन्न. नेपाल और तिब्बत में और भिन्न. एक और बात है. मिथक या कहें लोकगाथाएँ या लोकवार्ताएँ मुझे आकर्षित बहुत करती हैं. जानते हुए भी कि इनमें तथ्य कम , भाव ज़्याद है और तथ्य अगर है भी तो वह बहुत गूढ़ अर्थ या कह लें लक्षणा में मौजूद है , जिसे निकालना बहुत जटिल काम है ; मैं अपने को उनको उन्हें जानने और उनकी चर्चा करने से रोक नहीं पाता. लेकिन जरूरी मुझे यह लग रहा था कि पहले काल की चर्चा कर ली जाए. हाल...

जाग मछेंदर गोरख आया-2

गोरख के साहित्य पर चर्चा हो , इसके पहले जरूरी है कि उनका मानवीकरण कर लिया जाए. वैसे यह मैं कोई नया काम करने नहीं जा रहा हूँ. बहुत पहले ही कई विद्वान कर चुके हैं . लेकिन चूँकि यह काम विद्वानों ने किया तो यह मोटी-मोटी किताबों में दफन होकर रह गया. बाक़ी का क्रियाकर्म कोर्स में कर दिया गया. लोक तो उन्हें देवता बना ही चुका है. वैसे इस पर मुझे एतराज नहीं. हो भी तो क्या कर लूंगा. यह प्रवृत्ति केवल हमारे ही लोक की नहीं है. यह दुनिया भर के लोक की प्रवृत्ति है. ख़ासकर उन विभूतियों के साथ जिनके साथ अध्यात्म और चमत्कार जुड़ा है. गोरख के तो जन्म के साथ ही चमत्कार जुड़ा है. चमत्कार या कहें मुश्किलों से निजात के साथ लोगों के सहज ही जुड़ जाने का जो कारण मेरी समझ में आता है , वह वही है जिसे ग़ालिब ने कुछ यूँ कहा है: इब्न-ए-मरियम हुआ करे कोई मेरे दुख की दवा करे कोई जिसने भी उसके दुख की कुछ दवा कर दी , उसी को उसने भगवान मान लिया. भोजपुरी में तो कहावत ही है , जे पार लगावे तेही भगवान. जो उसे संसार सागर पार करा दे , यानी जो उसके कष्टों को मिटाने की दिशा में कुछ क़दम आगे बढ़ा दे , वही उसके लिए भगवान ...

जाग मछेंदर गोरख आया-1

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ऐसा तो नहीं कि मैं गोरख को जानता न था. क्योंकि गोरखपुर में जन्मा. वहीं पला-बढ़ा. ढंग का जो कुछ सीखा, वहीं सीखा. अपनी मिट्टी छोड़ने के बाद तो इंसान जो कुछ सीखता है या दुनिया उसे जो कुछ सिखाती है, वह बिना सीखे निबह जाए तो बेहतर. तो गोरख को मैं जानता तो था बचपन से. लेकिन यह जानना बाबा गोरखनाथ के रूप में था. संत भी नहीं, कुछ-कुछ भगवान जैसा. शिवावतार कहे जाते हैं हमारे यहाँ बाबा गोरखनाथ. किंवदंतियां बहुत, स्पष्ट जानकारी कुछ नहीं. यह शायद भारतीय लोकमानस की खामी है. वह जिसे बड़ा मानता है, उसे बड़ा बना देता है कि भगवान से नीचे कुछ उसे स्वीकार ही नहीं होता. फिर गोरख तो गोरख ठहरे. यह केवल गोरख ही नहीं, कबीर के भी साथ हुआ. रैदास, दादू, मलूक, नानक, सूर, तुलसी, मीरा.... सबके साथ हुआ. 'जाग मछेंदर गोरख आया....' अपने गुरु तक को माया के पाश से मुक्त करने की औकात रखने वाले गोरख के साथ यह न होता, ये कैसे संभव था. तो गोरख के साथ भी हुआ. उन किंवदंतियों की मानें तो गोरख महाभारत काल में भी हुए. क्योंकि हमारे यहाँ गोरखनाथ के मंदिर में एक पोखरा यानी तालाब है. पोखरे के किनारे एक लेटे हु...

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