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  समीक्षा इतिहास के आईने में आज़मगढ़                                                                                        - हरिशंकर राढ़ी भूलना इंसान की फितरत है , किंतु पिछले कुछ दशकों से वैश्वीकरण की ऐसी तेज हवा चली कि हम अपनी मिट्टी और अपनी पहचान को ही लगभग पूरी तरह से भूलने लग गए हैं। आधुनिकता की दौड़ में अपने इतिहास को भूल जाना किसी की मजबूरी तो किसी के लिए आधुनिकताबोध होता है। किंतु यह भी सत्य है कि अपने इतिहास से उखड़कर कोई भी समाज गौरव की प्राप्ति नहीं कर सकता। हाल यह है कि वैश्विक इतिहास , भूगोल एवं व्यापार की प्राथमिकता में हम अपने निजी भौगोलिक क्षेत्र के इतिहास को उपेक्षित कर बैठे। आज हम अपने गाँव और जनपद की बात तो क्या करें , अपने प्रदेश का इतिहास पढ़ना उचित नहीं समझते। ऐसे परिवेश में यदि किसी जिले का शोधपूर्ण , वृहद और रोचक इत...

निज़ामाबाद और शीतला माता

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हरिशंकर राढ़ी  शीतला माता मंदिर निज़ामाबाद (आजमगढ़ )       छाया : हरिशंकर राढ़ी  हमारे देश में न जाने कितने ऐसे धार्मिक स्थल हैं जहाँ विशाल संख्या में श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। इससे न केवल आमजन का पर्यटन हो जाता है , अपितु उन स्थानों पर हजारों लोगों की जीविका का साधन बनता है। ऐसा ही एक धार्मिक स्थल आजमगढ़ के निज़ामाबाद में स्थित शीतला माता का मंदिर है। निज़ामाबाद आजमगढ़ जनपद के लगभग मध्य में है। सुना बहुत था , जाने का संयोग कभी नहीं बना। हरी-भरी फसलों के बीच प्रकृति के वैभव का आनंद लेते हम निजामबाद स्थित शीतला माता के मंदिर पहुँच गए। यहाँ मेरा आना पहली बार हुआ। प्रथम दृष्टि   ही विश्वास हो गया कि इस मंदिर पर श्रद्धालुओं का आना-जाना बड़ी संख्या में होगा। कुल मिलाकर ग्रामीण परिवेश में बड़ा प्रंागण। हरे-भरे छायादार वृक्ष और प्रसाद बेचने वालों के अनगिनत ठीहे। हिंदू धर्म में लगभग सभी देवी-देवताओं के दिन निश्चित किए हुए हैं। देवी दुर्गा से संबंधित दिन प्रायः सोमवार या वृहस्पतिवार माना जाता है। जहाँ इतने देवी-देवता होंगे , ऐसी व्यवस्था बनानी ही प...

Azamgarh : History, Culture and People

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आजमगढ़ : इतिहास और संस्कृति                           - हरिशंकर राढ़ी  आजमगढ़ रेलवे स्टेशन    फोटो : हरिशंकर राढ़ी  रामायणकालीन महामुनि अत्रि और सतीत्व की प्रतीक उनकी पत्नी अनुसूया के तीनों पुत्रों महर्षि दुर्वासा, दत्तात्रेय और महर्षि चन्द्र की कर्मभूमि का गौरव प्राप्त करने वाला क्षेत्र आजमगढ़ आज अपनी सांस्कृतिक विरासत और आधुनिकता के बीच संघर्ष करता दिख रहा है। आदिकवि महर्षि वाल्मीकि के तप से पावन तमसा के प्रवाह से पवित्र आजमगढ़ न जाने कितने पौराणिक, मिथकीय, प्रागैतिहासिक और ऐतिहासिक तथ्यों और सौन्दर्य को छिपाए अपने अतीत का अवलोकन करता प्रतीत हो रहा है। आजमगढ़ को अपनी आज की स्थिति पर गहरा क्षोभ और दुख जरूर हो रहा होगा कि जिस गरिमा और सौष्ठव से उसकी पहचान थी, वह अतीत में कहीं खो गयी है और चंद धार्मिक उन्मादी और बर्बर उसकी पहचान बनते जा रहे हैं। आजमगढ़ ने तो कभी सोचा भी न होगा कि उसे महर्षि दुर्वासा, दत्तात्रेय, वाल्मीकि, महापंडित राहुल    सांकृत्यायन, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, शिक्ष...

Vishunpur (Rarhi ka Pura ) Azamgarh

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विशुनपुर (राढ़ी का पूरा), आजमगढ़  का                                            --हरिशंकर राढ़ी  राढ़ियों का गांव विशुनपुर महराजगंज क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है और इसकी चर्चा पहले के लेखों में की जा चुकी है। दरअसल महराजगंज बाजार का अधिकांश हिस्सा विशुनपुर की जमीन में ही आता है और वहां इनका वर्चस्व सदैव से रहा है। महराजगंज का नया चौक पूर्णतया विशुनपुर की कृषिभूमि में बसा है और अब यह बाजार का सबसे मंहगा और रौनक वाला क्षेत्र है। महेशपुर की भांति विशुनपुर (राढ़ी के पूरा) की स्थापना का समय बताया नहीं जा सकता। आजमगढ़ गजेटियर में महराजगंज के साथ इसका जिक्र बिशनपुर के नाम से है। नाम में आंशिक परिवर्तन निश्चित रूप से अंगरेजों की टेढ़ी जबान के कारण होगा जिससे उन्होंने भारत के अधिकांश शहरों और गांवों की वर्तनी का सत्यानाश कर दिया। विशुनपुर गांव बांगर क्षेत्र में होने के कारण अपेक्षाकृत समृद्ध था और बाजार के निकट होने से पहुंच में आसान भी। इस गांव के राढ़ी मुख्...

Maheshpur Azamgarh ka

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महेशपुर : मेरा गाँव (आजमगढ़ )     - हरिशंकर राढ़ी  समाज में आए व्यापक परिवर्तनों से कोई अछूता रह गया हो, यह संभव नहीं है। भौतिक प्रगति के साथ वैचारिक बदलाव हर जगह दिख रहा है और उसके साथ-साथ जीवन पद्धति में भी बड़ा बदलाव आया है। रूढ़ियां तो टूटी ही हैं, कुछ अच्छी परंपराएं भी बिखरी हैं। आदमी सुविधाभोगी हुआ है और उसके अनुसार उसने सिद्धांत और व्यवसाय भी बदला है। अन्य क्षेत्रों की भांति राढ़ियों के दोनों गांवों में व्यवसाय और सोच में काफी परिवर्तन आया है। नयी पीढ़ी बेहतर सुविधाओं और रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रही है, खेती पर निर्भरता कम हुई है। किंतु सबसे अधिक असर जातिगत तानेबाने पर हुआ है और उसमें भी सकारात्मक ताने-बाने पर। बिरादरी की परंपराओं का जो जुनून और कानून 30-40 साल पहले तक था, वह बिखर रहा है। महेश और विष्णु में बड़ा भाई कौन था, इसे निश्चित रूप से निर्धारित नहीं किया जा सकता। महेश ने महराजगंज से उत्तर देवारा क्षेत्र चुना और बस गए। उनके बसाए गांव का नाम महेशपुर हुआ। वह जमाना निश्चित ही सुविधाओं के घोर अभाव का रहा होगा। न कोई रास्ता, न यातायात और न कोई नगरीय ...

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