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उत्तर आधुनिक शिक्षा में मटुकवाद

- हरि शंकर राढ़ी (यह व्यंग्य समकालीन अभिव्यक्ति के जनवरी -मार्च २०१० अंक में प्रकाशित हुआ था । यहाँ सुविधा की दृष्टि दो किश्तों में दिया जायेगा । ) वाद किसी भी सभ्य एवं विकसित समाज की पहचान होता है, प्रथम अनिवार्यता है। वाद से ही विवाद होता है और विवाद से ऊर्जा मिलती है। विवाद काल में मनुष्य की सुसुप्त शक्तियां एवं ओज जागृत हो जाते हैं। विवाद से सामाजिक चेतना उत्पन्न होती है। लोग चर्चा में आते हैं। जो जितना बड़ा विवादक होता है, वह उतना ही सफल होता है। आदमी जितना ही बौद्धिक होगा, उतना ही वाद होगा। जिस समाज में जितने ही वाद होंगे , वह उतना ही विकसित एवं सुशिक्षित माना जाएगा। वस्तुतः वाद का क्षेत्र अनन्त है, स्थाई है किन्तु साथ-साथ परिवर्तनशील भी है। इसका व्याप्ति क्षेत्र एवं कार्यक्षेत्र दोनों ही असीमित है। अब तो यह पूर्णतया भौमण्डलिक भी होने लगा है। इस पर तो एक सम्पूर्ण शोध की आवश्यकता है। कमी है तो बस केवल शुरुआत की। एक बार शुरुआत हो जाए तो देखा-देखी शोध ही शोध ! बुद्धि के क्षेत्र में अपने देश का शानी वैसे भी सदियों से कोई नहीं रहा है। अब जहां इतनी बुद्धि है वहाँ वाद...

डर के बिना कुछ न करेंगे जी...!

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  इलाहाबाद में आजकल पब्लिक स्कूलों में बढ़ी हुई फीस के ख़िलाफ अभिभावक सड़कों पर उतर आए हैं। वकील, पत्रकार, व्यापारी, सरकारी कर्मचारी आदि सभी इस भारी फीस वृद्धि से उत्तेजित हैं। रोषपूर्ण प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं। इसे लेकर कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने लगी तो जिलाधिकारी को स्कूल प्रबन्धकों के साथ समझौता वार्ता करनी पड़ी है। नतीजा चाहे जो रहे लेकिन इस प्रकरण ने मन में कुछ मौलिक सवाल फिर से उठा दिए हैं। भारतीय संविधान में ८६वें संशोधन(२००२) द्वारा प्राथमिक शिक्षा को अब मौलिक अधिकारों में सम्मिलित कर लिया गया है। मौलिक अधिकारों से सम्बन्धित अध्याय-३ में जोड़े गये अनुच्छेद २१-क में उल्लिखित है कि- “राज्य ऐसी रीति से जैसा कि विधि बनाकर निर्धारित करे, छः वर्ष की आयु से चौदह वर्ष की आयु तक के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध करेगा।” नागरिकों के लिए निर्धारित मौलिक कर्तव्यों की सूची, अनु.५१-क, में भी यह कर्तव्य जोड़ा गया है कि- “ ५१-क(ट) : छः वर्ष की आयु से १४ वर्ष की आयु के बच्चों के माता पिता और प्रतिपाल्य के संरक्षक, जैसा मामला हो, उन्हें शिक्षा क...

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