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Showing posts from September, 2009

रावण के चेहरों पर उड़ता हुआ गुलाल

आलोक नंदन पुश्त दर पुश्त सेवा करने वाले कहारों से बीर बाबू कुछ इसी तरह पेश आते थे, “अरे मल्हरवा, सुनली हे कि तू अपन बेटी के नाम डौली रखले हे ?” “जी मलिकार”,  हाथ जोड़े मल्हरवा का जवाब होता था। “अरे बहिन....!!! अभी उ समय न अलई हे कि अपन बेटी के नाम बिलाइती रखबे..., कुछ और रख ले .... भुखरिया, हुलकनी ......  लेकिन इ नमवा हटा दे, ज्यादा माथा पर चढ़के मूते के कोशिश मत कर”, अपने  ख़ास अंदाज़ में बीर बाबू अपने पूर्वजों के तौर-तरीक़ों को हांकते थे. उनके मुंह पर यह जुमला हमेशा होता था, “छोट जात  लतिअइले बड़ जाते बतिअइले”. इलाके में कई तरह की हवाएं आपस में टकरा रही थीं और जहां तहां लोगों के मुंह से भभकते हुए शोले निकल रहे थे. “अंग्रेजवन बहिन...सब चल गेलक बाकि इ सब अभी हइये हथन .” “एक सरकार आविते थे, दूसर सरकार जाइत हे, बाकि हमनी अभी तक इनकर इहां चूत्तर घसित ही.. ” “अभी तक जवार में चारो तरफ ललटेने जलित थे, इ लोग बिजली के तार गिरही न देलन...अब मोबाइल कनेक्शन लेके घूमित हथन...सीधे सरकार से बात करित हथन ” “एक बार में चढ़ जायके काम हे... ” “बाकि अपनो अदमियन सब भी तो बहिनचोदवे हे...कई बार तो समझा

आकृतियां (कहानी)

आलोक नंदन आसमान में काफी ऊंचाई पर मंडराते हुये चीलों के झूंड पर उसकी नजरे टिकी हुई थी, दिमाग के परतों के तह में अचिन्हित प्रतिबंबों के रूप में कई आकृतियां एक दूसरे से उलझते हुये जीवन की जटिलता को अभिव्यक्त करने की कोशिश कर रही थी। नजरें जितनी दूर तक जा रही थी, दिमाग की परतें उतनी ही गहराई से खुलती जा रही थी। आकृतियों ने एक पतली सी तीखी नाक नक्शे काली लड़की का वजूद अख्तियार किया। एक बंद कमरे में पिछले तीन घंटे से वह कैलकुलस के सवालों को हल कर रहा था, अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई, फिर हौले से दरवाजा खुला। अपने बांह में कुछ कपड़े समेटे हुये कमरे में दाखिल हुई थी और मुस्कराते हुये कहा था, “मेरे घर के नल में पानी नहीं आ रहा है, तुम कहो तो तुम्हारे बाथरूम में स्नान कर लूं।” “लेकिन अभी मेरे यहां कोई नहीं है’’, कलम को उस कापी के ऊपर पटकते हुये थोड़ी खीज में वह बोला था, जिस पर कैलकुलस के एक सवाल को वह आधा हल कर चुका था। “कोई बात नहीं, मैं नहा के चली जाऊँगी”, यह बोलते हुये वह काली लड़की कमरे से सटे हुये बाथरुम की ओर चली गई थी। बाथरूम के अंदर से शरीर पर पानी उड़ेलने और गुनगुनाने की आवाज आती रही और व

भारत के दिल की भाषा है हिंदी

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भारतीय दूतावास में आयोजन, चीनी मूल के सात हिंदी विद्वान सम्मानित हिन्दी पखवाड़े के तहत आयोजनों का क्रम केवल देश के भीतर ही नहीं, बाहर भी चल रहा है. भारत से बाहर हिंदी की अलख जगाने के इसी क्रम में चीन में पेकिंग स्थित भारतीय दूतावास के सांस्कृतिक केंद्र के तत्वावधान में एक आयोजन किया गया. इस आयोजन में चीन के सात वरिष्ठ हिंदी विद्वानों को सम्मानित किया गया. चीन से यह सूचना पेकिंग विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर इंडिया स्टडीज़ में प्रोफेसर डॉ. देवेंद्र शुक्ल ने दी. सम्मानित किए गए विद्वानों में प्रो. लियोऊ आनवू, प्रो. यिन होंयुवान, प्रो. चिन तिंग हान, प्रो. च्यांग चिंगख्वेइ, प्रो. वांग चिंनफङ, प्रो. छङ श्वेपिन, प्रो. चाओ युह्वा शामिल हैं. इसके अलावा इस अवसर पर हिंदी निबंध प्रतियोगिता भी आयोजित की गई. इस प्रतियोगिता में चाइना रेडियो की थांग य्वानक्वेइ को प्रथम, पेकिंग विश्वविद्यालय के ली मिन (विवेक) को दूसरा, कुमारी रोशनी को तीसरा तथा चन्द्रिमा और ह्वा लीयू को सांत्वना पुरस्कार प्राप्त हुए. जबकि इसी आयोजन भारतीय मूल वर्ग में हेमा कृपलानी को प्रथम, हेमा मिश्रा को द्वितीय और आरुणि मिश्रा को

थ्री फिफ्टीन (कहानी)

आलोक नंदन बाहर के लौंडे कैंपस के अंदर रंगदारी करने आ ही जाते थे। सभी झूंड में होते थे, इसलिए उनसे कोई उलझता -नहीं था। किसी की भी साइकिल को छिन लेना और लप्पड़ थप्पड़ कर देना उनके लिए मामूली बात thi, सिगरेट के छल्ले उड़ाने जैसा। श्रेया पूरे कालेज की माल थी, चुपके-चुपके हर कोई उसको अपने सपनों की हीरोईन समझता था। कुछ ज्यादा बोलने वाले लौंडे ग्रुपबाजी में बैठकर आपस में ही श्रेया की खूब ऐसी तैसी करते थे, उसके नाकों में पड़ी नथ से लेकर उसके रूमाल तक की चर्चा होती थी। अब ये लौंडों की औकात पर निर्भर करता था कि कौन क्या बोलता है। उनकी बातों को सुनकर एसा लगता था कि कोका पंडित से लेकर कालीदास तक श्रेया के मामले में फेल हो जाते। प्रैक्टिकल रूम में हाथों में दस्तानों के साथ जार लिये लौंडों की बातें श्रेया की रेटिना से शुरू होकर कहां-कहां घूमती थी कोई नहीं जानता था। भोलुआ बाहरी था, लेकिन छूरा और गोली चलाने का उसका हिस्ट्री रिपोर्ट अंदर के प्रैक्टिकल से लेकर स्पोर्ट्स तक के लौंडों पर भारी पड़ता था। यदि गलती से वह किसी क्लास में घुस जाता था तो प्रोफेसर और लड़के यही सोचते थे कि कैसे जल्दी क्लास खत्म

सत्मेव जयते!!!!....लेकिन सच से कोई मरता है तो ?

पल्लवी की मौत की खबर फेसबुक पर दिखी। पुरी खबर को पढ़ा। खबर में लिखा था कि आगरा की रहने वाली पल्लवी ने सच का सामना में रुपा गांगुली वाला एपिसोड देखने के बाद आत्महत्या कर लिया। पूरे खबर को पढ़ कर यह स्पष्ट नहीं हो रहा था कि पल्लवी ने सच का सामना देखने बाद ही आतमहत्या किया है या नहीं। खबरों के मनोवैज्ञानिक प्रभाव के संदर्भ में पल्लवी का मामला मुझे एक गंभीर मामला लग रहा था। इसलिये इस खबर को और जानने के लिए मैंने नेट पर इधर-उधर सर्च करना शुरु कर दिया। नेट पर पल्लवी से संबंधित जितने भी खबर थे, सब की हेडिंग में इस बात का जिक्र था कि पल्लवी ने सच का सामना देखने के बाद आत्महत्या के लिए कदम उठाया। किसी कार्यक्रम को देखकर जब लोग मनोवैज्ञानिक तौर पर आत्महत्या करने के लिए प्रेरित होते हैं तो जनहित में उस कार्यक्रम पर सवाल उठना जरूरी है। इस घटना से संबंधित दो तथ्यों से स्थापित हो रहा है कि पल्लवी आत्महत्या करने के कगार पर सच का सामना में रूप गांगुली को देखने और सुनने के बाद पहुंची। अपने सुसाइड नोट में उसने लिखा है कि एक अच्छी मां, और अच्छी पत्नी नहीं बन सकी। खबरों के मुताबिक इसी तरह की बात रुपा गां

शब्द का संगीत

पिछले दिनों सम (सोसायटी फॉर एक्शन थ्रू म्यूजिक) और संगीत नायक पं 0 दरगाही मिश्र संगीत अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक सुरूचिपूर्ण सादगी भरे समारोह में पद्मभूषण डा 0 शन्नो खुराना ने दो महत्वपूर्ण सांगीतिक ग्रंथों का लोकार्पण किया. पहली पुस्तक भारतीय संगीत के नये आयाम - पं 0 विजयशंकर मिश्र द्वारा संपादित थी, जबकि दूसरी पुस्तक ‘ पं 0 विष्णु नारायण भातखंडे और पं 0 ओंकारनाथ ठाकुर का सांगीतिक चिंतन डा 0 आकांक्षी (वाराणसी) द्वारा लिखित. इस अवसर पर आयोजित पं 0 दरगाही मिश्र राष्ट्रीय परिसंवाद में विदुषी शन्नो खुराना, पं 0 विजयशंकर मिश्र (दिल्ली), मंजुबाला शुक्ला (वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान), अमित वर्मा (शान्ति निकेतन), डा 0 आकांक्षी, ऋचा शर्मा (वाराणसी) एवं देवाशीष चक्रवर्ती ने संगीत शिक्षा के क्षेत्र में पुस्तकों की भूमिका विषय पर शोधपूर्ण सारगर्भित व्याख्यान दिए. पं 0 विजयशंकर मिश्र ने परिसंवाद की रूपरेखा स्पष्ट करते हुए बताया कि सबसे पहले प्रयोग होता है, फिर उस प्रयोग के आधार पर शास्त्र लिखा जाता है और फिर उस शास्त्र का अनुकरण दूसरे लोग करते हैं. अक्षर शब्द

दिल्ली में बैठे-बैठे यूरोप की सैर

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गोथिक कला की बारीकियां बताने के लिए प्रदर्शनी 23 तक गोथिक कला की बारीकियों से दुनिया को परिचित कराने और इस पर अलग-अलग देशों में काम कर रहे लोगों को आपस में जोडऩे के लिए द इंस्टीच्यूटो सरवेंटस ने दिल्ली में प्रदर्शनी आयोजित की है। 23 अक्टूबर तक चलने वाली इस प्रदर्शनी संबंधी जानकारी एक प्रेसवार्ता में स्पेन शासन से जुड़े इंस्टीच्यूटो सरवेंटस के निदेशक ऑस्कर पुजोल ने दी। इस प्रदर्शनी में पांच भूमध्यसागरीय देशों की प्राचीन गोथिक स्थापत्य कला को देखा और समझा जा सकता है। ये देश हैं स्पेन, पुर्तगाल, इटली, स्लोवेनिया और ग्रीस। इन देशों के 10 भव्य आर्किटेक्चरल मॉडल यहां दिखाए जा रहे हैं। ऑडियो विजुअल प्रस्तुति में पैनल्स और विडियो के जरिये यूरोप की इस कला को दिल्ली में जिस भव्यता से पेश किया जा रहा है उसे देखकर लगता है कि आप सीधे यूरोप में बैठे भूमध्यसागरीय स्थापत्य कला के भव्य निर्माण निहार रहे हैं। आम लोग इस प्रदर्शनी में दिन के साढ़े 11 से शाम साढ़े 7 बजे तक आ सकते हैं। प्रदर्शनी का उदघाटन करते हुए संरक्षक आरटूरो जारागोरा ने कहा कि भूमध्यसागरीय निर्माण में गोथिक कला का असर साफ नजर आ

हिन्दी भूखड़ों की भाषा है

मेरे एक पत्रकर मित्र हैं, हिन्दी में एम किया है। अक्सर वह बोलते थे, अच्छा होता प्रेमचंद के बजाय शेक्सपीयर को पढ़ा होता। हिंदी पढ़कर तो किसी घाट के नहीं रहे। शुरु-शुरु में तो जिस भी अखबार में नौकरी करने गया, यही पूछा गया कि अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद कर लेते हो,कई जगहों पर तो अंग्रेजी न आने की वजह से नौकरी ही नहीं मिली। और मिली भी तो पैसे इतने कम मिलते थे कि समझ में नहीं आता था कि उससे घर का किराया दूं या फिर रोटी का जुगाड़ करूं। सौभाग्य से उस मित्र की शादी एक ऐसी लड़की से हो गई जो अंग्रेजी में एम ए कर रखी है। कभी-कभी फोन पर बात होती है तो उन्हें छेड़ देता हूं कि अब तो आपकी अंग्रेजी ठीक हो जानी चाहिये। वह हंसते हुये जवाब देते हैं कि अब अंग्रेजी ठीक करके ही क्या करूंगा। फिर वह थोड़ा गंभीर होकर कहते हैं कि आप मानिये या ना मानिये लेकिन हिंदी में पैसे नहीं है। यह भूखड़ों की भाषा है। मुंबई में बहुत सारी कंपनियां हैं। इनमें से अधिकतर अपना काम अंग्रेजी में करती हैं। जनसंपर्क वाले अभियान में यह हिंदी का तो इस्तेमाल करती हैं, लेकिन अंग्रेजी से अनुवाद की गई हिंदी का। नीति निर्धारण और प्रचार प्र

'सच का सामना' का सच

कुछ दिनों से टेलीविजन पर एक धारावाहिक दिखाया जा रहा है, जिसका नाम है ‘सच का सामना’। जिस प्रकार भारतीय संविधान में राजनेताओं के योग्यता की कोई लक्षमण रेखा नहीं निर्धारित की गई है उसी प्रकार टी.वी. चैनलों पर दिखाए जाने वाले धारावाहिकों के स्तर की कोई सीमा नहीं होती, वे किसी भी स्तर के हो सकते हैं, उसी स्तर का यह भी धारावाहिक है। किंतु जैसा कि बाजार में बिकाऊँ होने की शर्त विवादित होना है, न कि उच्च स्तरीय होना, उसी तरह यह भी धारावाहिक विवाद का केन्द्रविन्दु बनाया गया, जिसकी गूँज संसद तक पहुँची और जिसको सभी टी.वी. चैनलों ने तेज़ी से लपका।संसद में बहस छिड़ गई कि इस पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।क्यों कि सच का सामना करने से सबसे ज्यादा अगर कोई घबराता है तो राजनेता । जिस दिन सरकार बदलती है उसी दिन विपक्ष को एक साथ ढेरों सच का सामना करने की आशंका सताती है। सत्ता पक्ष के पिटारे से कई ऐसे जाँच के विषय निकलते हैं, जिससे न केवल सत्ता का संतुलन बनाने में सहायता मिलती है बल्कि वे समर्थन जुटाने के भी काम आते हैं । यह आशंका जताई गई कि यदि किसी दिन राजीव खंडेलवाल ने मंत्री या सत्ता पक्ष के राजनेता को सच का

मेरा चैन -वैन सब

(दूसरी और अन्तिम किश्त ) दसवीं जमात में नम्बरों के चक्कर में एक निबन्ध याद किया था - “ साहित्य समाज का दर्पण होता है। “ परीक्षा में साहित्य समाज ..... धोखा दे गया । नम्बर नहीं आए पर यह रट्टा अब काम आया है। बरात में खाना ज्यादा खाया था , सो नींद नहीं आई।अन्ततः सीरियस होना पड़ा और देश की दशा पर चिन्ता होने लगी। साहित्य समाज का दर्पण होता है इसलिए चैन - वैन असलियत में उजड़ा होगा ! आगे का वर्णन सच्चाई से बिलकुल मेल खाता है - बरबाद हो रहे हैं जी ये तेरे श हर वाले ...... । अभी पूरी तरह बरबाद नहीं हुए हैं। हाँ , कुछ दिन में हो जाएंगे। अभी मकान के पहले माले ही तोड़े गए हैं , ताले उन्हीं दुकानों में जड़े गए हैं जिनका राष्ट्रीय विकास में कोई विशिष्ट योगदान नहीं है। और तो और , हेराफेरी और जमाखोरी में भी निकम्मे साबित हुए हैं। गर्मी ठीक से नहीं पड़ रही है इसलिए पानी कभी-कभी आ ही जाता है। वर्मा जी मूली खरीदने गए थे; अत्याधुनिक आविष्कारों का लाभ प्राप्त हो गया-आर

रंगकर्मी श्री संजय खन्ना का निधन

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इयत्ता के ब्लोगर और पाठक मेरे पूर्व के पोस्ट ३१ अगस्त २००९ ' परसाई जन्मोत्सव ' को पुनः पढ़े । मैंने उसमें रंग मंडल के कलाकारों द्वारा परसाई की प्रसिद्द कृति ‘ इंसपेक्टर मातादीन ’ का खूबसूरत मंचन खुले मैदान पर' की सूचना दी थी, जिसमें शहर के रंगकर्मी ने खूबसूरत प्रस्तुति दी थी । आज बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि जबलपुर ही नही देश के युवा रंगकर्मी, निर्देशक, नर्तक एवं कोरियोग्राफ़र श्री संजय खन्ना का गुरुवार को पश्चिम बंगाल में हृदयाघात से निधन हो गया । वे ४३ वर्ष के थे। वे एक समारोह में भाग लेने हुबली गए थे । उन्होंने अपनी रंग प्रतिभा को सामजिक विसंगतियों के विरोध के लिए प्रयोग किया । उन्होंने रचना संस्था की स्थापना की । विवेचना और वेवेचना रंगमंडल के साथ कई नाटकों में काम कर अपनी अभिनय दक्षता की स्थापित किया । श्री संजय खन्ना लोकनृत्य एवं लोक नर्तकों में फूजन पैदा कर उसे कोरियोग्राफ करने के लिए जाने जाते थे । २५ मई १९९९ में मुंबई चले गए और वहां अपनी गतिविधियाँ जारी रखीं । सासाराम बैंडर, मिटटी की गाड़ी, हुई वे वाही जो राम रची राखा, मोटेराम का सत्याग्रह, इसुरी, भगवत अज्ज

चेहरा-विहीन कवि नहीं हैं दिविक रमेश : केदार

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कविता संग्रह 'गेहूं घर आया है' का दिल्ली में लोकार्पण ‘आधुनिक हिंदी कविता में दिविक रमेश का एक पृथक चेहरा है. यह चेहरा-विहीन कवि नहीं है बल्कि भीड़ में भी पहचाना जाने वाला कवि है. यह संकलन परिपक्व कवि का परिपक्व संकलन है और इसमें कम से कम 15-20 ऐसी कविताएँ हैं जिनसे हिंदी कविता समृद्ध होती है. इनकी कविताओं का हरियाणवी रंग एकदम अपना और विशिष्ट है. शमशेर और त्रिलोचन पर लिखी कविताएं विलक्षण हैं. दिविक रमेश मेरे आत्मीय और पसन्द के कवि हैं.’ ये उद्गार प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह ने किताबघर प्रकाशन से सद्य: प्रकाशित कवि दिविक रमेश के कविता-संग्रह ‘ गेहूँ घर आया है ’ के लोकार्पण के अवसर पर कहे। विशिष्ट अतिथि केदारनाथ सिंह ने इस संग्रह को रेखांकित करने और याद करने योग्य माना. कविताओं की भाषा को महत्वपूर्ण मानते हुए उन्होंने कहा कि दिविक ने कितने ही ऐसे शब्द हिंदी को दिए हैं जो हिंदी में पहली बार प्रयोग हुए हैं. उन्होंने अपनी बहुत ही प्रिय कविताओं में से ‘पंख’ और ‘पुण्य के काम आए’ का पाठ भी किया. इस संग्रह का लोकर्पण प्रोफेसर नामवर सिंह , प्रोफेसर केदारनाथ सिंह और प्रो

मेरा चैन -वैन सब

( थोड़ा सा भूतकाल में चलें ,चार - पाँच साल पहले जब इस मुखडे की धूम थी .तब यह व्यंग्य लिखा गया था और प्रकाशित हुआ था .) मैं पिछले कई महीने से असमंजस की स्थिति में हूँ। मैं ही क्या , पूरा देश ही ऐसी स्थिति में है। अन्तर सिर्फ इतना है कि देश को ऐसी स्थिति में रहने का लम्बा अनुभव है , जबकि मेरे लिए यह नया अवसर है।इसीलिए कुछ बेचैनी हो रही है मुझे।वस्तुतः इस बेचैनी के पीछे मेरे अज्ञान का ही हाथ है। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि इस समय अपना देश, अपना समाज खुश है या दुखी ? भ्रम की स्थिति बनी हुई है। जिधर देखिए, एक ही स्वर गूंज रहा है- मेरा चैन वैन सब उजड़ा.......। इस स्वर के गूंजते ही चेहरे पर रौनक आ जाती है- गोया बहुत बड़ी खुषखबरी मिल गई हो! क्षण भर को भागम-भाग,रेलम-पेल ठहर जाती है।सारी ताकत बटोरकर बन्दा अपने आप को नियन्त्रित करता है,अर्थात फिर भीड़ में घुसता है तो उसकी भी रागिनी फूट पड़ती है- मेरा चैन वैन सब उजड़ा। चैन उजड़ने जश्न पूरे जुनून पर है। यह सिद्ध करना है कि मेरा चैन सबसे ज्यादा उजड़ा है। आप इस बात को सिद्ध भी कर सकते हैं ,बशर्ते आप गर्दभ राग के विशेषज्ञ हों। सभी का चैन उजड़ा है

गुरुओं को अक्सर लठैतों की भूमिका में ही देखा

स्कूल में गुरुओं को मैंने अक्सर लठैत की भूमिका में ही देखा, कब किस बात पर ठोक दे पता ही नहीं चलता था, ऊपर से तुर्रा यह कि गुरु की पिटाई को आर्शिवाद समझना चाहिये। मैथ का एक लंगड़ा टीचर तो इतना मरखंड था कि बाप रे बाप....आज भी उसके बारे में सोंचता हूं तो हड्डी में सिहरन होती है। एक मोटा सा रूल हमेशा उसके हाथ में होता था, और जिस गति से उसका रूल चलता था उसे देखकर यही लगता था कि बचपन में इसके गुरू ने भी इसकी खूब धुलाई की होगी, बिना तोलमोल के। मारकूट के बच्चों को पढ़ाने की अदा निराली थी। लेकिन चकचंदा के दिन उसकी नरमी देखते बनती थी। छोटे से कस्बे में गुरुदक्षिणा के नाम पर यह सार्वजनिक वसूली का दिन होता था। सुबह से उसके होठों पर रसगुल्ले टपकते रहते थे। सभी छात्रों को इकठ्ठा करके द्वार-द्वार जाता था और मोटा धन समेटने की जुगाड़ में रहता था। आंटा, चावल, दाल, चना, साग-सब्जी जो कुछ मिलता था सब समेट लेता था और उसे गधे की तरह ढोने के काम पर बच्चों को लगा देता था। अब शिक्षक दिवस पर एसे गुरुओं की याद आने लगे तो, मैं क्या कर सकता हूं, सिवाये ब्लोगियाने के। कस्बा छूटा, शहर छूटा और नये शहर में गया। स्कूल क

शहनाई भी होएगी

रतन फूलों की महकेगी खुशबू पुरवाई भी होएगी तारों की बारातें होंगी शहनाई भी होएगी पतझड़ बाद बसंती मौसम का आना तय है जैसे दर्द सहा है तो कुछ पल की रानाई भी होएगी कोई नहीं आया ऐसा जो रहा सिकंदर उम्र तलक इज्जत होगी शोहरत के संग रुसवाई भी होएगी तन्हा रहते गुमसुम गुमसुम पर यह है उम्मीद हमें कुछ पल होगा साथ तुम्हारा परछाई भी होएगी मैंने जाना जीवन-दुनिया सब कुछ आनी-जानी है सुख का समंदर भी गुजरेगा तनहाई भी होएगी

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