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विरह का पर्याय ‘बिरही बिसराम’

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हरिशंकर राढ़ी किसी भी देश या भाषा के साहित्य की मजबूती उसके लोकसाहित्य पर टिकी होती है। लोक ही साहित्य का मूल आधार होता है; लोक से कटकर साहित्य अपनी आत्मा गँवा देता है। परिष्कृत साहित्य में यदि लोकचेतना न हो, लोक की अनुभूतियाँ न हों तो वह बौद्धिक जुगाली मात्र रह जाता है। लोकसाहित्य व्याकरण या प्रस्तुतिकरण में अमानकीकृत हो सकता है, किंतु अनुभूतियों एवं सहजता में अतुलनीय होता है। लोकभाषा का सोता अंदर से आता है और पूरा प्रभाव लेकर आता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो भोजपुरी भाषा एवं साहित्य बहुत ही समृद्ध और मनमोहक है, यह बात अलग है प्रगतिशीलता की दौड़ में बहुत सी अच्छी बातें पीछे छूट गई हैं। समय के प्रवाह में न जाने कितने लोककवि विस्मृत हो गए या विस्मृत कर दिए गए। सभ्यता की चकाचौंध में मातृ भाषाएँ हीनताबोध पैदा करने लगीं; चटकारा साहित्य उदीयमान और प्रकाशमान होने लगा। भाषा को आर्थिक स्तर से जोड़कर देखा जाने लगा। भिखारी ठाकुर, भोलानाथ गहमरी, महेंदर मिसिर जैसे न जाने कितने ज्ञात-अज्ञात कवियों की भाषा भोजपुरी आज के लालची, अबोध और स्तरहीन कवि-गायकों के कारण अश्लीलता का पर्याय बनती जा रही है।...

जहर से जहरीली अपसंस्कृति

भोजपुरी गायकी की अपनी एक समृद्ध परंपरा रही है. लोक में भी और शास्त्र में भी. नाम गिनाने बैठें तो चुनना कठिन हो जाएगा कि किनका नाम लूँ और किन्हें छोड़ूं. लेकिन यह परंपरा तभी तक सुरक्षित थी जब तक भोजपुरी बजार की चीज नहीं हुई थी और बजार की चीज बनने से यह पटना छाप कैसेट कंपनियां आने तक बची रही. जैसे ही पटना वाली कुछ कैसेट कंपनियां आईं और उन्होंने लोक गायकी के नाम पर पॉप से भी फूहड़ और निहायत अश्लील सोनपुर मेले वालों और वालियों को पकड़ना और उनको रेकॉर्ड करके बजार में भाठना शुरू किया , वहीं से सारी गरिमा जाती रही. इन्होंने बाजार के सारे टोटके अपनाते हुए अपनी रीच बढ़ाई और बसों से लेकर ट्रकों और दिल्ली से लेकर पंजाब , मुंबई और अहमदाबाद तक इनकी धमक सुनाई देने लगी. ऐसा नहीं है कि भोजपुरी पट्टी से बाहर के बड़े शहरों में पहले कभी भोजपुरी गायकी की मिठास नहीं सुनाई देती थी. पहले भी सुनी जाती थी. लेकिन वह मिठास विशुद्ध लोक की थी. इसमें चैता , फगुआ , कजरी जैसे मौसमी और छठ , नहान , सतुआन , रामनवमी जैसे पर्वों या भक्ति के गीत शामिल होते थे. अवसर के अनुसार बियाह , जनेऊ और सोहर भी. गा...

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