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निज़ामाबाद और शीतला माता

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हरिशंकर राढ़ी  शीतला माता मंदिर निज़ामाबाद (आजमगढ़ )       छाया : हरिशंकर राढ़ी  हमारे देश में न जाने कितने ऐसे धार्मिक स्थल हैं जहाँ विशाल संख्या में श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। इससे न केवल आमजन का पर्यटन हो जाता है , अपितु उन स्थानों पर हजारों लोगों की जीविका का साधन बनता है। ऐसा ही एक धार्मिक स्थल आजमगढ़ के निज़ामाबाद में स्थित शीतला माता का मंदिर है। निज़ामाबाद आजमगढ़ जनपद के लगभग मध्य में है। सुना बहुत था , जाने का संयोग कभी नहीं बना। हरी-भरी फसलों के बीच प्रकृति के वैभव का आनंद लेते हम निजामबाद स्थित शीतला माता के मंदिर पहुँच गए। यहाँ मेरा आना पहली बार हुआ। प्रथम दृष्टि   ही विश्वास हो गया कि इस मंदिर पर श्रद्धालुओं का आना-जाना बड़ी संख्या में होगा। कुल मिलाकर ग्रामीण परिवेश में बड़ा प्रंागण। हरे-भरे छायादार वृक्ष और प्रसाद बेचने वालों के अनगिनत ठीहे। हिंदू धर्म में लगभग सभी देवी-देवताओं के दिन निश्चित किए हुए हैं। देवी दुर्गा से संबंधित दिन प्रायः सोमवार या वृहस्पतिवार माना जाता है। जहाँ इतने देवी-देवता होंगे , ऐसी व्यवस्था बनानी ही प...

मेरी चीन यात्रा - 5

कृपया यात्रा वृत्तांत को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ चटका लगाएं : पहली , दूसरी , तीसरी और चौथी किस्त. डॉ. अरविंद मिश्र विमान चेंगडू के बजाय करीब 300 किमी दूर आपात स्थिति में दूसरे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे चेंगक्विंग पर उतरा था। अभी सूर्योदय में देर थी। कई चीनी यात्री जो निद्रामग्न थे अब जल्दी-जल्दी उठ रहे थे। उन्हें लगा कि उनका गंतव्य आ गया। किंतु तब तक उनके सहयात्रियों को यह पता हो गया था कि विमान कहीं अन्यत्र खड़ा है। धीरे-धीरे जो शोर उठा अब हो-हल्ले में तब्दील हो रहा था। गैर चीनी यात्री , हम सब भी व्यग्र थे कि अब क्या होगा ? आखिर विमान के मुख्य कप्तान ने कमान संभाली। अंग्रेजी में पूरी स्थिति बयां की। उनके अनुसार चेंगडू हवाई अड्डे के ग्राउंड नैविगेशन ने खराब मौसम में उतरने की अनुमति नहीं दी जबकि कप्तान ने कई बार अनुमति मांगी और वहीं आधे घंटे से अधिक मंडराता रहा। कप्तान ने यहां तक कहा कि उन्हें जीरो विजिबिलिटी में विमान उतारने में दक्षता हासिल है मगर उतरने की अनुमति नहीं मिली। मुझे लग रहा था कि जो बात कप्तान संकेतों में समझाना चाह रहे थे वह यह थी कि इंडिगो सेवा में या उनक...

मेरी चीन यात्रा - 3

कृपया यहाँ चटका लगाएं: इस यात्रा वृत्तांत की पहली और दूसरी किस्त   पढ़ने के लिए डॉ. अरविंद मिश्र   चेंगडू (चीन) के लिये इन्डिगो का विमान रात दस बजे उड़ने को तैयार था। यह लगभग चार घंटे की उड़ान के बाद चेंगडू सुबह चार बजे पहुंचने वाला था। दरअसल चेंगडू और नई दिल्ली के वक्त में ढाई घंटे का फर्क है। मतलब यहां जब रात के दो बजते तो चेंगडू में सुबह का साढ़े चार होता। सही समय पर विमान उड़ चला। अभी यही कोई बीस पचीस मिनट हुए थे कि एकदम आगे की दाहिनी ओर की सीट पर कुछ हलचल सी होने लगी। एक गगन परिचारिका वहां पहुंच कर सिचुयेशन समझने की कोशिश कर रही थी। और पीछे की कुर्सियों पर के लोग उचक-उचक अपनी जिज्ञासा दूर करने के उपक्रम कर रहे थे। मुझे कुछ अनहोनी की आशंका बल्कि यों कहिए कुछ अशुभ लक्षण का आभास होने लगा। अब परिचारिका एक मिनी आक्सीजन सिलेंडर दौड़ के लाई और संभवतः उस यात्री को आक्सीजन देने लगी। मेरी सीट की छठवीं कतार थी इसलिए कुछ खास समझ में तो आ नहीं रहा था मगर गतिविधियां किसी गंभीर स्थिति की ओर इशारा कर रहीं थीं। अब पूरा विमान परिचारक स्टाफ स्थिति को संभालने में जुट गया था। ...

मेरी चीन यात्रा - 2

विज्ञान कथाकार और ब्लॉगर डॉ. अरविंद मिश्र की चीन यात्रा की पहली कड़ी आप पढ़ चुके हैं. यह उसकी दूसरी कड़ी. जिन्होंने पहली कड़ी नहीं पढ़ी वे यहाँ से पढ़ सकते हैं.   डॉ. अरविंद मिश्र  बीस नवंबर की सुबह 9 बजे बेटे के साथ सबसे पहले करीब ही देवीनगर निवासी डा. श्रीनरहरि को लेकर हम केम्पेगौड़ा अन्तरराष्ट्रीय एअरपोर्ट बंगलौर की ओर चल पड़े। निकलते वक्त डा. श्रीनरहरि की धर्मपत्नी ने मुझे अलग से नाश्ते के लिये उपमा और लंच के लिये आलू के पराठे पैक कर दिये थे और यह हिदायत भी कि आप लोग एक दूसरे का ध्यान रखियेगा। बेटा कार अच्छी ड्राइव करता है। पैतालिस मिनट में हम एअरपोर्ट पहुंच गए। दिल्ली के लिए प्लेन साढ़े बारह बजे था। हम समय से थे। मेरे पास सामान के नाम पर एक छोटी सी स्ट्राली और बैकपैक था मगर श्रीनरहरि के पास दो बड़े सूटकेस जिनमें एक में तो अन्तरराष्ट्रीय प्रदर्शनी के लिए भारतीय विज्ञान कथा की कई भाषाओं की प्रतिनिधि चुनिंदा पुस्तकें थीं , शेष में उनके खाने पहनने के सरो सामान थे। एक बैकपैक अलग था। मैं लम्बी यात्राओं में कम से कम सामान ले जाने का हिमायती रहा हूं। यह आपकी यात्रा के बो...

डॉ. अरविंद मिश्र की चीन यात्रा -1

विज्ञान कथाकार और ब्लॉगर डॉ . अरविंद मिश्र पिछले दिनों चीन गए थे। उनका यह सफर एक वैज्ञानिक सम्मेलन के उद्देश्य से था। अपना पूरा वृत्तांत उन्होंने फेसबुक पर लिखा। यह वृत्तांत जितना रोचक है , चीन की सीलबंद सभ्यता-संस्कृति को बाहर से जितना देखा जा सकता है , उस लिहाज से ज्ञानवर्धक भी। मेरा अपना अनुभव यह है कि चीनी आदमी के मन की टोह लेना बड़ कठिन काम है। इसकी कई वजहें हैं। सबसे पहली तो भाषा ही है। चीन में अंग्रेजी उतनी प्रचलित नहीं है जितनी भारत में। ऊपर से बोलने का उनका ढंग बिलकुल अलग है। उनकी अंग्रेजी पर भी चीनी उच्चारण का प्रभाव इतना अधिक है कि उसे समझना लगभग टेढ़ी खीर है , बगुले से भी ज्यादा। आम जनमानस पर प्रशासन का भय इतना अधिक है कि मार्केटिंग के बंदों से भी ज्यादा कृत्रिम मुस्कान उन्हें अपने चेहरे पर हमेशा चिपकाए रखनी पड़ती है। इस यात्रा में पंडित जी ने एक बेईमानी भी की है। चीनी खानपान के नाम पर बच्चों के विशेष आग्रह के बावजूद भौजाई को इस बहाने नहीं ले गए कि वे कट्टर शाकाहारी हैं। भला वहाँ कैसे जिएंगी। मेरे जैसा वेगन [वेजटेरियन से भी एक कड़ी आगे और जिसकी शाकाहार में बहुत सीमित ...

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निज़ामाबाद और शीतला माता

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