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सफ़ाई : एक गहन चिंतन

इष्ट देव सांकृत्यायन आजकल सफ़ाई की बड़ी धूम है। जिसे देखिए वही, सफ़ाई के पीछे पड़ा हुआ है। नेता से लेकर लेखक, पत्रकार, शिक्षक, बाबू और अफ़सर तक सभी सफ़ाई की ही बातें कर रहे हैं। कोई समर्थन में तो कोई विरोध में, पर चर्चा सभी सफ़ाई की ही कर रहे हैं। समर्थन वे कर रहे हैं जिन्हें पहले कभी सफ़ाई का मौक़ा नहीं मिला, विरोध में वे हैं जो पहले ही काफ़ी सफ़ाई कर चुके हैं और मानते हैं कि जितनी सफ़ाई वे कर चुके हैं, उसी के प्रभाव से उबर पाना अभी देश के लिए अगले सौ वर्षों तक संभव नहीं होगा। हालाँकि पहले से चले आ रहे सफ़ाई तंत्र में उनकी पैठ इतनी गहरी है कि उनको सफ़ाई की प्रक्रिया से पूरी तरह साफ़ कर देने की तो कभी कल्पना ही नहीं की जा सकती, पर इन दिनों मामला थोड़ा नरम चल रहा है। बिलकुल वैसे ही जैसे हाल ही में आई मंदी के दौरान हमारे देश के व्यापार के साथ हुआ था। हमारे जैसे चिरकुट टाइप थर्डक्लासियों के दम पर चलने वाले देसी बैंक सूखा रोग के शिकार हुए और उधर स्विस बैंकों को अपच होने लगी। असल में यह भी सफ़ाई का ही नतीजा था। जब आप एक जगह सफ़ाई करते हैं तो जो कूड़ा निकलता है उसे कहीं न कहीं डाल...

चिंता से चतुराई घटे

इष्ट देव सांकृत्यायन भारत हमेशा से एक चिंतनप्रधान देश रहा है। आज भी है। चिंतन की एक उदात्त परंपरा यहाँ सहस्राब्दियों से चली आ रही है। हमारी परंपरा में ऋषि-मुनि सबसे महान माने जाते रहे हैं, इसका सबसे महत्वपूर्ण कारण यही रहा है कि वे घर-बार सब छोड़ कर जंगल चले जाते रहे हैं और वहाँ किसी कोने-अँतरे में बैठकर केवल चिंतन करते रहे हैं। चिंतन से उनके समक्ष न केवल ‘इस’, बल्कि ‘उस’ लोक के भी सभी गूढ़तम रहस्य खुल जाते रहे हैं, जिसे वे समय-समय पर श्रद्धालुओं के समक्ष प्रकट करते रहे हैं। अकसर उनके चिंतन से बड़ी-बड़ी समस्याओं का समाधान भी निकल आता रहा है। कालांतर में चिंतन से एक और चीज़ प्रकट हुई, जिसे चिंता कहा गया।  हालांकि यह चिंतन से अलग है, यह समझने में थोड़ा समय लगा। बाद में तो यहाँ तक पता चल गया कि यह चिंतन से बिलकुल अलग है, इतना कि चिंतन जितना फ़ायदेमंद है, चिंता उतनी ही नुकसानदेह। मतलब एक पूरब है तो दूसरी पश्चिम। इनमें एक पुल्लिंग और दूसरे के स्त्रीलिंग होने से इस भ्रम में भी न पड़ें कि ये एक-दूसरे के पूरक हैं। वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं है। ये कुछ-कुछ वैसा ही मामला है, जैसे क...

पत्रकार, गिरगिट और झाड़ू की सींक

घर से निकला ही था कि देखा, मेरी फटफटिया के सीट पर गिरगिट जी विराजमान हैं. मैंने पूछा - कौन हैं सर आप? यहां कैसे विराज रहे हैं? आप तो इसे शायद चला भी नहीं पाएंगे?  उन्होंने मेरे किसी भी सवाल का जवाब देने के बजाय उलटा सवाल ठेल दिया - जर्नलिस्ट हो क्या बे? एक साथ इत्ते सारे सवाल .... और पहचानते भी नहीं मुझे?  मैंने कहा - हूं तो, पर आपने जान कैसे लिया?  'बिना सोचे-समझे इत्ते सारे सवाल कोई जर्नलिस्ट ही कर सकता है', उनका जवाब था, 'गनीमत है कि तुम प्रिंट मीडिया वाले लगते हो.' मैं तो हैरान, 'आप तो महाज्ञानी हैं सर! ये भी आपने कैसे जान लिया...?' 'इसलिए कि तुम प्रासंगिक सवाल कर रहे हो. माइक-कैमरा वाले होते तो सवाल-जवाब दोनों के सिर-पैर से तुम्हारा कोई मतलब नहीं होता.' 'वाह! आप तो केवल अंतर्यामी ही नहीं, बुद्धिजीवी भी लगते हैं. ऐसी तार्किक सोच तो ज्ञानीजनों में भी दुर्लभ है.' मैंने स्तुति में नतमस्तक होते हुए अपनी शंका उनके समक्ष रखी, 'हे सर, अब तो अपना परिचय दें.'  ‘अरे मूर्ख, अब तक नहीं पहचाना मुझे? मैं वही हूं जिसे 49 सर ने अपने चुनाव चिन्ह के र...

आक्थू !!!

इष्ट देव सांकृत्यायन  कहीं पान खाकर, तो कहीं गुटखा, कहीं तंबाकू खाकर और कहीं बिन कुछ खाए, ऐसे ही ... बेवजह... आक्थू! कहीं कूड़ा देखकर, तो कहीं गंदगी और कहीं बिन कुछ देखे ही, ऐसे ही मन कर गया..... लिहाज़ा .... आक्थू! चाहे रास्ता हो, या कूड़ेदान, स्कूल हो या तबेला, रेलवे या बस स्टेशन हो या फिर हवाई अड्डा, यहाँ तक कि चाहे बेडरूम हो या फिर तीर्थ ... जहां देखिए वहीं … आक्थू! हमारे लिए थूकदान कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे कहीं से ढोकर लाना या फिर किसी प्रकार का श्रम करना ज़रूरी हो। हम थूकने की क्रिया में असीम श्रद्धा और विश्वास के कारण जहां चाहते हैं वहीं और जिस चीज़ को चाहते हैं उसे ही अपनी सुविधानुसार थूकदान बना लेते हैं। शायद यही वजह है कि जिस तरह दूसरे देशों में हर मेज़ पर ऐश ट्रे यानी राखदान पाई जाती है, वैसे ही हमारे यहाँ कुछ सफ़ाईपसंद घरों में पीकदान या थूकदान पाया जाता है। यह अलग बात है कि वहाँ भी थूकदान का इस्तेमाल थूकदान की तरह कम ही होता है। यहाँ तक कि ख़ुद वे लोग भी, जो घर में सफ़ाई के मद्देनज़र थूकदान रखते हैं, बाहर निकलने पर सफ़ाई का ध्यान रखना ग़ैर ज़रूरी ही नहीं, ल...

मैंगो मैन का बनाना रिपब्लिक

इष्ट देव सांकृत्यायन भारतीय स्त्री को अगर कोई चीज़ सबसे ज़्यादा पसंद है तो वह है सोना. केवल क्रिया ही नहीं , संज्ञा और यहां तक कि विशेषण के रूप में भी. मेरे एक मामाजी तो कहा करते थे कि महिला लोगों का अगर वश चले तो पति को भी बेच कर सोना ख़रीद लें. जहां तक बात पति टाइप लोगों की है , तो वे उनकी सोने की मांग को केवल क्रिया के रूप में ही समझना चाहते हैं. लेकिन वाक़ई सोना कितना ज़रूरी है और आम आदमी के लिए इसकी कितनी अहमियत है , यह बात अब जाकर समझ में आई. तब जब भारत सरकार ने तय कर लिया है कि वह आम आदमी से सोना ख़रीदेगी. पहले तो मुझे लगा कि यार मैं भी आम आदमी हूं और इस लिहाज़ से मुझे भी   सोना बेचना चाहिए. जब सरकार ही ख़रीदेगी तो ज़ाहिर है कि अच्छा दाम देगी. श्रीमती जी से कहा कि सरकार सोना ख़रीदने की बात कर रही है , ऐसा करते हैं कि हम लोग भी कुछ बेच देते हैं. इतना कहना था कि श्रीमती जी फायर हो गईं , ‘ आप क्या समझते हैं , आपका पड़े-पड़े सोना सरकार ख़रीदेगी ? अगर क्रिया में सोना सरकार को ख़रीदना होता तो उसके लिए उसे जनता से गुहार लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ती. इसके लिए उसकी पुलिस ही...

कस्तूरी कुंडल बसै...

इष्ट देव सांकृत्यायन   पता नहीं , भ्रष्टाचार जी ने कुछ लोगों का क्या बिगाड़ा है जो वे आए दिन उनके पीछे ही पड़े रहते हैं। कभी धरना दे रहे हैं कि भ्रष्टाचार मिटाओ , कभी प्रदर्शन , नारेबाजी , रास्ताजाम... और न जाने क्या-क्या! कभी दिल्ली का रामलीला मैदान भर डाला और कभी जंतर-मंतर पर लोगों का आना-जाना दुश्वार कर दिया। ख़ैर , भ्रष्टाचार जी को इससे फ़र्क़ ही क्या पड़ता है! उन्होंने ऐसे बहुत लोगों को आते-जाते देखा है। इसीलिए तो वह पूरे आत्मविश्वास के साथ गाते रहते हैं , ' तुमसे पहले कितने जोकर आए और आकर चले गए/कुछ जेबें भरकर गुज़र गए कुछ जूते खाकर चले गए ....’ । एक वही हैं जिनके लिए जाने कहां से लगातार यह सदा आती रहती है , ' वीर तुम बढ़े चलो/धीर तुम बढ़े चलो/.... सामने पहाड़ हो/ सिंह की दहाड़ हो/ तुम निडर हटो नहीं/ तुम निडर डटो वहीं... ’ । फ़ि लहाल तक की हिस्ट्री तो यही है कि उन्हें भगाने जितने आए , ख़ुद ही चले गए। अब यह अलग बात है कि चले जाने के सबके अपने अलग-अलग तरी क़े थे। कुछ तोप चलाकर चले गए , कुछ जांच कराकर चले गए , कुछ हल्ला मचाकर चले गए , कुछ इलेक्ट्रॉनिक कैंपेन चलाकर चल...

बात का मर्म

इष्ट देव सांकृत्यायन लोकतंत्र न हुआ, मुसीबत हो गई। किसी महामानव ने कुछ कहा नहीं कि बवाल शुरू। गोया बड़े लोगों को बेवजह छोटा बनाने और उन्हें भी अपनी ही औकात में लाने का सबको पूरा ह$क मिल गया हो। पांच साल में एक बार बड़े लोग मंच से हाथ क्या जोड़ लेते हैं, लोगों का मन इतना बढ़ जाता है कि वे उन्हें हमेशा हाथ जोड़े ही देखते रहना चाहते हैं। भूल ही जाते हैं कि सरकार और सरकारी अफसरों के शासक के बजाय सेवक होने की बात किताब में केवल लिखे जाने के लिए लिख दी गई है। असलियत से उसका संबंध उतना ही है, जितना राजनीति का नीति और डिग्री का योग्यता से। मुझे ठीक-ठीक याद है गर्मी नहीं, जाड़े के दिन थे वे। वह भी ऐसा जाड़ा कि लोगबाग परेशान। दिन में धूप भले निकल आए, पर रात एकदम सर्द। ऊपर से हर तीसरे दिन बारिश और उसमें ओलापात भी। इधर बजट आया, उसने सर्दी से भी ज्य़ादा लोगों के हाथ-पांव टैक्सों के ज़रिये सुन्न कर दिए। भिन्न-भिन्न प्रकार के नेतृत्वविलीन और नेतृत्वविहीन आंदोलनकारियों की पिछले तीन-चार वर्षों में जो दशा हुई, उसने जोशे-जवानी को ठंडई में पहले ही बदल दिया था। माहौल में ऐसा कुछ भी नहीं था, जि...

जमूरियत तरक्की पर

- ऐ जमूरे! - हां उस्ताद. - खेल दिखाएगा? - दिखाएगा. - जो कहेगा, करेगा? - करेगा, बिलकुल करेगा. काहें नईं करेगा उस्ताद? - ओह! तू तो उल्टा सवाल करने लगा बे. लगता है आज बड़ी तड़ी में है! - तड़ी में अपन क्या खा के होएंगा उस्ताद? अपन तो बस तुम्हारे हुकुम का ग़ुलाम है. जो बोलेगा करेंगा. - अच्छा. तो जो बोलेंगा, वो तू करेंगा? - हां, बिलकुल करेंगा उस्ताद. आख़िर पापी पेट का सवाल है. - हुंह! अच्छा तो चल  चाकू निकाल. - निकाला उस्ताद. - अब चल जिबह कर. - किसे उस्ताद? - वो जो दो अंगुल का जीव दिखता है न, उसी को. - क्यों उस्ताद? - सुन ज़्यादा सवाल मत किया कर. ये जमूरियत के लिए नुकसानदेह होता है.  - ओह! माफ़ करना उस्ताद. तू ठीक कहता है. जमूरियत में तो सवाल करने के भी पैसे लगते हैं.  - पर चल, तू पूछता है तो अपन बता देता है. असल में तो वो पहले से ही बेजान है.  - कैसे पता उस्ताद? -बेवकूफ़, तूने फिर सवाल किया. -ओह! ग़लती हो गई. माफ़ करुं उस्ताद. आइन्दा नहीं करेगा. - अच्छा चल माफ़ किया. अब पूछ ही लिया है तो जान ले. देख, वो अगर जानदार होता तो क़ानून-फ़ानून इंसानियत-फिंसानियत जैस...

लड़की पटेगी

इष्ट देव  सांकृत्याय न  भारत के बारे में जितने निष्कर्ष हम जानते हैं और जितने निष्कर्षों पर जी-जान से भरोसा करते हैं , वे सारे किसी न किसी विदेशी मूल के आदमी के निकाले हुए हैं। मामला चाहे संस्कृत के वैज्ञानिक भाषा होने का हो , या फिर योगा के फ़ायदे का। योगा जब तक योग था तब तक हम उस पर क़तई यक़ीन नहीं करते थे। अव्वल तो असली भारतीय आज भी उस पर यक़ीन नहीं करते। अंग्रेजी पद्धति के इलाज में सच्चे भारतीयों का पूरा भरोसा है। वे क़ब्ज़ से मुक्ति पाने के लिए ईसीजी और बुख़ार के लिए अल्ट्रासाउंड कराना और उससे ठीक होने की उम्मीद में लाखों रुपये ख़र्च करते जाना पसंद करते हैं , लेकिन आसन-प्राणायाम की जहमत उठाना उन्हें अपनी तौहीन लगती है। ठीक भी है। जिस काम पर कोई ख़र्चा ही न हो , उससे अपना स्टेटस तो गिरता ही है। वैसे   ख़र्चे से स्टेटस नापने की परंपरा हमारे यहां बहुत पुरानी है , लेकिन यह खोज भी अल्ट्राव्हाइट रेवोल्यूशन यानी उदारीकरण के बाद आई विदेशी कंपनियों के एमबीए डिग्री होल्डर मार्केट रिसर्चरों ने की। हमारे पास कोई चारा नहीं है सिवा इसके कि हम उस पर य $ कीन करें , क्योंकि व...

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