जमूरियत तरक्की पर

- ऐ जमूरे!
- हां उस्ताद.
- खेल दिखाएगा?
- दिखाएगा.
- जो कहेगा, करेगा?
- करेगा, बिलकुल करेगा. काहें नईं करेगा उस्ताद?
- ओह! तू तो उल्टा सवाल करने लगा बे. लगता है आज बड़ी तड़ी में है!
- तड़ी में अपन क्या खा के होएंगा उस्ताद? अपन तो बस तुम्हारे हुकुम का ग़ुलाम है. जो बोलेगा करेंगा.
- अच्छा. तो जो बोलेंगा, वो तू करेंगा?
- हां, बिलकुल करेंगा उस्ताद. आख़िर पापी पेट का सवाल है.
- हुंह! अच्छा तो चल चाकू निकाल.
- निकाला उस्ताद.
- अब चल जिबह कर.
- किसे उस्ताद?
- वो जो दो अंगुल का जीव दिखता है न, उसी को.
- क्यों उस्ताद?
- सुन ज़्यादा सवाल मत किया कर. ये जमूरियत के लिए नुकसानदेह होता है. 
- ओह! माफ़ करना उस्ताद. तू ठीक कहता है. जमूरियत में तो सवाल करने के भी पैसे लगते हैं. 
- पर चल, तू पूछता है तो अपन बता देता है. असल में तो वो पहले से ही बेजान है. 
- कैसे पता उस्ताद?
-बेवकूफ़, तूने फिर सवाल किया.
-ओह! ग़लती हो गई. माफ़ करुं उस्ताद. आइन्दा नहीं करेगा.
- अच्छा चल माफ़ किया. अब पूछ ही लिया है तो जान ले. देख, वो अगर जानदार होता तो क़ानून-फ़ानून इंसानियत-फिंसानियत जैसी फ़ालतू बात न करता. आजकल ये सब ज़िन्दा होने के सिंबल नहीं. जो ज़िंदा होता है वो मुर्दा चीज़ों के पीछे थोड़े भागता. वो तो बस वो करता है, जो राजा कहता है. बिना कुछ पूछे, बिना कोई सवाल किए. चुपचाप करता चला जाता है. 
-ठीक है उस्ताद. अपन काम में लगता.

(गहरा सन्नाटा)

- लो उस्ताद जिबह कर दिया.
- अबे कुछ तो इंसानियत का ख़्याल रख. 
-???
- अबे बकलोल की तरह क्या देखता है बे? घबरा मत, सुन ये भी आख़िर पापी वोट का सवाल है. समझा?
- हुंह! समझा उस्ताद, समझा.
- अबे चुप्प. समझा. क्या समझा?
- कुछ नहीं समझा उस्ताद. कुछ नहीं. जो तू समझाएगा, बस वो ही समझेगा.
- अच्छा चल, तब एक काम कर.
- हुकुम उस्ताद! 
देख, ये प्यारे-प्यारे क्यूट-क्यूट शेर जी लोग कई दिनों से भूखे हैं न! इसके टुकड़े कर और इनके आगे डाल दे.
- डाल दिया उस्ताद.
- शाब्बाश! अब सुन.
- हां उस्ताद.
- ज़रा उधर तालाब में देख!
- देखा उस्ताद!
- क्या देखा?
- तालाब में देखा उस्ताद, जो तूने कहा बिलकुल वोई.
- बिलकुल वोई?
- हां उस्ताद, बिलकुल वोई!
- मगरमच्छ लोग को देखा?
- हां उस्ताद, लोग कितने सुकून से बैठा है! बहुत क्यूट लग रहा है. एकदम संतों जैसा.
- एकदम संतों जैसा न?
- हां उस्ताद, एकदम संतों जैसा.
- जानता है? वो लोग बहुत दिन से तपस्या में है.
- अच्छा!
- हां, पिछले तीन साल से.
- ओह!
- अच्छा, अब ऐसा कर कि जो बचा है न, वो सब उनको स्नैक्स के तौर पे डाल दे. तुझे बहुत सबाब मिलेगा.
- डाल  दिया उस्ताद.
- डाल दिया न?
- हां डाल दिया.
- शाब्बाश! जमूरियत तरक्की पर है. तू भी तरक्की करेगा.



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