जज रमेश पंत और शराब चोर गोल्डी के सीन
अख़बार की दुनिया से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और फिर सिनेमा तक तक़दीर की आजमाइश करते चले जाने वाले आलोक नंदन को सिनेमा के व्याकरण की अच्छी समझ है. हिंदी में सही पूछिए तो किसी भी क्षेत्र में स्क्रिप्टिंग पर औपचारिक रूप से बहुत ढंग का काम नहीं हुआ है. साहित्य से लेकर पत्रकारिता और सिनेमा तक यह कमी महसूस होती है. हालांकि यही हिंदी की दुनिया की बहुत बड़ी ख़ूबी भी है. एक लड़की-एक लड़के और एंग्री यंगमैन वाले फार्मूलेबाजी के दौर से निकल चुके हिन्दी सिनेमा में यह कमी ज़्यादा शिद्दत से महसूस की जाने लगी है. इसी के मद्देनज़र आलोक नंदन ने पिछले शुक्रवार से यह कोशिश शुरू की है. यह कहानी या स्क्रिप्ट होने की दृष्टि से उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि उसके व्याकरण के नज़रिये से. पाठकों से हमारा अनुरोध है कि इसे इसी नज़रिये से लिया भी जाना चाहिए और यदि कहीं कोई शंका हो या कोई सुझाव हो तो उसे निस्संकोच रखें. हर संशय के निराकरण का वादा तो हम नहीं कर सकते, पर कोशिश ज़रूर करेंगे और सुझावों का स्वागत तो है ही. (फिल्म स्क्रिप्ट राब्स का दूसरा भाग) आलोक नंदन अब जज पंत के इस डायलाग को देखिये, एक बड़े से आइने के सामने खड...