Posts

चम्मच दीमकेश्वर की सिंहासन साधना

Image
इष्ट देव सांकृत्यायन किसी भी सत्ता का सत्यानाश करना उसके विरोधियों के बस की बात नहीं होती। सत्ता का सूरज जब भी डूबता है चमचों के कारण डूबता है। चमचे राहु हैं। वे सत्ताधीशों की बुद्धि पर ऐसा ग्रहण लगाते हैं कि उसे तब तक खुलने ही नहीं देते जब तक कि उसके पार्थिव शरीर का सारा रस न चूस डालें। बिलकुल दीमक की तरह।   राहु के ठीक सामने ही , 180* पर यानी सातवें घर में , केतु महाराज होते हैं। केतु छूटने के कारण होते हैं। जब तक किसी सत्ताधीश की सत्ता पर केतु पूरी तरह सशक्त और सक्रिय न हो जाएं , राहु यानी चम्मच दीमकेश्वर लोग उनके प्रिय नहीं हो सकते। अकसर यह देखा गया है कि सत्ता जैसे जैसे पुरानी होती जाती है चम्मच दीमकेश्वर लोग प्रिय से अतिप्रिय , और यहाँ तक कि प्राणप्रिय तक होते चले जाते हैं।   चम्मच दीमकेश्वर लोगों का व्यवहार , प्रायः देखा गया है कि जनता एंटी इनकम्बेंसी के व्युत्क्रमानुपाती होता है। जनता और समझदार लोग सत्ता से जितने नाराज होते जाते हैं , चम्मच दीमकेश्वर लोग उतने ही खुश होते जाते हैं। उनकी दक्षता भी बढ़ती चली जाती है। जो पहले रूमाल की तुरपाई करते थे , वे कुर्ते क...

राजा गुरु: हड़बड़ी में गड़बड़ी से बचें

Image
इष्ट देव सांकृत्यायन      हालाँकि वर्षफल का समग्र आकलन सौरमंडल में वार्षिक मंत्रिमंडल में सभी ग्रहों और उनके दायित्वों तथा गोचर में एक-दूसरे के साथ बन रहे युति-दृष्टि संबंधों के साथ-साथ  किसी देश की अपनी कुंडली में चल रही महादशा-अंतर्दशा का भी ध्यान रखकर किया जाता है। फिर भी , अपने-अपने दायित्व के अनुसार प्रत्येक ग्रह क्या फल देगा , यह भी देखा जाना चाहिए। इसमें भी मुख्यतः राजा और मंत्री का प्रभाव सबसे अधिक होता है। इस वर्ष के राजा हैं देवगुरु बृहस्पति और मंत्री मंगल। बृहस्पति स्वभावतः शांत होने के साथ-साथ ज्ञान और उसके प्रचार-प्रसार के आग्रही हैं। जबकि मंगल स्वभावतः उग्र , त्वरित प्रतिक्रिया करने वाले तथा सामान्य विरोधी को शत्रु मानकर दंडित करने के पक्षधर हैं। सौरमंडल में मंगल का स्थायी दायित्व सेनापति का है , जबकि बृहस्पति का स्थायी दायित्व विधिनिर्माता , विधिप्रवर्तक और प्रधानमंत्री का है। किसी भी ग्रह को वर्ष के लिए जो दायित्व मिलता है उसे निभाते हुए भी अपने मूल दायित्व के स्वभाव को वह नहीं छोड़ता। आज इस वर्ष के राजा यानी बृहस्पति की भूमिका पर वैश्विक संदर्भ ...
Image
 (हरिशंकर राढ़ी के ललित निबंध संग्रह 'कुल्हड़ की चाय' की ख्यातिप्राप्त लेखिका,  रेडियो-टीवी उद्घोषिका अर्चना मिश्र द्वारा की गई समीक्षा :  ‘ साहित्य नंदिनी ’,   नवम्बर , 2025 ) ' कुल्हड़ की चाय ' का सोंधापन   - अर्चना मिश्रा लब्धप्रतिष्ठ लेखक , कवि , व्यंग्यकार , निबंधकार एवं भाषाविद श्री हरिशंकर राढ़ी का निबंध-संग्रह ' कुल्हड़ की चाय ' पढ़ने का या  यों कहें की पीने का अवसर प्राप्त हुआ और मैं यह कहे बिना नहीं रह पाऊँगी कि इनके सोंधेपन से मन तृप्त हो गया। इन निबंधों का सरस , रोचक एवं ज्ञानवर्धक होना बड़ा सुखद लगा। इस संग्रह की सबसे मुख्य विशेषता इसका विस्तृत फलक एवं बहुआयामी होना है। संस्कृत साहित्य एवं उनके कवियों की चर्चा , खेत-खलिहान , गूलर , कनेर , चैत , रुपैया , पेंसिल , संगीत और शबरी जैसे विषयों को समेटता यह संग्रह पाठकों को ज्ञान एवं भाव के समंदर पर लहराने के लिए छोड़ देता है। राढ़ी जी द्वारा किए गए विषयों के चयन एवं विषय अनुकूल भाषा के सुन्दर संयोजन ने गद्य को भी काव्य जैसा रसपूर्ण बना दिया है। इन्हें पढ़ते हुए लेखक कभी अतीत की अंतर्यात्रा पर निकल ज...

Most Read Posts

रामेश्वरम में

Bhairo Baba :Azamgarh ke

इति सिद्धम

Maihar Yatra

Azamgarh : History, Culture and People

...ये भी कोई तरीका है!

विदेशी विद्वानों के संस्कृत प्रेम की गहन पड़ताल

निज़ामाबाद और शीतला माता

पेड न्यूज क्या है?