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दुनिया भर में उथल-पुथल कराएगी केतु- गुरु-मंगल की तिकड़ी

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  इष्ट देव सांकृत्यायन   श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः यह बात मैं साल के आरंभ में ही कह चुका हूँ कि यह पूरा साल धरना-प्रदर्शन और आंदोलनों से भरा रहेगा। युद्ध दुनिया भर में होंगे , लेकिन मध्य-पूर्व और मध्य यूरोप इसके ज्यादा शिकार होंगे। बाकी जगहों पर युद्ध सीधे लड़े जाने के बजाय छद्म रूप में लड़े जाएंगे। शनि-राहु का अगल-बगल होना यह जाहिर करता है कि घोर पूँजीवादी शक्तियाँ पहले तो दूसरे देशों में जनरोष उभारेंगी , फिर उसी के जरिये युद्ध लड़ेंगी। चोरों की तरह घात लगाकर कमजोर देशों पर कब्जे की साजिशें रचेंगी। कहीं सफल होंगी और कहीं विफल। देशों के भीतर सरकारों के अपने गलत फैसले और नेताओं का अहंकार भी इसमें बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इन युद्धों में रंगे भेड़ियों की भूमिका भी बहुत महत्त्वपूर्ण होगी , जो जनता के बीच उसके बहुत बड़े हितैषी बनकर भेड़ों की खाल ओढ़कर आएंगे। ऊपर से ओढ़ी गई कोई भी खाल चिरकाल तक बनी नहीं रहती। यह भी नहीं रहेगी। लेकिन कहीं तो उनकी खाल समय से उतर जाएगी और कहीं बहुत देर से उतरेगी। तब तक वे बहुत कुछ क्षति पहुँचा चुके होंगे। यह अलग-अलग देशों की अपनी कुंडली पर निर्भर ह...
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यात्रा संस्मरण विश्व-विरासत साँची के स्तूप : एक यात्रा साँची स्तूप क्रमांक  1 पर हरिशंकर राढ़ी    - हरिशंकर राढ़ी  इतनी यात्राओं के बावजूद विश्वप्रसिद्ध और घोषित विश्व विरासत साँची के स्तूप न जाने कैसे अनदेखे रह गए थे। तथापि , ‘ देर आयद , दुरुस्त आयद ’ की तर्ज पर जब 30 सितंबर , 2026 को मित्र बद्रीप्रसाद के साथ दक्षिण एक्सप्रेस से विदिशा रेलवे स्टेशन पर उतरा तो प्लेटफॉर्म पर ‘ विदिशा ’ लिखा हुआ देखकर प्रसिद्ध संस्कृत कवि बाणभट्ट की ‘ कादंबरी ’ का वाक्य ‘ विदिशाभिधाना नगरी राजधान्यासीत् ’ याद आ गया। यह राजधानी विदिशा शूद्रक नामक राजा की थी। महाकवि बाणभट्ट ने अपनी भाषा की समृद्धि दिखाने के प्रयास में राजा शूद्रक तथा उसकी राजधानी विदिशा को इतना समृद्ध दिखा दिया कि संभवतः कल्पना भी उससे आगे नहीं पहुँच सकती। वह विदिशा तो संभवतः बाणभट्ट की ‘ कादंबरी ’ के अतिरिक्त कहीं मिल ही नहीं सकती थी , जबकि मैं विदिशा रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म संख्या चार पर खड़ा यह समझने का प्रयास कर रहा था कि किस दिशा में निकलूँ ताकि सही होटल मिल जाए। स्तूप क्रमांक 1 का पूर्वी दृश्य  पहले से...

राहु के दो मूल

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भौतिक दृष्टि से देखें तो अव्वल तो राहु हैं ही नहीं। वह जो हैं , वो एक बिंदु हैं। केवल फलित ज्योतिष ही उन्हें ग्रह मानता है और वह भी छाया ग्रह। क्योंकि इनके पास ठोस खगोलीय शरीर नहीं है। विज्ञान के अनुसार वह केवल एक बिंदु हैं। खगोल विज्ञान के अनुसार , राहु वह Intersection Point हैं , जहाँ पृथ्वी की कक्षा और चंद्रमा की कक्षा आपस में एक दूसरे को काटती है। ऐसे दो बिंदु हैं। एक उत्तर और दूसरा दक्षिण में। उत्तरी बिंदु को राहु और दक्षिणी बिंदु को केतु कहा जाता है। पौराणिक कथा तो आप जानते ही हैं कि स्वरभानु नामक राक्षस का सिर राहु है और धड़ केतु। फलित ज्योतिष में राहु और केतु दोनों ही की बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। पता नहीं क्या कारण है कि राहु को तो बहुत लोग अपने नाम में रखते हैं , लेकिन केतु को बिरला ही कोई रखता है। मेरे परिचितों में केवल एक हैं , जिन्हें माता-पिता की ओर से तो रणविजय सिंह नाम मिला , लेकिन केतु को उन्होंने स्वयं अपने नाम में जोड़ लिया - सत्यकेतु – तखल्लुस के रूप में। यह तखल्लुस उन्होंने क्या सोचकर जोड़ा , ये मैंने कभी पूछा नहीं। बहरहाल , आज हम राहु-केतु का ज्योतिषीय नहीं , बल्...

त्रासद विभ्रम का दौर

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  इष्ट देव सांकृत्यायन  ॥श्री गुरुचरण कमलेभ्यो नमः॥ धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से लोगों को लगा होगा कि अब बवाल थम जाएगा। कॉक्रोच अलग प्रसन्न हुए कि वे सरकार से कुछ भी करवा सकते हैं। सरकार ने उस समय राहत की साँस ली कि उसने बला टाल दी। सरकारी लोग इसे मास्टर स्ट्रोक बताने में लग गए। लेकिन यह एक ऐसा भ्रम साबित हुआ , जिसका आज तक कोई जोड़ नहीं हुआ। यह भ्रम केवल सरकार ही नहीं , तथाकथित आंदोलनकारियों , अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों और आम जनता सबके लिए होगा। ग्रहस्थितियाँ ही ऐसी हैं कि पूरी दुनिया भ्रमित है और अभी देर तक रहेगी। हालाँकि एक-एक कर सारा भ्रम छँटेगा। ऐसे-ऐसे रहस्य सामने आएंगे , और ऐसे-ऐसे भ्रम छँटेंगे कि आश्चर्य को भी आश्चर्य होगा। आने वाला समय न केवल भारत , बल्कि पूरी दुनिया के लिए भयावह है। प्राकृतिक दुर्घटनाएँ , असंतोष , जन विद्रोह और सांप्रदायिक दंगे... यह सब दिखाई दे रहे हैं। अराजक तत्त्वों का अहंकार चरम पर होगा और सरकार जितना बैकफुट पर आती जाएगी , उनका यह अहंकार उतना ही प्रबल होता चला जाएगा। इस पूरे उपक्रम से शेयर बाजार भी बहुत बुरी तरह प्रभावित होगा। विश्व बाजार एक बार...

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