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  'वागर्थ' में कहानी भारतीय भाषा परिषद की प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित होना अच्छा लगता है। 'वागर्थ' के मई, 2024 अंक में मेरी कहानी 'मोड से आगे' आई है। 'वागर्थ' में यह मेरी दूसरी कहानी है, जो स्त्री विमर्श पर केन्द्रित है। इसमें एक नव विवाहिता युवती अपने पति और सास की स्त्री विरोधी, पितृ सत्तात्मक और दहेज लोभी प्रवृत्ति का शिकार होती है और अपना रास्ता खुद चुनती है। कहानी लंबी है और पत्रिका के लगभग 9 पृष्ठों तक चलती है। यहाँ कहानी का लिंक भी साझा कर रहा हूँ। समय मिले तो पढ़ें और टिप्पणी करें। कहानी का लिंक भी साझा कर रहा हूँ। समय मिले तो पढ़ें और टिप्पणी करें। https://vagartha.bharatiyabhashaparishad.org/harishankar.../
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'गिद्धों का स्वर्णकाल' का लोकार्पण आज (16 फरवरी, 2024) एक सुखद एवं संतुष्टिप्रद दिन! विश्व पुस्तक मेला , नई दिल्ली में मेरे ( हरिशंकर राढ़ी) दूसरे व्यंग्य संग्रह का लोकार्पण 'हंस' प्रकाशन के स्टॉल पर सम्पन्न हुआ। अच्छा लगा जब हिन्दी साहित्य की अनेक विभूतियों द्वारा मेरे व्यंग्य संग्रह का लोकार्पण सादगी किन्तु गरिमामय ढंग से किया गया। प्रसिद्ध कवि श्री मदन कश्यप जी, कवि एवं पूर्व संपादक (आजकल) श्री राकेशरेणु जी, कवि और लेखक श्री राधेश्याम तिवारी जी, कवि श्री राजेश्वर वशिष्ठ जी, कवि एवं समालोचक श्री ओम निश्चल जी, कवि-हिन्दी सोनेटकार श्री वेदमित्र शुक्ल जी, कवि-ग़ज़लकार श्री नरेश शांडिल्य जी, श्री शिवबदन यादव जी (वरिष्ठ IAS) एवं अनेक आत्मीय जनों ने अपनी उपस्थिति से समारोह को गौरव प्रदान किया। डॉ॰ वेदमित्र शुक्ल जी ने संचालन का दायित्व सहर्ष एवं सफलतापूर्वक संभाला। श्री मदन कश्यप जी, श्री राकेशरेणु जी, श्री ओम निश्चल जी ने संक्षिप्त सम्बोधन में बहुत महत्त्वपूर्ण बातें कहीं। साथ में ही उपेंद्र कुमार मिश्र जी के दूसरे काव्य संग्रह 'लड़ रहा हूँ मैं भी' का लोकार्पण भी साथ

संसद पर हमला और शहरी नक्सली

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  इष्ट देव सांकृत्यायन
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  समकालीन अभिव्यक्ति : रामदरश मिश्र एकाग्र का लोकार्पण Hari Shanker Rarhi साहित्य मनीषी प्रो. रामदरश मिश्र को पढ़ना, उनसे मिलना और उन पर कुछ लिखना तीनों ही आनंद के स्रोत हैं। ‘समकालीन अभिव्यक्ति’ के तत्त्वावधान में उन पर निकले एकाग्र अंक के पुस्तकाकार रूप का लोकार्पण दिनांक 4 जून, 2023 को मिश्र जी के निवास वाणी विहार पर उन्हीं के हाथों हुआ। अपनी जन्म शताब्दी पूरी करने की देहरी पर खड़े वरिष्ठतम साहित्कार प्रो. रामदरश मिश्र जी के हाथों उन्हीं पर संपादित पुस्तक का लोकार्पण हमारे लिए बड़े सौभाग्य की बात है। श्री उपेंद्र कुमार मिश्र एवं मेरे द्वारा संपादित पुस्तक को हंस प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। इसी के साथ प्रो. रामदरश मिश्र पर डॉ. पांडेय शशिभूषण ‘शीतांशु’ द्वारा लिखित आलोचनात्मक पुस्तक ‘रामदरश मिश्र: एक वसंत दिग दिगंत’ का भी लोकार्पण हुआ। अत्यंत आत्मीय-से लोकार्पण समारोह में वरिष्ठ कवि-आलोचक डॉ. ओम निश्चल जी, दिल्ली विश्वविद्यालय में अंगरेजी के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. वेदमित्र शुक्ल जी, प्रो. मिश्र जी की सुपुत्री और दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर डॉ. स्मिता मिश्र जी एवं हंस प्रकाशन के स्व
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  यात्रा संस्मरण एक दिन अलवर तक -हरिशं कर राढ़ी हरिशंकर राढ़ी :  सिलसेढ़ लेक पर  ऐसा नहीं है कि यात्रा हुए कोई लंबा अरसा बीत गया था, लेकिन मुझे लग रहा था। अभी पिछले महीने ही वैष्णो देवी की यात्रा से आया था। इधर अप्रैल में छुट्टियाँ दिख रही थीं और उसका उपयोग कर आने का मन था। बेटी के पास समय बिल्कुल नहीं होता, इसलिए पूरे परिवार का एक साथ निकलना मुश्किल था। छुट्टी दिखी तो योजना बनी कि ऋषिकेश हो आते हैं। बेटी का हिसाब नहीं बना। तो चलिए एक दिन के लिए कहीं चलते हैं। कहाँ चलें? कुरुक्षेत्र हो आते हैं। लेकिन कुरुक्षेत्र मैं दो बार घूम चुका हूँ। मथुरा-वृंदावन जाने का न तो मन होता है और न कुछ देखने के लिए खास है। अंततः बेटी ने कहा कि अलवर चलते हैं। अपने को तो बस कहीं निकल जाने से भी संतोष हो जाता है, इसलिए ठीक है। हमारी यात्राएँ प्रायः रेलगाड़ी से होती हैं। कभी-कभी चौपहिया से भी हुई हैं। इधर पिछले साल से अपने पास भी एक गाड़ी हो गई, लेकिन उस गाड़ी से हम दिल्ली से बाहर यात्रा पर एक ही बार मथुरा तक के लिए निकल पाए थे। वह यात्रा बहुत संतोषप्रद नहीं थी। अलवर की बात आते ही सरिस्का अभयारण्य दिमाग में घूमता ह
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  आलेख               गोस्वामी बिंदु जी की संगीतमय भक्ति     - हरिशंकर राढ़ी Hari Shanker Rarhi  इसे हिंदी साहित्य एवं संगीत का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि भक्तिकाल के बाद आए भक्तिकाव्य को साहित्य में स्थान नहीं दिया गया। कुछ तो सामयिक आवश्यकताओं के अनुसार वैचारिक बदलाव , कुछ नई विचारधारा का आगमन तो कुछ भक्ति साहित्य को पिछड़ा एवं अंधविश्वास मानने वाली पाश्चात्य सोच। माना कि उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी की परिस्थितियाँ कुछ और थीं , विदेशी सत्ता , भूख , अत्याचार और अंधविश्वासों से छुटकारा पाने की जिद थी और उसी के अनुसार भक्ति से इतर साहित्य की आवश्यकता थी , फिर भी यदि कुछ अलग और स्तरीय लिखा जा रहा था तो उसे उपेक्षित भी नहीं किया जाना चाहिए था। हम कितने भी आगे बढ़ जाएँ , कितने भी वैज्ञानिक सोच के हो जाएँ , लेकिन हम कबीर , रैदास , सूरदास , तुलसीदास , मीराबाई और रसखान को तो उपेक्षित नहीं कर सकते। बीच में इस परंपरा में अच्छे-बुरे सब आए होंगे , किंतु एक बार हम गोस्वामी बिंदु जी का भक्ति साहित्य , उसका भाव एवं संगीत देख लेते तो उन्हें इसी परंपरा में बैठाते , भले ही उनकी उत्पादकता उपरोक्त संत क
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  समीक्षा अन्वेषक : सत्य के अन्वेषण को प्रस्तुत करता नाटक -हरिशंकर राढ़ी नाटक और काव्य साहित्य की प्राचीनतम विधाएँ हैं, विशेषकर समस्त क्लासिकल भाषाओं में इनका साहित्यशास्त्र एवं विश्वप्रसिद्ध कृतियाँ प्रचुर मात्रा में मिलती हैं। जहाँ पाश्चात्य जगत में अरस्तू जैसे विद्वान ने अपनी कृति ‘द पोयटिक्स‘ में नाटकों एवं महाकाव्यों के मानक निर्धारित किए हैं, वहीं संस्कृत में अनेक साहित्य शास्त्रियों ने नाटकों पर विस्तृत चर्चा की है। संस्कृत में तो यहाँ तक कहा गया है कि काव्येषु नाटकं रम्यम्। नाटकों को सर्वोपरि इसलिए रखा गया है क्योंकि Hari Shanker Rarhi यह दृश्य-श्रव्य विधा है और दृश्य विधा का प्रभाव सर्वोपरि होता है। विभिन्न आकार-प्रकार एवं विषयवस्तु के नाटकों का लेखन मानवीय सभ्यता के समय से ही चला आ रहा है। हिंदी में भी नाटकों की परंपरा समृद्ध होती रही है, हालाँकि टीवी और फिल्मों के आने के बाद इनके स्वरूप, प्रकार, माँग एवं दर्शकवर्ग में व्यापक परिवर्तन आया है। वर्तमान में हिंदी साहित्य में अच्छे नाटककार

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