ग्रह और अवतार
इष्ट देव सांकृत्यायन ज्योतिष को वेदाङ्ग क्यों कहा गया और कैसे अवतारों को ग्रहों से जोड़ा गया , क्यों ऐसा माना जाता है कि ग्रह रूप में स्वयं श्रीमन्नारायण ही सृष्टि के सभी क्रियाकलापों पर दृष्टि रखते हुए उसका संचालन करते हैं... ऐसे कई प्रश्नों का उत्तर बृहत पाराशर होराशास्त्र के आरंभ में ही है। पहले ही अध्याय सृष्ट्यादिक्रम का 24 वाँ श्लोक है - राम: कृष्णश्च भो विप्र नृसिंह: शूकरस्तथा। इति पूर्णावतारश्च ह्यन्ये जीवांशकान्विता:॥ अर्थात राम , कृष्ण , वराह और नृसिंह ये पूर्ण अवतार हैं। शेष अवतार जीवांशयुक्त हैं। आगे वे इसे और स्पष्ट कर देते हैं , यह कहते हुए कि - अवताराण्यनेकानि ह्यजस्य परमात्मनः। जीवानां कर्मफलदो ग्रहरूपी जनार्दनः॥ अर्थात परमात्मा , जो कि अजन्मा है , उसके अनेक अवतार हैं। जीवों को उनके कर्मों के अनुसार फल देने के लिए ग्रहों के रूप में भगवान जनार्दन ने ही अवतार लिया है। और उनके इन अवतारों का उद्देश्य केवल इतना ही नहीं है कि वे जीवों को उनके कर्मों का ही फल दें। इनके और भी काम हैं , और भी उद्देश्य हैं। वह क्या हैं ? ...