यात्रा संस्मरण विश्व-विरासत साँची के स्तूप : एक यात्रा साँची स्तूप क्रमांक 1 पर हरिशंकर राढ़ी - हरिशंकर राढ़ी इतनी यात्राओं के बावजूद विश्वप्रसिद्ध और घोषित विश्व विरासत साँची के स्तूप न जाने कैसे अनदेखे रह गए थे। तथापि , ‘ देर आयद , दुरुस्त आयद ’ की तर्ज पर जब 30 सितंबर , 2026 को मित्र बद्रीप्रसाद के साथ दक्षिण एक्सप्रेस से विदिशा रेलवे स्टेशन पर उतरा तो प्लेटफॉर्म पर ‘ विदिशा ’ लिखा हुआ देखकर प्रसिद्ध संस्कृत कवि बाणभट्ट की ‘ कादंबरी ’ का वाक्य ‘ विदिशाभिधाना नगरी राजधान्यासीत् ’ याद आ गया। यह राजधानी विदिशा शूद्रक नामक राजा की थी। महाकवि बाणभट्ट ने अपनी भाषा की समृद्धि दिखाने के प्रयास में राजा शूद्रक तथा उसकी राजधानी विदिशा को इतना समृद्ध दिखा दिया कि संभवतः कल्पना भी उससे आगे नहीं पहुँच सकती। वह विदिशा तो संभवतः बाणभट्ट की ‘ कादंबरी ’ के अतिरिक्त कहीं मिल ही नहीं सकती थी , जबकि मैं विदिशा रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म संख्या चार पर खड़ा यह समझने का प्रयास कर रहा था कि किस दिशा में निकलूँ ताकि सही होटल मिल जाए। स्तूप क्रमांक 1 का पूर्वी दृश्य पहले से...