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काहिवि : आवाज उठाओ

राजेश राय  बीएचयू प्रकरण पर आज बोलना ज़रूरी इसलिए हो गया कि 25-30 साल बाद जब बच्चे पूछें कि ‘ महामना के मंदिर ‘ को जब तोड़ने का कुचक्र रचा जा रहा था तब आप कहाँ थे ? और तब हम जबाब दे सकें। हिन्दू संगठन और सनातन धर्म के कार्य को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से पूज्य मालवीय जी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डा़ हेडगेवार जी और बाद में द्वितीय सरसंघ चालक बने माधव सदाशिव गोलवरकर जी को बुलाकर संघ कार्यालय खोलने के लिए बीएचयू परिसर में ला कालेज के पास दो भवन दिया था। आरएसएस कार्यालय का उन्होंने स्वयं शुभारंभ किया था। कांग्रेसियों और वामपंथियों के दबाब में ७५ में इमरजेंसी के दौरान तत्कालीन कुलपति कालूलाल श्रीमाली ने रातोंरात संघ कार्यालय का वह भवन गिरवा कर समतल करवा दिया था। तब से कई बार भाजपा व संघ समर्थित सरकारें आईं , पर संघ बीएचयू परिसर में अपना भवन ले नहीं पाया। आज फिर कुछ उसी तरह का धुंआ उठा है ,  मालवीय जी द्वारा सनातन धर्म की परम्पराओं के रक्षार्थ स्थापित संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय को वामपंथी और कांग्रेसी विचाराधारा के आचार्यों द्वारा तहस...

बीएचयू: पद तो ओबीसी का था

सर्वेश तिवारी श्रीमुख  तथ्यों के बीच एक तथ्य यह भी है कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के "संस्कृत धर्म विज्ञान संकाय" के जिस पद पर श्रीमान खान साहब नियुक्त हुए हैं , वह ओबीसी के लिए रिजर्व पद है। उस पद के लिए कुल सत्ताईस आवेदन पड़े थे , जिनमें छब्बीस हिन्दू लोगों के थे। यादव , पटेल , चौधरी , प्रसाद , सिंह आदि... एक व्यक्ति गैर हिन्दू थे , श्रीमान खान साहब। सेक्युलरिज्म का ताव देखिये , सारे ओबीसी वाले हिन्दू छांट दिए गए और खान साहब सेलेक्ट हो गए। चयन समिति ने छब्बीस लोगों को दस में से दो-दो नम्बर दिया था , और खान साहब को दस में से दस... कैसे न हो! कुलाधिपति महोदय को अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में जो लिखवाना है। और अब षड्यंत्र का स्तर देखिये , विरोध शुरू होते ही सबसे पहले वामपंथी मीडिया ने लोगों के दिमाग में यह बैठा दिया कि ब्राह्मण अपने लिए विरोध कर रहे हैं। ब्राह्मण उस पद पर स्वयं के अतिरिक्त किसी अन्य को देखना ही नहीं चाहते... यह विरोध ब्राह्मणवादी , मनुवादी कर रहे हैं। जबकि सच यह है कि उस पद पर कोई सवर्ण(कथित) उम्मीदवार ही नहीं , बल्कि वह पद सवर्णों के लिए है ही नहीं। उस प...

काशी हिंदू विश्वविद्यालय और डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति

बेबाक बनारसी शिक्षा और समाज दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और एक-दूसरे को दिशा देते हैं और एक-दूसरे की दशा के लिए उत्तरदाई भी होते हैं। समाज के उत्तरोत्तर विकास और उत्थान में शिक्षा की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है और वहीं पर शिक्षा को भी नियंत्रित और संचालित करने में समाज की भूमिका रहती है और होनी चाहिए। काशी हिंदू विश्वविद्यालय इन कसौटियों पर कसा हुआ एक ऐसा विश्वविद्यालय है जिसको महामना पंडित मदनमोहन मालवीय ने इन्हीं आदर्शों और उद्देश्यों हेतु की थी। आज से तीन वर्ष पूर्व लगभग इसी समय काशी हिंदू विश्वविद्यालय में वहां की छात्राओं ने उद्वेलित होकर अपने छात्रावासों से बाहर आकर सिंहद्वार पर एकत्रित हो गईं थीं। उसी समय मैंने एक पूर्व छात्र होने के नाते मैंने एक टीवी चैनल के डिबेट में बहुत निष्पक्ष होकर कहा था कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय किसी की बपौती या संपत्ति नहीं है। न तो वह सरकार का है , न कुलपति का है , न तो छात्रों का है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय उन संस्कारों की बपौती और संपत्ति है जिसकी स्थापना महामना मालवीय ने की थी और उन संस्कारों पर समाज ने मोहर लगाई थी। आज काशी हिंदू विश्वविद्...

बीएचयू विवाद

योगी अनुराग यों तो मैं उन विवादित विषयों से एकदम दूरी बना कर रखता हूँ , जिनपर स्वयं हिन्दू समाज ही एकमत न हो। किंतु अब लगता है कि ये भ्रांतिपूर्ण विवाद अपने विराट स्वरूप धारण कर रहा है। अतएव अब मौन का मार्ग दुर्गम होगा। सो , अनेकानेक प्रिय मित्रों के आग्रह पर मैं अपनी बात कहता हूँ! अव्वल तो ये प्रश्न ही भ्रामक है कि क्या एक मुस्लिम संस्कृत नहीं पढ़ा सकता ? इसपर मैं कहूँगा कि अवश्य पढ़ा सकता है। किंतु आप इस विवाद का आखेट वहाँ कर रहे हैं , जहाँ ये है ही नहीं। विवाद एक मुस्लिम द्वारा संस्कृत पढ़ाने को लेकर नहीं , बल्कि वेदांगों में से एक “ छंदशास्त्र ” को पढ़ाने का है। सो , प्रश्न का आधारभूत ढाँचा बदल लीजिए। वस्तुतः अब प्रश्न ये है : “ वैदिक विषय “ छंदशास्त्र ” का प्रवक्ता कोई मुस्लिम क्यों नहीं हो सकता ?” इस प्रश्न का उत्तर , प्रश्न की ही भाषा में निहित है। निषिद्धि को “ मुस्लिम ” शब्द के साथ इंगित कर दिया गया है। और इस्लामिक दर्शन के मुताबिक़ ये बात जमे जमाए तर्कों को पूर्णरूपेण श्रांति प्रदान करती है। “ छंदशास्त्र ” यानी कि वैदिक ऋचाओं की गेयता को सुनिश्चित करने वाला श...

प्लीज़ ऐसा न करो साथी

जिस मन में अपने लिए सम्मान नहीं होता , उसमें अपनी किसी चीज के लिए सम्मान नहीं होता. चाहे वह देश हो , समाज हो , संस्कृति हो , विचार हो या फिर अपने माता-पिता , जीवनसाथी या बच्चे! ऐसे लोग जीवन भर लड़ते हैं , उनके इशारों पर जो वास्तव में इनसे और इनके समाज से अपनी दुश्मनी साध रहे होते हैं. चूँकि वे खुद बार-बार हार गए और हार-हार कर यह मान गए कि सीधी लड़ाई वे कभी नहीं जीत सकते , तो उन कुंठित अपसंस्कृतियों ने यह छद्मयुद्ध छेड़ा. इस छद्मयुद्ध में वे हमारे समाज के उस कचरे का इस्तेमाल कर रहे हैं जो हमारे ही टुकड़ों पर हमारी ही दया से पल रहा है और हमें ही गाली दे रहा है. हमें , हमारी संस्कृति को , हमारे गौरवशाली दर्शन , हमारे समाज को कोस रहा है. वह हमें गालियों पर गालियां दिए जा रहा है क्योंकि हम बर्दाश्त कर रहे हैं. क्योंकि हम सह रहे हैं. सहने की जितनी भी सीमाएं हो सकती थीं , सारी पार की जा चुकी हैं . इसके बावजूद हम सह रहे हैं . सहे जा रहे हैं. उस पर तुर्रा यह कि इन परजीवियों की नजर में हमारे समाज में असहिष्णुता बढ़ रही है. असहिष्णुता बढ़ रही है , ये झूठा हल्ला उ...

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